Crude Oil Prices Hike: अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते हमलों ने एक बार फिर से दुनिया को मार्च 2026 की ओर धकेल दिया है, जब कच्चे तेल के भाव 115 डॉलर के पार पहुंच गए थे. हमले यूं ही जारी रहे तो अप्रैल वाली स्थिति भी आ सकती है, जब ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल के भाव पहुंच जाए. आज मंगलवार, 15 सितंबर को ब्रेंट क्रूड के भाव 107 डॉलर के करीब ट्रेंड कर रहे हैं. सोमवार को 3.33 फीसदी से ज्यादा उछाल के साथ 108 डॉलर के भाव पर पहुंच गए थे.
इस संकट के बीच रूस ने एक बार फिर भारत की मदद को लेकर प्रतिबद्धता जताई है. रूस के प्रवक्ता ने NDTV से बातचीत में कहा कि मॉस्को भारत को जरूरत के मुताबिक तेल देने को तैयार है. रूस का तर्क है कि रूसी तेल के बिना ग्लोबल एनर्जी मार्केट को संभालना मुमकिन नहीं है.
हालांकि रूस से कच्चा तेल खरीदने वाला भारत, उसे ही तेल रिफाइन कर पेट्रोल बनाकर बेचता है. कारण कि रूस की कुछ रिफाइनरीज यूक्रेन के हमलों के चलते प्रभावित हैं. CREA यानी सेंटर फॉर रिसर्च एंड क्लीन की रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त में रूस ने भारत से 1.72 लाख टन तेल उत्पाद खरीदे. इनमें रूसी कच्चे तेल से ही रिफाइन कर बनाया गया पेट्रोल भी शामिल था.
भारत को 120 डॉलर के भाव पड़ रहा कच्चा तेल
वहीं भारतीय बास्केट के लिए कच्चा तेल 120 डॉलर के करीब पहुंच गया है. पेट्रोलियम मंत्रालय के PPAC की रिपोर्ट के अनुसार, 11 सितंबर को कच्चे तेल के भारतीय बास्केट की कीमत 119.69 डॉलर/बैरल हो गई है. इस महीने का औसत मूल्य 108 डॉलर के करीब दिखा रहा है, जोकि आगे तेजी से बढ़ सकता है.
होर्मूज पर संकट, सऊदी से सप्लाई कट
होर्मूज होकर तेल-गैस के टैंकर वाले जहाजों की आवाजाही बाधित है, दूसरी ओर सऊदी अरब ने हमलों के बाद ईस्ट-वेस्ट पाइपाइन को बंद कर दिया है. इससे तेल सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है. सप्लाई को लेकर चिंताएं सऊदी अरब के तेल उत्पादन में भारी गिरावट के कारण और बढ़ गई हैं. सऊदी अरब ने OPEC को बताया कि उसने अगस्त में 6.2 मिलियन बैरल प्रति दिन का उत्पादन किया, जो 2016 के बाद से दर्ज किया गया सबसे कम मासिक उत्पादन है और जुलाई के स्तर से 23% कम है.
पिछले ढाई महीने के दौरान कच्चे तेल का भाव 50 फीसदी से ज्यादा चढ़ गया है. आंकड़े दिखा रहे हैं कि ब्रेंट क्रूट के दाम 52% तक बढ़ गए हैं.
तेल की कीमतों में उछाल उन रिपोर्टों के बाद आया जिनमें कहा गया कि सऊदी अरब ने ड्रोन हमलों के बाद अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को कुछ समय के लिए बंद कर दिया था और रविवार को होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में एक कमर्शियल जहाज पर हमला हुआ, जिसमें ईरानी अधिकारियों के अनुसार एक व्यक्ति की मौत हो गई और तीन घायल हो गए.
ईरान ने इस जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण कड़ा कर दिया है. इसके तहत जहाजों को गुजरने के लिए इजाजत लेनी पड़ती है और सर्विस फीस लगाने के तरीके पर विचार किया जा रहा है, जबकि नियमों का पालन न करने वाले जहाजों पर हमले भी हुए हैं.
अमेरिका ने भी इस जलडमरूमध्य पर इस्लामिक रिपब्लिक (ईरान) के नियंत्रण को चुनौती देने के लिए ईरानी तट पर बमबारी की. इस बीच, ओमान ने भी इस रणनीतिक जलमार्ग के भविष्य पर ईरान और खाड़ी देशों के बीच होने वाली बातचीत को टाल दिया.
रूस बोला- हम भारत की मदद के लिए हरदम तैयार
दिल्ली में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव (Denis Alipov) ने भी अमेरिका के तरीकों और दबाव वाली नीतियों की आलोचना की है. उन्होंने कहा है कि मॉस्को भारत के साथ तेल की सेल जारी रखने के लिए तैयार है. उन्होंने कहा, 'हम भारत को जितनी जरूरत हो, उतना तेल सप्लाई करने के लिए तैयार रहेंगे. ये बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि जो लोग प्रतिबंध और टैरिफ लगाते हैं, उन्होंने सहयोग के बजाय दबाव बनाने का रास्ता चुना है.' उन्होंने कहा कि वे देश भारत को तेल के मामले में हमसे बेहतर डील नहीं दे पाते हैं.
रूसी अधिकारी ने कहा, 'अगर रूसी कच्चे तेल की बिक्री रोकी गई, तो दुनिया इसे संभाल नहीं पाएगी. ऊर्जा बाजार रूसी तेल को बाहर रखने का जोखिम नहीं उठा सकते. रूसी तेल भारत और अन्य देशों के लिए बाजार में उपलब्ध रहेगा. हम भारत को तेल की आपूर्ति करने में रुचि रखते हैं. भारत उस तेल को खरीदने में रुचि रखता है.' इधर भारत ने भी कहा है कि वह ऊर्जा बाजार की मौजूदा स्थिति में अपनी आबादी की जरूरतों को प्राथमिकता देना जारी रखेगा.
होर्मूज और लाल सागर संकट पर बाजार की नजर
बाजार की नजरें खाड़ी और लाल सागर (Red Sea) के शिपिंग रूट पर सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं पर हैं. इन रूटों पर दिक्कतें बढ़ गई हैं, क्योंकि हूती (Houthi) ताकतों ने अहम बंदरगाहों पर कब्जा कर लिया, जो दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा संभालते हैं.
अगस्त की शुरुआत में दर्ज किए गए निचले स्तरों से ब्रेंट की कीमतों में 30% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. ऐसा तब हुआ जब हमलों को रोकने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच पक्का समझौता करने की कोशिशें नाकाम रहीं. अगस्त के बाद में लड़ाई फिर से शुरू हो गई, जिससे खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल की सप्लाई की सुरक्षा को लेकर चिंताएं और बढ़ गईं.
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