भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जहां विविधता, समानता और प्रतिनिधित्व को अत्यंत महत्व दिया जाता है. किंतु यह भी सत्य है कि देश की कुल जनसंख्या का लगभग आधा भाग होने के बाद भी महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी अभी तक सीमित ही है. इस असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और युगांतकारी कदम के रूप में सामने आया है.
महिलाओं को आरक्षण से क्या मिलेगा
नरेंद्र मोदी सरकार ने सितंबर 2023 में संसद में संविधान (एक सौ छठा संशोधन) अधिनियम, 2023, नारी शक्ति वंदन अधिनियम के जरिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया था. यह कानून महिलाओं को नीति-निर्माण की प्रक्रिया में सशक्त भागीदारी प्रदान करने का एक सुदृढ़ माध्यम है. इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए आगामी जनगणना एवं परिसीमन की प्रक्रिया का पूर्ण होना आवश्यक है. तत्पश्चात ही यह व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू की जाएगी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसे सुव्यवस्थित एवं दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ लागू करने की योजना बनाई गई है.
महिला आरक्षण का विषय भारतीय राजनीति में लंबे समय से विचाराधीन रहा है. साल 1996 में पहली बार इसे संसद में पेश किया गया था, किंतु विभिन्न राजनीतिक मतभेदों के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका. कई दशकों तक यह विषय चर्चा और बहस का केंद्र बना रहा. स्थानीय निकाय और पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू होने के बाद यह स्पष्ट हुआ कि महिलाएं प्रशासनिक और नेतृत्वकारी भूमिकाओं में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो सकती हैं. इस अनुभव ने राष्ट्रीय स्तर पर महिला आरक्षण की आवश्यकता को और अधिक प्रबल किया.
नरेंद्र मोदी सरकार में महिला सशक्तिकरण
इस अधिनियम को साकार रूप देने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है. उन्होंने इसे केवल एक विधायी प्रावधान के रूप में नहीं, बल्कि 'नारी शक्ति के सम्मान और सशक्तिकरण' के रूप में पेश किया है. प्रधानमंत्री ने कई बार यह कहा है कि महिलाओं की उन्नति के बिना राष्ट्र का समग्र विकास संभव नहीं है. उनके नेतृत्व में केंद्र सरकार ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं चलाई हैं जैसे- प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, जन-धन योजना और स्वच्छ भारत अभियान. इन सभी प्रयासों का उद्देश्य महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक एवं स्वास्थ्य संबंधी दृष्टि से सशक्त बनाना रहा है.
नारी शक्ति वंदन अधिनियम इन पहलों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो महिलाओं को राजनीतिक सशक्तिकरण प्रदान करने की दिशा में एक ठोस आधार प्रस्तुत करता है. प्रधानमंत्री की दृष्टि में महिला सशक्तिकरण केवल एक सामाजिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है.इस अधिनियम का प्रभाव व्यापक एवं दूरगामी होने की संभावना है. जब महिलाएं संसद और विधानसभाओं में अधिक संख्या में प्रतिनिधित्व करेंगी, तब उनकी समस्याएं, अनुभव और दृष्टिकोण नीति-निर्माण में अधिक प्रभावी रूप से परिलक्षित होंगे. महिलाओं की भागीदारी से शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा एवं सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर अधिक संवेदनशील और व्यावहारिक नीतियां बन सकेंगी.इसके साथ ही यह अधिनियम समाज में लैंगिक समानता को सुदृढ़ करने में भी सहायक सिद्ध होगा.
महिला आरक्षण कानून की चुनौतियां और आलोचनाएं
हालांकि यह अधिनियम अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसकी कुछ चुनौतियां भी हैं. इनमें सबसे पहली है इसके क्रियान्वयन की समय-सीमा को लेकर अनिश्चितता है, क्योंकि यह जनगणना एवं परिसीमन की प्रक्रिया पर निर्भर है. इसके अतिरिक्त, कुछ विद्वानों का मत है कि इससे प्रतिनिधि राजनीति की समस्या उत्पन्न हो सकती है, जहां वास्तविक निर्णय किसी अन्य के द्वारा लिए जाएं. इसके साथ ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए पृथक आरक्षण की मांग भी समय-समय पर उठाई जाती रही है. सरकार को इस दिशा में भी ध्यान देना होगा.
नारी शक्ति वंदन अधिनियम की सफलता के लिए यह जरूरी है कि महिलाओं को केवल आरक्षण ही न दिया जाए, बल्कि उन्हें राजनीतिक प्रशिक्षण, संसाधन और अवसर भी उपलब्ध कराए जाएं. राजनीतिक दलों को भी अपनी संरचना में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी. यदि इन सभी पहलुओं पर समुचित ध्यान दिया गया, तो यह अधिनियम भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी और सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देगा.
नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐतिहासिक एवं दूरदर्शी पहल है. यह न केवल महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र में समान अवसर प्रदान करता है, बल्कि समाज में समानता, न्याय और सहभागिता की भावना को भी सुदृढ़ करता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह अधिनियम इस बात का प्रतीक है कि भारत अब उस दिशा में अग्रसर है, जहां महिलाओं को केवल सहभागिता ही नहीं, बल्कि नेतृत्व की भूमिका भी प्रदान की जा रही है. यदि इस अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह न केवल भारतीय राजनीति की दिशा को परिवर्तित करेगा, बल्कि समाज में महिलाओं की स्थिति को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा. यह वास्तव में नारी शक्ति के सम्मान, सशक्तिकरण और राष्ट्र निर्माण के प्रति एक दृढ़ संकल्प का प्रतीक है.
(डिस्क्लेमर: लेखक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय के राजनीति विज्ञान विभाग में पोस्ट डॉक्टोरल फेलो हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)