आम बजट 2026 को लेकर पहली प्रतिक्रिया में कई लोग यह प्रश्न उठा रहे हैं कि इसमें “तत्काल राहत” क्यों सीमित है. किंतु यदि बजट को केवल तात्कालिक लाभ-हानि के चश्मे से देखा जाएगा, तो उसके मूल वैचारिक उद्देश्य को समझना कठिन होगा. वास्तव में, बजट 2026 उस शासन-दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है, जो लोकप्रियता के बजाय उत्तरदायित्व, और तात्कालिक संतोष के बजाय दीर्घकालिक राष्ट्रनिर्माण को प्राथमिकता देती है. यह बजट उस राजनीति का दस्तावेज है जो यह मानती है कि सरकार का कार्य केवल सब्सिडी बांटना नहीं, बल्कि समाज को सक्षम बनाना है.
शिक्षा: कल्याण नहीं, क्षमता निर्माण की नीति
आम बजट 2026 में शिक्षा को जिस प्रकार प्रस्तुत किया गया है, वह सरकार की वैचारिक स्पष्टता को दर्शाता है शिक्षा को अब केवल सामाजिक कल्याण की श्रेणी में नहीं रखा जा रहा, बल्कि मानव पूंजी निर्माण के रूप में देखा जा रहा है. डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट कक्षाएं, शिक्षक प्रशिक्षण और नई शिक्षा नीति (NEP) के क्रियान्वयन पर जोर यह संकेत देता है कि सरकार शिक्षा को रोजगार-योग्य, नवाचार-उन्मुख और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप बनाना चाहती है. आलोचक भले ही GDP के अनुपात में शिक्षा व्यय का प्रश्न उठाएं, लेकिन यह भी तथ्य है कि बीते वर्षों में शिक्षा बजट का उपयोग अधिक लक्षित और परिणाम-आधारित हुआ है.
उच्च शिक्षा और शोध: उत्कृष्टता का मॉडल
बजट 2026 में उच्च शिक्षण संस्थानों, विशेषकर शोध और नवाचार के लिए जो प्रावधान किए गए हैं, वे सरकार की उस सोच को दर्शाते हैं जिसमें भारत को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करना लक्ष्य है. IIT, IIM, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में निवेश को अक्सर “चयनात्मक” कहा जाता है, किंतु इतिहास गवाह है कि उत्कृष्टता के केंद्र ही व्यापक परिवर्तन के इंजन बनते हैं. अमेरिका, चीन और यूरोप सभी ने पहले अपने श्रेष्ठ संस्थानों को मजबूत किया, फिर उसका प्रभाव पूरे तंत्र में फैलाया. यह दृष्टिकोण भावनात्मक समानता नहीं, बल्कि कार्यात्मक समानता पर आधारित है.
स्वास्थ्य: अधिकार की ओर बढ़ता ढांचा
स्वास्थ्य क्षेत्र में बजट 2026 की दिशा स्पष्ट है. सरकार स्वास्थ्य को योजनाओं की श्रृंखला से आगे ले जाकर एक सार्वजनिक अधिकार के रूप में विकसित करना चाहती है. आयुष्मान भारत योजना का विस्तार, जन औषधि केंद्रों की संख्या में वृद्धि और प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे का सुदृढ़ीकरण इसी सोच का हिस्सा है. यह अपेक्षा करना अव्यावहारिक होगा कि दशकों की उपेक्षा को एक बजट में पूरी तरह सुधारा जा सकता है. किंतु यह भी नकारा नहीं जा सकता कि सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रमिक लेकिन सतत सुधार के रास्ते पर है.
युवा और रोजगार: सरकारी नौकरी से आगे की सोच
बजट 2026 का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक पक्ष युवाओं और रोजगार को लेकर है। यह बजट उस पुरानी मानसिकता से बाहर निकलने का प्रयास करता है जिसमें रोजगार का अर्थ केवल सरकारी नौकरी तक सीमित था. कौशल विकास, अप्रेंटिसशिप, स्टार्ट-अप्स और MSME को समर्थन, ये सभी कदम युवाओं को नौकरी-खोजी नहीं, नौकरी-निर्माता बनाने की दिशा में हैं. यह दृष्टिकोण अल्पकाल में असुविधाजनक लग सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यही आर्थिक आत्मनिर्भरता का आधार बनता है. सरकार यह स्पष्ट संदेश देती है कि 21वीं सदी का भारत अवसर देगा, लेकिन जिम्मेदारी भी मांगेगा.
महंगाई: भावनात्मक नहीं, संरचनात्मक समाधान
महंगाई पर अक्सर यह आरोप लगता है कि सरकार तत्काल कर-कटौती क्यों नहीं करती. किंतु बजट 2026 यह दर्शाता है कि सरकार महंगाई को संरचनात्मक समस्या मानती है, न कि केवल मूल्य-सूची का मुद्दा. कृषि उत्पादन, भंडारण, आपूर्ति श्रृंखला और लॉजिस्टिक्स पर जोर यह बताता है कि सरकार कीमतों को नियंत्रित करने के लिए दीर्घकालिक समाधान चाहती है. ईंधन करों पर संतुलन बनाए रखना वित्तीय अनुशासन और विकास योजनाओं की निरंतरता से जुड़ा निर्णय है. यह नीति लोकप्रिय न हो, लेकिन आर्थिक रूप से जिम्मेदार अवश्य है.
आयकर: मध्यम वर्ग के साथ भरोसे की राजनीति
आयकर में दी गई राहत यह दिखाती है कि सरकार मध्यम वर्ग को केवल करदाता नहीं, बल्कि विकास का साझेदार मानती है. कर-प्रणाली का सरलीकरण, डिजिटल अनुपालन और सीमित लेकिन प्रतीकात्मक राहत—ये सभी कदम भरोसे पर आधारित शासन मॉडल को दर्शाते हैं. यह “खजाना खाली कर देने” की राजनीति नहीं, बल्कि संतुलित राहत की राजनीति है.
निष्कर्ष: एक वैचारिक रूप से स्पष्ट बजट
आम बजट 2026 को यदि वैचारिक दृष्टि से देखा जाए, तो यह एक ऐसे शासन का प्रतिबिंब है जो लोकलुभावनता से आगे सोचने का साहस रखता है. यह बजट तात्कालिक तालियों के लिए नहीं, बल्कि आने वाले दशक की नींव रखने के लिए तैयार किया गया है. यह स्वीकार करना होगा कि हर बजट में सीमाएं होती हैं, लेकिन बजट 2026 की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दृष्टि, निरंतरता और वैचारिक स्पष्टता है। यही कारण है कि इसे केवल एक वित्तीय दस्तावेज़ नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का नीति-पत्र कहा जा सकता है.
डिस्क्लेमर: लेखक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय के राजनीति विज्ञान विभाग में पोस्ट डॉक्टोरल फेलो हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.