सामाजिक न्याय का उद्देश्य समाज में नई खाइयां बनाना नहीं, पुरानी खाइयों को पाटना है. आरक्षण उस पुल का एक हिस्सा है, पूरा पुल नहीं. शिक्षा, कौशल, अवसर, निष्पक्ष चयन, पारदर्शी व्यवस्था और कानून का समान अनुपालन उस पुल के दूसरे हिस्से हैं. यदि सरकार इन सभी को साथ लेकर चलती है तो सामाजिक न्याय राजनीतिक नारे से निकलकर शासन का संस्कार बनता है. आरक्षण उसका साधन है, प्रतिनिधित्व उसका माध्यम है और अवसर की वास्तविक समानता उसका लक्ष्य. सामाजिक न्याय की यही अवधारणा उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में चरितार्थ हो रही है और समाज के सभी वर्गों को इसका लाभ मिल रहा है. योगी सरकार में की गईं तमाम भर्तियां इसका सशक्त प्रमाण भी हैं.
पहले आरक्षण की मूल अवधारणा को समझिए
आरक्षण की बात करने से पहले इसकी मूल अवधारणा को समझना जरूरी है. इसे सिर्फ सामाजिक न्याय के रूप में ही देखना इस गंभीर विषय के साथ न्याय नहीं होगा. मूल विचार यह है कि जन्म, जाति, आर्थिक हालात या किसी और सामाजिक कारण से जो व्यक्ति अवसरों की दौड़ में पिछड़ गया, उसे आगे बढ़ने का न्यायसंगत मौका मिले. आरक्षण इस लक्ष्य तक पहुंचने का एक संवैधानिक जरिया है, यह खुद मंज़िल नहीं है. इसलिए सामाजिक न्याय को सिर्फ सीटों की संख्या से नहीं आंका जा सकता, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि अवसर किस तरह बंटे, हकदार लोगों तक उनका अधिकार पहुंचा या नहीं और पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और निष्पक्ष रही.
एक तरफ इसके राजनीतिक मायने निकाले जाते हैं, दूसरी तरफ प्रशासनिक और चयन संस्थाओं पर संवैधानिक प्रावधानों को सही तरीके से लागू करने की ज़िम्मेदारी होती है.
क्या कहते हैं आंकड़े?
उत्तर प्रदेश में 1 अप्रैल 2017 से 31 मार्च 2026 तक हुई सरकारी नियुक्तियों के आंकड़ों को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए. इन आंकड़ों के मुताबिक कुल नियुक्तियों में सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी 37.93 प्रतिशत रही. ओबीसी वर्ग को 36.38 प्रतिशत, अनुसूचित जाति को 20.14 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 0.97 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 4.58 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली. ये आंकड़े यह समझने का आधार देते हैं कि आरक्षण और नियुक्ति की व्यवस्था असल में किस दिशा में चल रही है.
सामाजिक न्याय का सही मतलब है अवसर की असमानता दूर करना
इन आंकड़ों को दखते हुए हमें उन गलतफहमियों पर बात करनी चाहिए जो ‘अनारक्षित' शब्द को लेकर पैदा होती हैं या फिर की जाती हैं. अनारक्षित का मतलब है किसी खास जाति या वर्ग के लिए तय नहीं. अगर आरक्षित वर्ग का कोई अभ्यर्थी अपनी काबिलियत से अनारक्षित वर्ग की कटऑफ से ज्यादा अंक लाता है, तो वह अनारक्षित सीट पर भी चुना जा सकता है. यानी आरक्षण और योग्यता के बीच वह टकराव है ही नहीं, जिसे राजनीतिक बहसों में अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. अब आरक्षण के दर्शन की बात करते हैं, यह उन लोगों को मौका देता है जिन्हें सामाजिक और ऐतिहासिक वजहों से बराबरी की प्रतिस्पर्धा नसीब नहीं हुई, लेकिन जब वही अभ्यर्थी खुली प्रतियोगिता में बेहतर करता है, तो उसकी प्रतिभा को आरक्षण की सीमा में बांधना ठीक नहीं. इसीलिए सामाजिक न्याय का असली मतलब अवसर की असमानता दूर करना है, योग्यता का रास्ता रोकना नहीं.

UP Social Justice Model: यूपी का सामाजिक न्याय मॉडल
प्रारंभिक परीक्षा चयन की आखिरी मंजिल नहीं
उत्तर प्रदेश में सरकारी नियुक्तियों को लेकर एक और भ्रम प्रारंभिक परीक्षा के नतीजों से जुड़ा है. प्रारंभिक परीक्षा चयन की आखिरी मंजिल नहीं होती, उसके आधार पर अंतिम नियुक्ति नहीं होती. उत्तर प्रदेश लोक सेवा अधिनियम, 1994 और संबंधित शासनादेशों के मुताबिक आरक्षण का फायदा अंतिम चयन के स्तर पर ही मिलता है. इसलिए प्रारंभिक परिणाम को ही अंतिम आरक्षण व्यवस्था मान लेना न तो कानूनी प्रक्रिया की सही तस्वीर पेश करता है, न ही अभ्यर्थियों के बीच फैली गलतफहमी दूर करता है. इसी सिलसिले में सितंबर 2025 का न्यायिक घटनाक्रम भी अहम है. उच्च न्यायालय की एकल पीठ के 25 सितंबर 2025 के आदेश की एक ऐसी व्याख्या सामने आई, जिससे लगा कि प्रारंभिक परीक्षा परिणाम में त्रिस्तरीय आरक्षण लागू हो गया है. उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने इसके खिलाफ विशेष अपील दाखिल की, और अगले ही दिन, 26 सितंबर 2025 को खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश पर रोक लगा दी. मामला अभी अदालत में लंबित है.
प्रतिनिधित्व का असली मकसद है सशक्तीकरण
सामाजिक न्याय का तीसरा पहलू प्रतिनिधित्व का है. सरकारी संस्थाओं में समाज के अलग-अलग वर्गों की मौजूदगी लोकतंत्र की साख मजबूत करती है. इसी सिलसिले में योगी सरकार ने नवगठित उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम (UPCOS) के तहत आउटसोर्स नौकरियों में आरक्षण नियमों को डिजिटल तरीके से लागू किया है. संविदा नियुक्तियों में अनुसूचित जाति को 21 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 2 प्रतिशत और ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है. योगी सरकार ने इसमें 2019 के राष्ट्रीय संवैधानिक संशोधन के तहत 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण को भी जोड़ा है. यानी नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन बना हुआ है.
प्रतिनिधित्व को सिर्फ आंकड़ों तक सीमित रखना भी सही नहीं. इसका असली मकसद सशक्तीकरण है. ऐसा सशक्तीकरण जहां अगली पीढ़ी को अवसर पाने के लिए किसी व्यवस्था पर निर्भर न रहना पड़े, बल्कि वह खुद प्रतिस्पर्धा में सक्षम हो सके. इसीलिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कोटे में पात्र अभ्यर्थियों की कमी को भी बड़े संदर्भ में देखना चाहिए. इसका हल सिर्फ रिक्तियों की गिनती पर राजनीतिक बहस नहीं हो सकता, बल्कि यह देखना ज़रूरी है कि पात्र अभ्यर्थियों का दायरा कैसे बढ़े? गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, तैयारी और आर्थिक मदद तक पहुंच कैसे आसान हो? यहीं से सामाजिक न्याय की बहस आरक्षण से निकलकर शिक्षा और अवसर की बहस बन जाती है.
सरकारी नियुक्तियों में सबके साथ न्याय
उत्तर प्रदेश के इन आंकड़ों को इसलिए भी अहम माना जाना चाहिए, क्योंकि पिछले वर्षों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकारी नियुक्तियों की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित की है. दलित, पिछड़े एवं वंचित तबके के युवाओं को लगातार उच्च शिक्षा, कौशल विकास एवं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के अवसर उपलब्ध कराए हैं, ताकि सही मायनों में सामाजिक न्याय स्थापित हो सके. सरकार ने स्पष्ट भी किया है कि ऐसा करना शासन का लगातार निभाया जाने वाला दायित्व है. भारत का संविधान समानता की बात करता है, पर समानता का मतलब हमेशा एक जैसा व्यवहार नहीं होता. जिसकी शुरुआत ही असमान हालात से हुई हो, उसे बराबरी का मौका देने के लिए विशेष इंतजाम करना पड़ता है. आरक्षण इसी संवैधानिक सोच से निकला है. उत्तर प्रदेश में सरकारी नियुक्तियों के आंकड़े बताते हैं कि व्यवस्था ने सबके साथ न्याय किया है.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)