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देश की शान उत्तर प्रदेश: 76 साल का राज्य, जिसने तय की भारत की दिशा, अब सामने है भविष्य की चट्टान सी चुनौती

सत्यम बघेल
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जनवरी 24, 2026 07:56 am IST
    • Published On जनवरी 24, 2026 07:50 am IST
    • Last Updated On जनवरी 24, 2026 07:56 am IST
देश की शान उत्तर प्रदेश: 76 साल का राज्य, जिसने तय की भारत की दिशा, अब सामने है भविष्य की चट्टान सी चुनौती

24 जनवरी 1950 को जन्मा उत्तर प्रदेश आज 76 वर्ष का हो गया. यह सिर्फ एक राज्य की उम्र नहीं, बल्कि उस विचार की यात्रा है जो भारत की राजनीति, संस्कृति और चेतना को दिशा देता रहा है. उत्तर प्रदेश वो राज्य है- जहां से सत्ता का रास्ता निकलता है, जहां से सामाजिक आंदोलनों की लकीरें खिंचती हैं, और जहां से देश अपनी आत्मा पहचानता है. यहां की हर हलचल दिल्ली तक सुनाई देती है, और यहां का हर प्रयोग देश के लिए एक संकेत बन जाता है.

24 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया उत्तर प्रदेश, आजादी के बाद भारत की कल्पना को आकार देने वाले राज्यों में सबसे आगे रहा. देश के सबसे ज़्यादा प्रधानमंत्री इसी धरती से निकले. संसद की सबसे ऊंची आवाजें, सामाजिक न्याय के सबसे तीखे आंदोलन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की सबसे गहरी लकीरें. सबकी जमीन उत्तर प्रदेश ही रही है.

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यूपी को समझना दरअसल भारत को समझना है

लंबे समय तक उत्तर प्रदेश अपनी ही छवि से जूझता रहा. जनसंख्या बोझ बन गई, व्यवस्था पिछड़ती गई और ‘बीमारू' जैसे तमगे एक पूरे प्रदेश की पहचान पर चिपका दिए गए. लेकिन बीते दशक में उत्तर प्रदेश ने खुद से एक कठिन सवाल पूछा- क्या यह प्रदेश अपनी नियति बदल सकता है? और उसी सवाल से बदलाव की राजनीति शुरू हुई.

आज उत्तर प्रदेश की तस्वीर सिर्फ गांव-शहर के फासले या टूटी सड़कों तक सीमित नहीं है. यह प्रदेश अब एक्सप्रेसवे की भाषा बोलता है, एयरपोर्ट की उड़ान समझता है और निवेशकों के भरोसे की जमीन बन रहा है. पूर्वांचल से बुंदेलखंड तक सड़कें अब सिर्फ रास्ते नहीं, आर्थिक संभावनाओं की नसें हैं. गंगा एक्सप्रेसवे से लेकर बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे तक, यह कंक्रीट का नहीं, आत्मविश्वास का निर्माण है.

कानून-व्यवस्था को लेकर उत्तर प्रदेश की बहस सबसे तीखी रही है. लेकिन यह भी सच है कि आज अपराध और सत्ता के गठजोड़ पर खुलकर सवाल उठाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई देती है. राज्य ने यह संकेत दिया है कि डर के समानांतर शासन अब मंजूर नहीं. आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, पर डर से आजादी विकास की शर्त है.

विकास को गले गलाता उत्तर प्रदेश

आर्थिक मोर्चे पर उत्तर प्रदेश ने खुद को सिर्फ उपभोक्ता राज्य से उत्पादक राज्य में बदलने की कोशिश की है. MSME, स्टार्टअप्स, डिफेंस कॉरिडोर, टेक्नोलॉजी पार्क और फिल्म इंडस्ट्री. ये योजनाएं तभी सफल होंगी जब जमीन पर रोजगार में बदलेंगी. शुरुआती संकेत बताते हैं कि प्रदेश अब रोजगार की खोज में बाहर जाने वालों को रोकने की कोशिश कर रहा है.

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आध्यात्म की राजधानी कहें तो गलत नहीं

लेकिन उत्तर प्रदेश की असली पहचान उसकी संस्कृति है. अयोध्या में राम मंदिर सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि राज्य के सांस्कृतिक आत्मविश्वास की वापसी है. काशी विश्वनाथ कॉरिडोर ने आस्था को आधुनिकता से जोड़ा, और मथुरा उस प्रतीक्षा में है जहां परंपरा और विकास साथ चल सकें. यह सांस्कृतिक पुनर्स्थापन अगर समावेशी रहा, तो उत्तर प्रदेश भारत की सॉफ्ट पावर का सबसे बड़ा स्रोत बन सकता है.

साथ ही, यह याद रखना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश सिर्फ मंदिरों का प्रदेश नहीं है. यह वही धरती है, जहां कबीर ने रूढ़ियों पर सवाल उठाए, तुलसीदास ने लोकभाषा को साहित्य का आत्मविश्वास दिया, प्रेमचंद ने समाज की पीड़ा को शब्द दिए और फिराक गोरखपुरी ने इंसानी जज्बातों को दर्शन बनाया.

यही वह प्रदेश है जहां से गांधी की बात अन्याय के खिलाफ निकली, राममनोहर लोहिया ने सत्ता से टकराने की भाषा गढ़ी और आज उसी विरासत में अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला जैसे नाम विज्ञान और भविष्य की उड़ान भर रहे हैं. सवाल पूछने की परंपरा, सच के सामने सत्ता को आईना दिखाने की आदत, और समाज को झकझोर देने का साहस. ये सब उत्तर प्रदेश के डीएनए में शामिल हैं. यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है और यही उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी.

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76 साल की उम्र में उत्तर प्रदेश आज उस चौराहे पर खड़ा है जहां से आगे की दिशा तय होगी. शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश, महिलाओं की सुरक्षा और भागीदारी, दलित-पिछड़े-आदिवासी समाज का वास्तविक सशक्तिकरण. ये वो कसौटियां हैं जिन पर विकास के दावे परखे जाएंगे. अगर राज्य अपनी विशाल आबादी को मानव संसाधन में बदल पाया, तो कोई वजह नहीं कि उत्तर प्रदेश देश की सबसे बड़ी सफलता कहानी न बने.

उत्तर प्रदेश कभी भी आसान राज्य नहीं रहा. न इसे चलाना आसान है, न समझना. लेकिन यही इसकी खूबी है. जो उत्तर प्रदेश को साध ले, वह भारत को दिशा दे सकता है.

76वें स्थापना दिवस पर उत्तर प्रदेश सिर्फ जश्न नहीं मना रहा. वह खुद से वादा कर रहा है. वादा एक ऐसे भविष्य का, जहां उसकी पहचान सिर्फ अतीत से नहीं, बल्कि उसके फैसलों से बनेगी. उत्तर प्रदेश, सिर्फ एक राज्य नहीं, भारत की सबसे बड़ी संभावना है. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि UP सिर्फ एक राज्य नहीं, भारत का स्टेट ऑफ माइंड है.

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