रुपया पिछले कुछ दिनों से डॉलर के मुकाबले 95 के पार ट्रेड कर रहा है. शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर में कमजोरी से इसे थोड़ा समर्थन मिला, लेकिन अभी भी ये 95.50 के पार कारोबार कर रहा है. भारत के लिए ये केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि हजारों ऐसे भारतीय परिवारों के लिए एक बड़ा वित्तीय बोझ हो सकता है, जिनके बच्चे या तो विदेश में पढ़ रहे हैं या फिर जो अमेरिका या दूसरे देशों में घूमने का प्लान बना रहे हैं. दो उदाहरण देखिए.
- झारखंड के एक कॉलेज में सहायक प्रोफेसर नागेंद्र प्रसाद विदेश में पढ़ाई कर रही अपनी बेटी की सेमेस्टर फीस भेज रहे थे तो उन्हें रुपये में गिरावट अखर गई. उन्होंने NDTV को बताया कि पिछले सेमेस्टर की तुलना में इस बार उन्हें करीब 30,000 रुपये ज्यादा देने पड़े. पिछले साल रुपया, डॉलर के मुकाबले 87-88 के बीच था, तो उन्हें फीस के काफी कम पैसे देने पड़े थे.
- अब एक ऐसे न्यू मैरिड कपल यानी नवविवाहित जोड़े के बारे में सोचिए जो हनीमून के लिए अमेरिका का टूर प्लान कर रहे थे. उनका बजट अगर 4 लाख के करीब रहा होगा तो वो अब करीब 50,000 रुपये तक बढ़ गया होगा. 5,000 डॉलर के एक टूर पैकेज का कैलकुलेशन करें तो अभी के भाव में ये खर्च 4.75 लाख रुपये बैठता है, जबकि 83 रुपये के भाव पर ये पैकेज 4.15 लाख का पड़ता. यानी सीधे 60,000 रुपये का गच्चा.
एक अपर मिडिल क्लास के लिए भी 30, 50 या 60 हजार रुपये की रकम बड़ी होती है. ऐसे में रुपये का गिरना टेंशन वाली बात तो है ही. न केवल देश की इकोनॉमी के लिए, बल्कि हमारे-आपके लिए पर्सनल लेवल पर भी.

रुपये के गिरने का दबाव
पृथ्वी एक्सचेंज (Prithvi Exchange) के प्रबंध निदेशक पवन कुमार कावड़ के अनुसार, विदेशी मुद्रा की जरूरत वाले लोग इसका प्रभाव पहले ही महसूस कर रहे हैं. उनका कहना है कि रुपये में गिरावट सीधे तौर पर यात्रियों, छात्रों और विदेश में भुगतान करने वाले किसी भी व्यक्ति को प्रभावित करती है.
उन्होंने NDTV को बताया कि छात्रों के लिए ये प्रेशर और भी ज्यादा क्लियर है, जिन्हें अक्सर विदेशी मुद्रा में रेकरिंग खर्चों का सामना करना पड़ता है. जैसे कि ट्यूशन फीस, किराया और रहने का खर्च केवल इसलिए महंगा हो जाता क्योंकि रुपया कमजोर हो गया है.
क्या रुपया संभल पाएगा?
इस सवाल पर स्थिति थोड़ी जटिल हो जाती है. पवन कावड़ को नहीं लगता कि उपभोक्ताओं को मौजूदा कमजोरी के बस शांत होने का इंतजार करना चाहिए. उनका अनुमान है कि निकट भविष्य में रुपया दबाव में रहेगा, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें 92 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच रही हैं और डॉलर की मजबूत मांग बनी हुई है.
RBI भी रुपये की गिरावट को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए बाजार में डॉलर बेचकर हस्तक्षेप कर रहा है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि रुपया, तेजी से चढ़ते हुए 83-85 के स्तरों पर वापस आ जाएगी, जिसके उपभोक्ता आदी हो चुके थे. कावड़ का कहना है कि बाजार फिलहाल आगे के संभावित हस्तक्षेप के लिए 95.80 से 96 के दायरे पर नजर बनाए हुए है.

इस बीच, अलंकृत लिमिटेड (Alankit Limited) के CFO गौरव माहेश्वरी थोड़ा संतुलित दृष्टिकोण रखते है. वो रुपये पर दबाव का कारण ऊंचे कच्चे तेल के दामों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी जैसे कारकों को मानते हैं. लेकिन एक अन्य फैक्टर भी ध्यान देने योग्य है. हाल ही में रुपया 17 पैसे मजबूत होकर 95.56 पर आ गया था.
माहेश्वरी ने NDTV से कहा, '95 रुपये का स्तर होने का मतलब ये नहीं है कि 100 रुपये का लेवल तुरंत आने वाला है. बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल की कीमतों, वैश्विक ब्याज दरों और विदेशी मुद्रा के प्रवाह का क्या होता है. फिलहाल 95 रुपये को एक स्थायी नए बेंचमार्क के रूप में देखने के बजाय एक चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए.
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