रोहित शर्मा, ईशांत शर्मा और सबसे आगे विराट कोहली... ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सीरीज में टीम इंडिया का कोई भी खिलाड़ी मैदान पर आक्रामक अंदाज अपनाने में पीछे नहीं रहा है।
खिलाड़ियों के बीच मैदान पर इस तरह की नोकझोंक कोई नई बात नहीं है, पर सवाल यह है कि आखिर इससे फायदा किसे हो रहा है। सवाल यह भी है कि क्या आक्रामक क्रिकेट खेलना का यही एक तरीका है, क्योंकि फिलहाल तो टीम इंडिया के इस अंदाज से उसे नुकसान और ऑस्ट्रेलिया को फायदा होता नजर आ रहा है।
पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर अपने जमाने के सबसे आक्रामक खिलाड़ियों में से एक थे, मगर भारत के इस रवैये का वह भी समर्थन नहीं करते।
गावस्कर का कहना है, हम जब क्रिकेट खेलना शुरू करते हैं, तो हम स्लेजिंग नहीं करते, जबकि ऑस्ट्रेलिया बचपन से ये करते हैं, इसलिए अगर आप उन्हें मैदान पर कुछ कहते हैं, तो उन्हें फर्क नहीं पड़ता। अगर आप मैदान पर दूसरे खिलाड़ी को कुछ बोलते हैं और फिर आपका प्रदर्शन ठीक नहीं रहता, तो आप पर दबाव बन जाता है। फिलहाल तो टीम का ये अंदाज ऑस्ट्रेलिया को फायदा पहुंचा रहा है।
सीरीज के दोनों टेस्ट मैच ऑस्ट्रेलिया जीत चुका है, लेकिन अभी तक उनके खिलाड़ियों की ओर से किसी खराब या फिर जरूरत से ज्यादा आक्रामक व्यवहार नहीं देखा गया। शायद उनके साथी फिल ह्यूज की मौत ने पूरे ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट को बदल कर रख दिया है।
ऐसा नहीं कि इन खिलाड़ियों से पहले टीम इंडिया की ओर से कोई आक्रामक क्रिकेट नहीं खेला गया। सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, अनिल कुंबले और वीरेंद्र सहवाग ने अपने पूरे करियर में विरोधी टीमों का हर मौके पर जवाब दिया, लेकिन वे अपने मुंह से ज्यादा अपने खेल से बातें करना पसंद करते थे और यही सबसे बेहतरीन तरीका भी है।
हैरानी की बात यह है कि इन खिलाड़ियों को उनके खेल और उनके व्यवहार के बारे में समझाने वाला कोई नहीं। टीम के कप्तान इस वक्त टीम से उखड़े-उखड़े नजर आते हैं और तभी शायद वह ड्रेसिंग रूम में 'unrest' की बातें कहते हैं। हर कोई जानता है कि विराट कोहली भारत का भविष्य हैं, मगर दुख की बात यह है कि खिलाड़ी मैदान पर उनके प्रदर्शन से ज्यादा उनके तेवर अपना रहे हैं।