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Delhi EV Policy 2026: दिल्ली के 56 लाख दोपहिया वाहनों पर 'पॉलिसी' की तलवार! टेंशन में 4000 करोड़ का कारोबार

Delhi EV Policy: सरकार पुरानी बाइक हटाने पर 10,000 रुपये और नई ईवी बाइक खरीदने पर 30,000 रुपये तक की सब्सिडी दे रही है. लेकिन एक मिडिल क्‍लास फैमिली के लिए ये गणित पर्याप्‍त नहीं बैठ रहा है.

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Delhi EV Policy 2026 Impact on Petrol Bikes: दिल्‍ली में 4,000 करोड़ के कारोबार पर संकट?

Delhi EV Policy Draft: दिल्ली सरकार की नई 'EV Policy 2026' का ड्राफ्ट सामने आते ही राजधानी के लाखों दोपहिया वाहन मालिकों और मोटरसाइकिल कारोबारियों की धड़कनें तेज हो गई हैं. पॉलिसी में 1 अप्रैल 2028 से सिर्फ इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों के रजिस्ट्रेशन का कड़ा नियम प्रस्तावित है. ज्यादा तनाव ओला-उबर जैसे एग्रीगेटर्स और स्विगी-जोमैटो के डिलीवरी पार्टनर्स के लिए है. नियम के मुताबिक, ये कंपनियां अगले साल से नए पेट्रोल वाहन नहीं जोड़ पाएंगी. यानी जो लोग अपनी बाइक से पार्ट-टाइम काम कर घर चलाते हैं, उनके पास बदलाव के लिए बहुत कम समय बचा है. इन चुनौतियों के बीच बड़ा सवाल ये भी है कि क्या दिल्ली जैसे महानगर के लिए ये लक्ष्य व्यावहारिक है, या ये लोगों की जेब पर एक नया खर्च साबित होगा? 

56 लाख वाहन और 2 साल का वक्त

दिल्ली की सड़कों पर फिलहाल 56 लाख से ज्यादा दोपहिया वाहन दौड़ रहे हैं. आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में हर साल करीब 5 लाख नई बाइक बिकती हैं, जिनमें इलेक्ट्रिक (EV) की हिस्सेदारी महज 7.3 फीसदी (करीब 35-40 हजार) ही है. जानकारों का कहना है कि सिर्फ दो साल के भीतर इस आंकड़े को 100% पर ले जाना नामुमकिन जैसा है. न तो बाजार में इतनी ईवी बाइक की सप्लाई है और न ही चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर उस स्तर का है.

आम आदमी के लिए सब्सिडी या नया खर्च?

सरकार पुरानी बाइक हटाने पर 10,000 रुपये और नई ईवी बाइक खरीदने पर 30,000 रुपये तक की सब्सिडी दे रही है. लेकिन एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह गणित बैठ नहीं रहा है. एक अच्छी पेट्रोल बाइक 80,000 से 1 लाख रुपये में आती है, जबकि दमदार रेंज वाली ईवी बाइक की कीमत इससे कहीं ज्यादा है. ऐसे में क्या 40 हजार रुपये की कुल मदद एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति को उसकी चलती-फिरती पेट्रोल बाइक छोड़ने के लिए प्रेरित कर पाएगी?

पूर्व डिप्‍टी कमिश्ननर बोले- मिक्‍स फ्लीट हो 

पूर्व डिप्टी कमिश्नर अनिल छिकारा इस नीति को 'थोपने' वाला कदम बताते हैं. उनका कहना है, 'यह पैनिक (अफरा-तफरी) पैदा करेगा. दिल्ली में मिक्स फ्लीट (पेट्रोल और ईवी दोनों) होनी चाहिए. सरकार को जनता के पैसे का इस्तेमाल निजी वाहनों को सब्सिडी देने के बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करने में करना चाहिए.'

4000 करोड़ का कारोबार खतरे में!

दिल्ली में बाइक का सालाना कारोबार करीब 4,000 करोड़ रुपये का है, जिससे 50 हजार से ज्यादा लोग सीधे जुड़े हैं. डीलरों को डर है कि अगर सख्ती हुई तो ग्राहक दिल्ली के बजाय नोएडा, गाजियाबाद या गुरुग्राम का रुख करेंगे. 

साफ है कि प्रदूषण कम करना जरूरी है, लेकिन 56 लाख वाहनों के भविष्य का फैसला लेते समय सरकार को जमीनी हकीकत और आम आदमी की क्षमता को भी ध्यान में रखना होगा. फिलहाल, 10 मई तक जनता से सुझाव मांगे गए हैं. वहीं, इस मुद्दे पर चर्चा के लिए डीलर एसोसिएशन ने 17 अप्रैल को एक अहम बैठक बुलाई है.

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