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अगर लूला और मैक्रों दिल्ली आकर कनॉट प्लेस और इंडिया गेट गए तो उन्हें क्या याद आ सकता है

विवेक शुक्ल
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    फ़रवरी 12, 2026 15:27 pm IST
    • Published On फ़रवरी 12, 2026 15:23 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 12, 2026 15:27 pm IST
अगर लूला और मैक्रों दिल्ली आकर कनॉट प्लेस और इंडिया गेट गए तो उन्हें क्या याद आ सकता है

ब्राजील के राष्ट्रपति लुइस इनासियो लूला दा सिल्वा और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों आगामी 16-20 फरवरी को राजधानी दिल्ली में आयोजित होने वाले एआई इंपेक्ट समिट में भाग लेने आएंगे. इस दौरान उन्हें राजधानी में अपने-अपने देशों से जुड़े प्रतीकों और ऐतिहासिक संदर्भों को देखने का अवसर मिल सकता है.

कनॉट प्लेस और लूला का भावनात्मक रिश्ता

राष्ट्रपति लूला यदि कनॉट प्लेस जाएं, तो यह उनके लिए भावुक क्षण हो सकता है. लूला का बचपन अत्यंत गरीबी में बीता. उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती दिनों में बूट पॉलिश करके आजीविका चलाई थी. गरीबी को उन्होंने बहुत करीब से देखा और महसूस किया है.

1954 में रिलीज़ हुई राजकपूर की चर्चित फिल्म 'बूट पॉलिश' का पात्र भोला आज भी कनॉट प्लेस में मानो जीवित दिखाई देता है. यहां जगह-जगह लकड़ी के बक्सों के साथ बैठे बूट पॉलिश करने वाले बच्चे और युवक नजर आ जाते हैं. कनॉट प्लेस के एफ ब्लॉक के एक बरामदे में बैठकर बूट पॉलिश करने वाले 42 साल के सुंदर को जब यह बताया गया कि ब्राजील के राष्ट्रपति लूला भी कभी उनकी तरह बूट पॉलिश किया करते थे, तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ. उन्होंने मासूमियत से कहा,''मैं उनसे (लूला से) मिलना चाहूंगा.''

ब्राजील के राष्ट्रपति  लुइस इनासियो लूला दा सिल्वा का बचपन भी काफी गरीबी में बीता है.

ब्राजील के राष्ट्रपति लुइस इनासियो लूला दा सिल्वा का बचपन भी काफी गरीबी में बीता है.

जैतपुर विमान हादसे की स्मृति और लूला

लूला यदि दिल्ली प्रवास के दौरान पृथ्वीराज रोड स्थित यार्क क्रिश्चियन सिमिट्री जाएं, तो वहां एक सांकेतिक कब्र है जो एक भयानक विमान हादसे की याद दिलाती है. कब्र पर अंग्रेजी में अंकित है, 'उनकी स्मृति में, जिन्होंने विमान दुर्घटना में अपने प्राण गंवाए.''

14 जून 1972 को दक्षिण दिल्ली के जैतपुर में हुए विमान हादसे में ब्राजील, जापान, अमेरिका और ब्रिटेन के 82 नागरिकों की मृत्यु हो गई थी. दिल्ली के पुराने निवासियों को उस भीषण दुर्घटना की स्मृतियां आज भी विचलित करती हैं.

कब्र की स्थिति देखकर प्रतीत होता है कि वहां कभी-कभार ही कोई आता होगा. दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी के संयोजक ब्रदर जॉर्ज सोलोमन बताते हैं कि वे क्रिसमस और ईस्टर के अवसर पर यहां आकर पुष्प अर्पित करते हैं. वे कुछ पल वहां खड़े होकर यह भी सोचते हैं कि क्या उन मृतकों के परिजन कभी यहां आए होंगे.

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दिल्ली में लूला को मिला सम्मान

भारत के मित्र लुइस इनासियो लूला दा सिल्वा को 2012 में राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक भव्य समारोह में इंदिरा गांधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. यद्यपि इस पुरस्कार की घोषणा 2010 में ही हो चुकी थी. ब्राजील में गरीबी उन्मूलन और विकास कार्यों को प्रोत्साहन देने के लिए उन्हें यह सम्मान दिया गया.

लूला को यह भी ज्ञात होगा कि भारत के करोड़ों फुटबॉल प्रेमी ब्राजील की टीम और उसके सितारों के प्रशंसक रहे हैं. भारत से हजारों किलोमीटर दूर स्थित पुर्तगाली भाषी ब्राजील के प्रति भारतीय फुटबॉल प्रेमियों की विशेष निष्ठा रही है. पेले, रोमारियो और रोनाल्डो जैसे खिलाड़ियों ने भारत में अपनी अलग पहचान बनाई है.

इंडिया गेट और आर्क द ट्रायम्फ: एक प्रतीकात्मक समानता

यदि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों को इंडिया गेट देखने का अवसर मिले, तो संभव है उन्हें पेरिस स्थित आर्क द ट्रायम्फ की याद आए. भारत और फ्रांस के ये दोनों महत्वपूर्ण स्मारक आश्चर्यजनक समानता लिए हुए हैं.

पेरिस स्थित आर्क द ट्रायम्फ और दिल्ली के इंडिया गेट की डिजाइन में काफी समानता है.

पेरिस स्थित आर्क द ट्रायम्फ और दिल्ली के इंडिया गेट की डिजाइन में काफी समानता है.

इंडिया गेट प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की स्मृति में बनाया गया था. इसके स्तंभों पर शहीदों के नाम अंकित हैं. इसी प्रकार, आर्क द ट्रायम्फ उन फ्रांसीसी सैनिकों की स्मृति में निर्मित हुआ, जिन्होंने विभिन्न युद्धों में अपने प्राण न्योछावर किए. उनके नाम भी इसकी दीवारों पर उत्कीर्ण हैं.

ऐसा प्रतीत होता है कि इंडिया गेट के वास्तुकार एडविन लुटियंस ने इसका डिज़ाइन तैयार करते समय 'आर्क द ट्रायम्फ' से प्रेरणा ली होगी. इंडिया गेट का उद्घाटन 12 फरवरी 1931 को हुआ, जबकि आर्क द ट्रायम्फ का निर्माण 1806 में सम्राट नेपोलियन के आदेश पर आरंभ हुआ और इसे पूर्ण होने में करीब 30 साल लगे. आज यह फ्रांसीसी राष्ट्रीय पहचान का प्रमुख प्रतीक है.

दिल्ली में फ्रांस स्कूल

राजधानी के एपीजे अब्दुल कलाम मार्ग (पूर्व नाम औरंगजेब रोड) पर स्थित फ्रांस स्कूल की स्थापना 1962 में हुई थी. इस प्रकार यह छह दशकों से अधिक की यात्रा पूरी कर चुका है. यह लोदी गार्डन के निकट स्थित है. इस विद्यालय में दिल्ली में निवास करने वाले फ्रांसीसी नागरिकों के साथ-साथ लगभग 40 अन्य देशों के बच्चे भी अध्ययन करते हैं. राजधानी में संचालित विदेशी स्कूलों में इसे विशेष सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.

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