विज्ञापन

भारत और अरबों के बीच दीवार थे राजा दाहिर, पाकिस्तान ने तो की नाइंसाफी ही, भारत ने भी इंसाफ न किया

आग़ा मीर सैयद अब्बास हुसैन खोरासानी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 19, 2026 13:16 pm IST
    • Published On जून 19, 2026 12:58 pm IST
    • Last Updated On जून 19, 2026 13:16 pm IST
भारत और अरबों के बीच दीवार थे राजा दाहिर, पाकिस्तान ने तो की नाइंसाफी ही, भारत ने भी इंसाफ न किया

भारत का राष्ट्रगान बिना सिंध के अधूरा है और सिंध बिना उसके आखिरी सिंधी बादशाह राजा दाहिर के अधूरा है. ब्राह्मण वंश के इस आख़िरी राजा का दौर 663 से 712 ईस्वी तक था. उनका शासन करीब-करीब पूरे आधुनिक पाकिस्तान से लेकर मालवा तक फैला था. उस दौर के सिंध के बारे में मौजूद जानकारियां सिंध को एक बहुसांस्कृतिक, वैभवशाली और असल अर्थों में सेक्युलर देश और समाज के तौर पर पेश करती हैं. अरब आक्रमण से कुछ साल पहले चीनी यात्री ह्वेन त्सांग भारत आए थे. उन्होंने सिंध में 460 बुद्ध विहारों और 26000 बौद्ध भिक्षुओं के होने का ज़िक्र किया है. इसके साथ ही पूर्वी मकरान में सिंधु डेल्टा से 80 मील पूर्व में हिंगलाज माता के प्रसिद्ध मंदिर समेत अनेकों मंदिरों के अवशेष हैं. मुल्तान (मूलस्थान) का सूर्य मंदिर कुष्ठ रोग समेत तमाम बीमारियों के इलाज के लिए प्रसिद्ध था . इन सबके शासक राजा दाहिर थे. सिंध की राजधानी ब्राह्मणाबाद थी. जिस तरीके का सिंध था, उसी बहुआयामी समाज की कल्पना के रूप में हम भारत को देखते हैं.

राजा दाहिर की विरासत 

राजा दाहिर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को अरब के इतिहास में झांकें बिना पूरी तरह नहीं समझा जा सकता है . 661 ई० के इस्लामिक अरब में कबीले बनू उमय्या की हुकूमत आ गई. इसे इतिहासकार उमय्यद खिलाफत कहते हैं. ये शुरुआत से ही हज़रत पैगंबर मुहम्मद साहब (स.अ.व.) के खानदान के दुश्मन रहे हैं. उस खानदान का सिंध से पुराना रिश्ता रहा है, इस नाते सिंध को भी इन्होंने अपना दुश्मन माना. इतिहासकार डेरिल एन मक्लीन और इब्ने अथीर ने बताया कि पैगंबर के दामाद हज़रत अली (अ.स.) की सेना में सिंध के जाट थे, जो बनू उमय्या के खिलाफ लडे थे. उनमें प्रमुख नाम हारिस इबने मुर्रा अल अब्दी और सैफी इबने शाबानी था, जो सिन्धी कमांडर थे. किताब अल तबरी के अनुसार 660 ई. में मौला अली (अ.स.) की शहादत के बाद ही बनू उमय्या ने सैफी का क़त्ल हुज्र बिन अदि अल किंदी के साथ किया था. 2013 में बनू उमय्या की विचारधारा पर चलने वाले इस्लामिक स्टेट ने इन्ही हुज्र बिन अदि अल किंदी के मज़ार पर पुनः हमला कर के तोड़ दिया. बाद में करीब 500 शियाओं ने बनू उमय्या के अत्याचार से बचने के लिए सिंध में ही शरण ली और राजा दाहिर की तरफ से कन्नौज के खिलाफ जंग भी लड़ी. शियाओं के चौथे इमाम- इमाम ज़ैनुलाबिदीन (अ.स.) का विवाह सिंध की ही जायदा-अल-सिंधी से हुआ था, जिनकी संतान हज़रत ज़ैद-ए-शहीद थे. पुरातत्ववेत्ता ऑगस्टस फोर्टूनेटस बेल्लासिस ने बताया कि शियाओं के पांचवें इमाम- इमाम मोहम्मद बाकिर (अ. स.) के नाम का सिक्का तक राजा दाहिर की राजधानी ब्राह्मणाबाद से प्राप्त हुआ है. सूफी साहित्य नुजहतुल खवातिर के अनुसार शियाओं के छठें इमाम- इमाम जाफ़र सादिक (अ. स.) के  बहुत सारे सिन्धी छात्र थे जैसे अबान सिंधी, खालिद सिंधी और फराज सिंधी.

हुसैनी ब्राह्मण कौन हैं

यह भी उल्लेखनीय है कि पैगंबर के नवासे इमाम हुसैन (अ.स.), जिन्हें उमय्यद खलीफा यजीद ने कर्बला में शहीद किया का साथ देने के लिए कर्बला की तरफ सिंध के ही ब्राह्मण गए, जिन्हें आज हम हुसैनी ब्राह्मण के नाम से जानते हैं. स्पष्ट है सिंध के लोगों ने पैगंबर के खानदान का साथ दिया और बनू उमय्या ने उन्हें अपने दुश्मन माना. इसलिए बनू उमय्या की तरफ से सिंध पर 712 ई. से पहले 14 बार हमले हुए . इतिहास में सिंध के विरोधियों में सबसे बड़ा नाम हज्जाज बिन युसूफ का आता है, जो इमाम हुसैन (अ.स.) के कातिल यजीद का कमांडर था. उसी के निर्देश पर उसने खाना-ए-काबा पर सात दिन तक आग बरसाई थी . हज्जाज बिन युसूफ जब इराक का गवर्नर था तब उसने मोहम्मद बिन क़ासिम को सिंध पर आक्रमण करने के लिए भेजा. हज्जाज-बिन-युसूफ ने मुहम्मद बिन क़ासिम को स्पष्ट निर्देश दिया था कि दायबुल (वर्तमान कराची) के लोगों को किसी भी तरह की माफ़ी न दी जाए अर्थात उनका नरसंहार कर दिया जाए . कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजा दाहिर से नाराज़ उस दौर के कुछ बौद्धों ने आक्रान्ता मुहम्मद बिन क़ासिम का साथ दिया था, लेकिन बाद में उनका भी वही हश्र हुआ जो ख़लीफ़ा के ज़ुल्म का विरोध करने वाले सिंधियों का हुआ .

इतिहासकारों ने सिंध के साथ न्याय नहीं किया और अरब आक्रमण का आधा-अधूरा चित्रण किया. इलियट और मरे जैसे  ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे इस्लाम बनाम मूर्तिपूजा की जंग बताया. मजुमदार ने इसे धर्म परिवर्तन का एक सिलसिला बताया. और तो और मोहम्मद हबीब और मोलवी साहिब हाशमी जैसे लोगों ने आक्रान्ता मुहम्मद बिन क़ासिम को सच्चा और चरित्रवान तक बता डाला . मुहम्मद बिन क़ासिम  द्वारा किए गए जनसंहार और सांस्कृतिक विनाश की निंदा की बजाए, इतिहासकारों ने पक्षपाती तरीके से उसके चरित्र का आकलन करना पसंद किया और उसको इस्लाम के रूप में पेश किया . इतिहासकारों ने तो 712 ई० के आक्रमण को भारत में इस्लाम का आगमन तक बता डाला जबकि उसके पहले सिंध और कनारा (करावली), कर्नाटक तक में हज्जाज बिन युसूफ से बचने के लिए लोग आकर बस्तियां तक बसा चुके थे . 

मुहम्मद बिन क़ासिम को अपना पहला नागरिक क्यों बताता है पाकिस्तान

इसी तरह पाकिस्तान सरकार ने 1997 में 'फिफ्टी इयर्स ऑफ़ पाकिस्तान' नामक पत्रिका में मुहम्मद बिन क़ासिम जैसे आक्रान्ता को अपना पहला नागरिक बताया. यही वहां की स्कूलों में पढ़ाया भी जाता है . यहां तक कि सक्कर जिले के रोहरी ताल्लुका में मस्जिद मोहम्मद बिन क़ासिम तामीर कराई गई. जनरल ज़िया उल हक़ के दौर से ही जमात-ए-इस्लामी पकिस्तान जैसे संगठन मोहम्मद बिन क़ासिम को फातेह-ए-सिंध घोषित करके अरब की सिंध पर जीत का जश्न हर साल मनाते हैं. उर्दू लेखक नसीम हिजाज़ी (1914-1996) नें इन्हीं आक्रांताओं को पाकिस्तानी राष्ट्रवाद से जोड़कर 1950 में ऐतिहासिक उपन्यास 'मुहम्मद बिन क़ासिम'लिखा था. यहां तक कि परवेज़ मुशर्रफ तक ने ख़ुद को आधुनिक मोहम्मद बिन क़ासिम घोषित किया था.

पाकिस्तान का चरित्र तो जगजाहिर है, पर दुखद यह है कि आज भी हम राजा दाहिर के साथ न्याय नहीं कर पाए हैं. उनके राज में तमाम धर्म संप्रदाय इत्यादि बाग़ में फूल की तरह महक रहे थे और वो सिंध को आक्रांताओं से बचाते हुए शहीद हो गए. उन पर सबसे बड़ा स्रोत 'छछनामा' है . मूल रूप से अरब आक्रमण और शासन के समय उस्मान अल सक़फ़ी ने सिंध के बारे में लिखा. उसकी अरबी भाषा में लिखी किताब को बाद में अली इबने हामिद इबने अबू बकर कूफी ने फ़ारसी भाषा में अनुवाद किया, जिसे हम 'छछनामा' के नाम से जानते हैं. यह किताब अरब आक्रान्ता के नजरिए से आक्रमणकारियों द्वारा लिखी गई है. इसमें राजा दाहिर के चरित्र-चित्रण के साथ छेड़छाड़ की गई है. अरबों ने लिखा है कि राजा दाहिर के ज़ुल्म के खिलाफ मुस्लिम औरतों ने तत्कालीन उमय्यद खलीफा को ख़त लिखा, जिसकी वजह से उसके कहने पर हज्जाज बिन युसूफ ने मोहम्मद बिन क़ासिम को भेजा. जबकि सच तो ये है कि बगल के मकरान में मुस्लिम हुकूमत थी और उसके साथ राजा दाहिर के संघर्ष का कोई प्रमाण नहीं मिला है. इसके साथ ही जिस उमय्यद खलीफा को महिलाओं का मददगार बताया गया, वो ख़ुद ही यजीद इबने मुआविया के दौर में मदीना-ए-मुनव्वरा में तीन दिन तक लूटपाट और मुस्लिम अरब महिलाओं का बलात्कार कर रहे थे. इसे इतिहास में वाकया-ए- हुर्रा के नाम से जाना जाता है. एक और इलज़ाम जो राजा दाहिर पर लगाया गया है, वह यह है कि उन्होंने अपनी बहन से विवाह किया था, जबकि ये सब जानते हैं कि हिन्दू धर्म में ये प्रतिबंधित है. इसलिए एक ब्राह्मण राजा द्वारा ऐसा किया जाना संभव नहीं है. 'छछनामा' में राजा दाहिर की दो बेटियों को खलीफा के पास भेजे जाने की बात कही गई है, जिनका भी कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है.

दोआबा का इतिहास

'छछनामा' के अनुवादक अली इबने हामिद अपने सगे भाई सैयद अमीर हमज़ा जैदी के साथ मंगोलों से युद्ध करते हुए 13वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में भारत आए थे . मनबा -उल- अन्साब (1426) के अनुसार सुलतान इल्तुतमिश ने सैयद अमीर हमज़ा को अपने तख़्त की पेशकश की, परन्तु उन्होंने दोआबा का इलाका लिया और काले तुर्क (कारा कोयुन्लू) लोगों को वहां बसाया, जिससे उस जगह का नाम कारा पड़ा, जो अब कड़ा है. तारीख आईन-ए-अवध (1880), तारीख कड़ा मानिकपुर (1916) और डब्लू ई फ़ोर्ब्स की 'हिस्ट्री ऑफ़ अवध फ्रॉम दी एअर्लिएस्ट टाइम्स' बताती है कि बाद में इन्हीं की वंश परंपरा में सैयद इब्राहीम, सैयद इस्माइल उर्फ़ बड़े मीर और शाह नुरुद्दीन जैसे लोग निकले, जिन्होंने ज़ालिम बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक के खिलाफ 18 राजपूतों को संरक्षण देते हुए संघर्ष का बिगुल बजाया. 'बयान-उल-अन्साब सादात जैदिया' (1914), 'तारीख शिराज-ए-हिन्द जौनपुर' (1963), 'तारीख सलातीन शर्की और सूफिया जौनपुर भाग -1' (1988), 'मिरातुल असरार' (1997), और 'सलातीन - ए - जौनपुर' (फ़ारसी पाण्डुलिपि ) के अनुसार शर्की राजवंश, इलियास शाही और हुसैन शाही सल्तनत, बंगाल और  सैयद वंश की जड़ें भी इसी जैदी खानदान से जुडी हुई हैं . इसी पर डब्लू सी बेंनेट ने कहा कि दोआबा वो है जहां दिल्ली की सत्ता बार-बार चुनौती पाती और पराजित होती रही है. इसी परिवार के संत सैयद असासुद्दीन आफ़ताब-ए- हिंद ने वर्तमान जनपद कौशांबी का 22 गांव दोआबा का बड़ा इमामबाड़ा की स्थापना की, उसके सरपरस्त, इस लेख का लेखक है.'छछनामा' के अनुवादक से लेकर इस लेख के लेखक तक सभी ऊपर बताए गए हज़रत ज़ैद-ए- शहीद के वंशज हैं, जिनकी ननिहाल सिंध है और जिनके खानदान को राजा दाहिर नें बनू उमय्या से बचाने के लिए पनाह दी थी. 

अरबों से आखिरी जंग के समय जब राजा दाहिर के वजीर ने उनसे किसी राजा के यहां शरण लेने की बात की, तो उत्तर में राजा दाहिर ने कहा था,''मैं भारत और अरब सेना के बीच की दीवार हूं. अगर मैं नहीं जीता तो अरबों के मचाये विनाश को कोई नहीं रोक पाएगा.'' इतिहासकारों ने ज़ुल्म के खिलाफ राजा दाहिर और दोआबा के प्रतिरोध को आम लोगों से दूर रखा. लेकिन राजा दाहिर भारत के नायक हैं. उनपर अच्छे से शोध होना चाहिए. उनके चरित्र के साथ-साथ दोआबा के प्रतिरोध को हमारे स्कूलों, विशेष तौर पर मदरसों में पढ़ाया जाना चाहिए, जिससे लोग अपने नायक को पहचान सकें.

(डिस्क्लेमर: लेखक इस्लामिक इतिहास और धर्मशास्त्र के जानकार हैं. उन्होंने कंप्यूटर साइंस विषय से बीटेक भी किया है. वो उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के 22 गांव दोआबा स्थित बड़ा इमामबाड़ा के प्रमुख हैं. वो नक़ीब-अल-अशरफ़ है, जिसका अर्थ है कि वो सादात (हज़रत पैगंबर मुहम्मद साहब) के वंशजों के इतिहास, संस्कृति और परिवार का लेखा-जोखा रखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
India, Pakistan, Hindu
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com