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जब मनसा मूसा ने गरीबों में बांटा इतना सोना कि बर्बाद हो गया देश, समझिए कैसे गोल्ड सस्‍ता होने से डूब सकती है अर्थव्यवस्था

मनसा मूसा ने अपनी हज यात्रा के दौरान मिस्र में खूब सोने बांटे, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर महंगाई और मुद्रा संकट पैदा कर दिया था. सार यही है कि अर्थव्यवस्था में उत्पादन के बिना मुद्रा आपूर्ति बढ़ने से महंगाई, असमानता और वित्तीय अस्थिरता की आशंका होती है. यहां विस्‍तार से समझ लीजिए.

जब मनसा मूसा ने गरीबों में बांटा इतना सोना कि बर्बाद हो गया देश, समझिए कैसे गोल्ड सस्‍ता होने से डूब सकती है अर्थव्यवस्था
How Mansa Musa Destroyed Egypt Economy: मनसा मूसा की कहानी से समझिए कैसे फ्री गोल्‍ड या सस्‍ता गोल्‍ड इकोनॉमी को बर्बाद कर सकती है.

How Mansa Musa Destroyed Egypt Economy: दुनिया भर में मची जियो-पॉलिटिकल अस्थिरता और टैरिफ टेंशन के बीच सोने और चांदी की कीमतों में रिकॉर्ड उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. सोना और चांदी, जिसने कुछ ही दिन पहले ऑल टाइम हाई का रिकॉर्ड बनाया, अब 2 दिनों में गिरावट का रिकॉर्ड बना चुके हैं. चांदी ऑल-टाइम हाई से 1.28 लाख रुपये तक टूट गई, जबकि सोना भी करीब 40,000 रुपये तक सस्‍ता (Gold Price Crash) हो गया. इन कुछेक दिनों में ही बहुत-से निवेशकों ने जमकर 'चांदी कूटी'. इस मुनाफावसूली के अलावा मार्केट करेक्‍शन और फेडरल रिजर्व के प्रमुख के तौर पर केविन वॉर्श के नाम का ऐलान करने का भी बड़ा असर देखा गया. दो दिन से हर तरफ यही चर्चा हो रही है- सोना-चांदी सस्‍ता हो गया... सोना-चांदी सस्‍ता हो गया. लेकिन क्‍या सोने का बहुत ज्‍यादा गिरना इकोनॉमी के लिए अच्‍छा है? 

सोने-चांदी की गिरावट का इकोनॉमी पर पड़ने वाले असर को भी समझेंगे, लेकिन पहले एक कहानी. शायद आपने पढ़ी भी होगी. 

...जब गरीबों पर दरियादिली से बर्बाद हो गया देश 

वो दुनिया का सबसे अमीर शख्‍स था. आज के एलन मस्‍क से भी कई गुना ज्‍यादा अमीर. 14वीं सदी में माली साम्राज्य के इस राजा का नाम था- मनसा मूसा. सोने और नमक के कारोबर से इसने इतनी संपत्ति जोड़ी कि उसका राजपाट मौजूदा कई अफ्रीकी देशों (मॉरिटेनिया, सेनेगल, माली, नाइजर, नाइजीरिया, चाड वगैरह) तक फैला था. 1324 में मक्का की हज यात्रा पर निकले मनसा मूसा ने काफिले के साथ 4,000 मील तक का सफर किया.

मनसा मूसा ने माली से मिस्र होते हुए की थी मक्‍का-मदीना की यात्रा. ये था रूट. 

हजारों सैनिक, ऊंट-घोड़े और टनों सोने के साथ मूसा, मिस्र की राजधानी काहिरा पहुंचा. यहीं उसकी दरियादिली ने मिस्र की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी. मूसा रास्ते भर गरीबों पर इतना सोना लुटाता गया कि काहिरा में अचानक सोना-ही-सोना हो गया. नतीजा- सोने की कीमत धड़ाम से गिर गई. सोना सस्ता यानी स्थानीय मुद्रा की वैल्यू धड़ाम. बाजार में करेंसी क्राइसिस खड़ा हो गया. नतीजा ये हुआ कि 'गरीबों पर रहम' दिखाने के नाम पर बांटे गए फ्री सोने ने मिस्र की इकोनॉमी को ऐसा झटका दिया कि इस उथल-पुथल से उबरने में उसे सालों लग गए. 

सोना ही सोना कैसे बर्बाद कर सकता है इकोनॉमी? 

आप सोचेंगे, अगर किसी देश में अचानक लोगों को मुफ्त में बहुत सारा सोना बांट दिया जाए, तो पहली नजर में तो यह वरदान लगेगा, लेकिन उस देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह बड़े झटके जैसा हो सकता है. मिस्र में यही हुआ, लंबे समय तक सोने की कीमत और करेंसी का संतुलन बिगड़ा रहा और उबरने में उसे कई बरस लग गए. 

इसे समझने के लिए हमने एक थिंक टैंक के लिए लंबे समय तक काम कर चुके पॉलिसी एक्‍सपर्ट अविनाश चंद्र और डी-डॉलराइजेशन की वकालत करने वाले ऑथर प्रभात सिन्‍हा से बात की. उन्‍हीं बातों को यहां हम बिंदुवार समझाने की कोशिश कर रहे हैं. 

1. मिल्‍टन फ्रीडमैन की थ्‍योरी 

मिल्टन फ्रीडमैन (Milton Friedman) की एक थ्योरी है- मुद्रा परिमाण सिद्धांत (Quantity Theory of Money), ये कहती है- 'अगर मनी सप्लाई प्रोडक्शन की ग्रोथ से तेज बढ़े, तो कीमतें बढ़ती हैं यानी महंगाई आ जाती है.' 

मनसा मूसा के समय में सोना खुद चलन में इस्तेमाल होने वाला 'मनी' था. जब उन्होंने मिस्र (काहिरा) और दूसरे शहरों में अचानक बहुत सारा सोना बांट दिया, तो हुआ ये कि लोगों के हाथ में एकदम से बहुत ज्यादा 'मुद्रा' आ गई. वही सामान, वही सेवाएं, लेकिन उन्हें खरीदने के लिए सोने की मात्रा अचानक कई गुना बढ़ गई.

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2. सोने की वैल्यू गिरती है तो महंगाई बढ़ती है

'डिमांड और सप्‍लाई' यानी मांग और आपूर्ति का फॉर्मूला तो आपने पढ़ा ही होगा. जो चीज किसी भी बाजार में ज्यादा हो जाती है, उसकी कीमत गिरती है. सोने के साथ भी यही हुआ. अरब के लेखकों ने जो कहानी लिखी है, उसके मुताबिक, मिस्र में सोने के बदले मिलने वाले चांदी के सिक्कों का रेश्‍यो 25 दिरहम से गिरकर 22 दिरहम या उससे कम पर आ गया था और ये असर लंबे समय तक रहा.

यानी सोना 'सस्ता' हो गया, उसकी परचेजिंग पावर यानी क्रय शक्ति घट गई. जब सोना ही करेंसी का आधार हो और उसकी वैल्यू गिर जाए, तो प्रैक्टिकली दो चीजें होती हैं- 

पहला- वेल्थ इफेक्ट निगेटिव, यानी जिनके पास पहले से सोना था, उनकी असली दौलत घट जाती है.

दूसरा- मार्केट में ज्यादा गोल्‍ड फ्लो, जिससे व्यापारी सामान की कीमतें बढ़ा देते हैं, क्योंकि हर कोई उसी सामान के लिए ज्यादा चुकाने को तैयार है. यह सीधे-सीधे इन्फ्लेशन है.

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3. आमदनी और बचत की रियल वैल्यू टूट जाती है

अगर किसी देश में अचानक सबके पास फ्री का सोना आ जाए तो जिनकी बचत पहले की है (पुराना सोना, नकद, बैंक डिपॉजिट), उनकी रियल वैल्यू घट जाती है, क्योंकि नई ऊंची कीमतों पर वो पैसा कम चीजें खरीद पाएगा.

सैलरी, पेंशन जैसी चीजें, उतनी तेजी से नहीं बढ़ते, जितनी तेजी से सोने की सप्लाई और कीमतें बदलती हैं, तो आम आदमी की रीयल सैलरी गिरती है.

यानी ऊपर-ऊपर सबको अमीर लगने के बावजूद, असल में उनकी खरीदने की ताकत कम हो जाती है. यही मनसा मूसा के केस में मिस्र में हुआ-कीमतें कई गुना बढ़ीं, सोने का वैल्यू गिरा और मार सबसे ज्यादा मिडिल-क्लास और फिक्स्ड इनकम वालों पर पड़ी.

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4. प्रोडक्शन से ध्यान हटेगा, दिखावे पर शिफ्ट होगा 

जब अचानक सबके पास बहु्त सोना या बेशुमार दौलत आ जाए, तो एक माइंडसेट बदलता है. लोग कम मेहनत, ज्यादा खपत वाली आदतों की तरफ जाते हैं- लक्जरी, इम्पोर्टेड सामान, दिखावटी खर्च.  प्रोडक्टिव इन्वेस्टमेंट (एजुकेशन, मेडिक्‍ल, फैक्ट्री, खेत, टेक्‍नोलॉजी) के बजाय लोग जमीन, गहने, शौकिया चीजों पर ज्यादा लगाना शुरू कर देते हैं.

इससे लॉन्ग-टर्म में दो नुकसान होते हैं. अर्थव्यवस्था की प्रोडक्टिव कैपेसिटी नहीं बढ़ती, सिर्फ पैसा घूमता है. ऐसे में आयात बढ़ सकता है. करेंट अकाउंट पर दबाव आता है, करंसी कमजोर हो सकती है.

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5. मिस-अलोकेशन से प्राइस सिग्नल्‍स गड़बड़ा जाते हैं 

किसी भी इकोनॉमी में 'कीमत' एक सिग्नल होता है कि किस चीज की कमी है और कहां ज्यादा निवेश चाहिए. जब अचानक सोने की बाढ़ आ जाए तो ऐसे में हर चीज की कीमत ऊंची हो जाती है, असली कमी-बढ़त का पता नहीं चलता.

ऐसे में बिजनेस गलत सेक्टरों में इन्वेस्ट कर सकते हैं. ऐसे सेक्‍टर्स, जहां सिर्फ बबल बना है, असली डिमांड नहीं होता. बाद में जब सोने का प्रभाव कम होता है तो ये सेक्टर क्रैश कर सकते हैं. दुनिया बैंकिंग, रियल एस्टेट जैसे सेक्‍टर में ऐसी क्राइसिस देख चुकी है.  

मनसा मूसा के केस में जब उन्होंने बाद में सोना 'उधार लेकर वापस खरीदने' की कोशिश की, तो पहले गोल्ड की वैल्यू ऊपर-नीचे हुई और लेंडर्स सहित कई लोगों की स्थिति खराब हो गई, यानी ज्यादा वॉलेटिलिटी, कम स्टेबिलिटी.

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6. आज अगर सोना या 'फ्री मनी' बांट दी जाए तो क्‍या होगा?

अगर आज कोई सरकार बड़ी मात्रा में लोगों को फ्री सोना, फ्री कैश, या असीमित सब्सिडी दे दे, जबकि प्रोडक्शन/उत्पादन वही रहे, तो नतीजा लगभग यही होगा. 

हाई इन्फ्लेशन या हाइपरइन्फ्लेशन, यानी कि ज्यादा पैसे में उतना सामान, जो कम पैसे में मिलते रहे हैं. करेंसी पर भरोसा टूटेगा. लोग डॉलर या गोल्ड में भागने लगेंगे. रियल सेविंग्स की वैल्यू घटेगी, जिससे मिडिल क्लास बहुत ज्‍यादा प्रभावित होगा. 

अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ सकती है. जो पहले से जमींदार हैं, एसेट ऑनर हैं (स्टॉक्स, प्रॉपर्टी), वो कीमत बढ़ने से और अमीर, जो सिर्फ सैलरी या दूसरे रोजगार से आमदनी पर गुजर-बसर कर रहे हैं, वो और गरीब होते चले जाएंगे. 

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मनसा मूसा की कहानी से हम क्‍या सीखते हैं? 

किसी देश के लिए सस्टेनेबल वेल्थ का मतलब है- प्रोडक्टिव एसेट्स (फैक्ट्रियां, स्किल्स, टेक्नॉलजी, इन्फ्रा), न कि सिर्फ ज्यादा सोना या कागजी पैसा. अगर गोल्ड या करेंसी की सप्लाई बढ़े लेकिन उत्पादन, प्रोडक्टिविटी, टेक्नॉलजी और काम के घंटे न बढ़ें, तो लंबे समय में इकोनॉमी को महंगाई, असमानता और वित्तीय अस्थिरता का झटका लगना तय है.

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आज भी मनसा मूसा की कहानी इसलिए क्लासिक केस स्टडी बनी रहती है कि एक आदमी के दान-दक्षिणा ने पूरे के पूरे देश के लिए आर्थिक असंतुलन पैदा कर दिया, जिसकी बर्बादी से उबरने में एक दशक से भी ज्‍यादा लग गए.  

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