Crude Oil Price Fall: पेट्रोल और डीजल की कीमतों से जुड़ी राहत की खबर है. फरवरी 2021 के बाद यानी करीब चार साल बाद ऐसा हुआ है जब भारत जिस कच्चे तेल को बाहर से खरीदता है उसकी औसत कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई है. जनवरी 2026 की शुरुआत में ही यह बड़ा बदलाव देखने को मिला है. जिसके बाद अब सवाल यही उठ रहा है कि क्या इसका सीधा फायदा आम लोगों को मिलेगा और क्या आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल सस्ते हो सकते हैं. आइए जानते हैं आंकड़े क्या कहते हैं...
4 साल बाद 60 डॉलर से नीचे गिरा कच्चे तेल का भाव
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2026 में अब तक भारतीय कच्चा तेल बास्केट का औसत दाम 59.92 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया है.यह फरवरी 2021 के बाद पहली बार है जब कीमतें इस स्तर तक नीचे आई हैं.दिसंबर 2025 में यही औसत कीमत 62.2 डॉलर प्रति बैरल थी. यानी सिर्फ एक महीने में भारी गिरावट देखने को मिली है.
आगे और सस्ता हो सकता है क्रूड ऑयल
कच्चे तेल की यह गिरावट सिर्फ कुछ दिनों की नहीं मानी जा रही है. एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले महीनों में कीमतों में और नरमी आ सकती है.रिपोर्ट में कहा गया है कि जून 2026 तक कच्चा तेल 50 डॉलर प्रति बैरल या उससे नीचे भी जा सकता है.कुछ बाजार जानकारों का मानना है कि मार्च 2026 तक ही कीमतें घटकर करीब 53.31 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं.
पेट्रोल और डीजल पर क्या पड़ेगा असर?
अगर कच्चा तेल इसी तरह सस्ता रहता है तो इसका असर पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर दिख सकता है.भारत में फ्यूल की कीमतें रोजाना बदलने वाले सिस्टम से जुड़ी होती हैं. ऐसे में तेल कंपनियां आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल के दाम घटा सकती हैं.हालांकि अंतिम फैसला तेल कंपनियों और सरकार की टैक्स नीति पर भी निर्भर करेगा.
भारत के लिए क्यों अहम है कच्चे तेल की गिरावट?
भारत अपनी जरूरत का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल बाहर से मंगाता है.ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में थोड़ी सी गिरावट भी देश के लिए बड़ी राहत बन जाती है. आंकड़ों के हिसाब से कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की गिरावट से भारत को साल भर में करीब 13 हजार करोड़ रुपये की बचत होती है.
क्यों गिर रही हैं कच्चे तेल की कीमतें?
दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई जरूरत से ज्यादा हो गई है जबकि मांग उतनी मजबूत नहीं है.अंतरराष्ट्रीय एजेंसी का अनुमान है कि साल 2026 तक तेल की सप्लाई मांग से करीब 38.5 लाख बैरल प्रति दिन ज्यादा रह सकती है.इतनी ज्यादा सप्लाई की वजह से कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है.
ब्रेंट और अमेरिकी तेल का हाल
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 60.22 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है.वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई की कीमत करीब 56.48 डॉलर प्रति बैरल है.ब्रेंट और भारतीय कच्चा तेल बास्केट के बीच गहरा रिश्ता है इसलिए ब्रेंट में गिरावट का असर भारत पर भी पड़ता है.
सरकार और अर्थव्यवस्था को क्या फायदा
तेल आयात सस्ता होने से सरकार पर खर्च का दबाव कम होता है.इससे राजकोषीय घाटा संभालने में मदद मिलती है और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कामों में ज्यादा पैसा लगाया जा सकता है.साथ ही महंगाई पर भी काबू रहता है जिससे आम लोगों को राहत मिलती है.
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में यही रुझान बना रहता है तो आने वाले महीनों में पेट्रोल और डीजल के दाम घट सकते हैं.इससे रोजमर्रा के खर्च में राहत मिलेगी और महंगाई का बोझ थोड़ा हल्का हो सकता है.फिलहाल सबकी नजर कच्चे तेल की अगली चाल और तेल कंपनियों के फैसले पर टिकी है.
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