एक बच्चा अपनी बातों में मुझे उलझाए जा रहा था। कहिये किस लिए फोन किया आपने। 'अंकल हमारी सोसायटी में न किसी ने कार से बिल्ली को कुचल दिया है। ऐसे कोई कार चलाएगा तो हमें भी कुचल देगा। अंकल हम बच्चों की एक मीटिंग होने वाली है। सोसायटी की सेंट्रल पार्क में। आप उसे प्राइम टाइम में दिखाओगे।'
सुनते ही मेरा माथा ठनका। चौथी क्लास में पढ़ने वाला नौ साल का लड़का एक दम साफ़ साफ़ बोल रहा था। भले ही उसकी मां ने सिखाया होगा लेकिन वो लगातार आत्मविश्वास से बोले जा रहा था। अंकल आप Whatsapp पर देख लीजिए। हमने एक चिट्ठी लिखी है सोसायटी के नाम। हमारी मीटिंग में बड़े लोग भी आयेंगे। आप कैमरा तो भेजो। अरे वाह, आप तो कुछ ज़्यादा ही समझदार मालूम पड़ते हैं।
यह कहते ही मैंने फोन रखा और न्यूज़ रूम में बैठे सुनील सैनी और रजनीश से कहा कि क्या हम वहां कोई ओबी वैन भेज सकते हैं। रजनीश से वहां से गुज़र रहे संवाददाता को तथागत की बताई जगह पर भेज दिया और सुनील सैनी कहीं से ओबी वैन के जुगाड़ में लग गए। सुनील ने शरद शर्मा से आग्रह किया कि वे घर जाने के रास्ते में उस सोसायटी में चले जाएं जहां बच्चों की बैठक हो रही है। दीप्ति भी पूरे जोश से तैयार कि आखिरी क्षण में भी शॉट्स आ गए तो हम इसे प्राइम टाइम में शामिल करके रहेंगे।
पता चला कि वसुंधरा एन्क्लेव के सत्यम अपार्टमेंट के पार्क में वाकई दस पंद्रह बच्चे जमा हैं। उनके साथ कुछ की मम्मियां भी हैं। यह सुनकर मेरा उत्साह दुगना हो गया। मैं तथागत और उनके दोस्तों से प्राइम टाइम में लाइव बात करना चाहता था। फोन पर नौ साल के लड़के की बात से लग गया कि ये बात कर लेगा। जल्दी ही उसके मां पिता से टीवी पर दिखाने की अनुमति ले ली। अंत में पता चला कि सोसायटी के बड़े लोगों ने आकर बच्चों की सभा को समाप्त करा दिया और हमारी टीम से आदर पूर्वक बाहर जाने के लिए कह दिया गया। पूरे प्राइम टाइम के दौरान इस बात का अफसोस होता रहा कि बच्चों की बैठक से समाज पर कितना अच्छा असर पड़ता। ये सारी बातें इसलिए घूम रही थीं कि मैंने बच्चों की वो चिट्ठी पढ़ ली थी जो मुझे Whatsapp पर भेजी गई थी। चिट्ठी हिन्दी और अंग्रेजी में लिखी गई थी। हो सकता है कि इनकी मांओं ने लिखा हो मगर भाव बच्चों सा ही था।

डियर अंकल और आंटी
आज सुबह हमारी सोसायटी में किसी गाड़ी ने एक प्यारी सी बिल्ली के बच्चे को कुचल दिया। ज़रा सोचिये, बिल्ली के बच्चे की जगह कोई इंसान का बच्चा भी हो सकता था। हम सोसायटी में खेलते हैं, भागते दौड़ते हैं, कोई गाड़ी हमें भी निशाना बना सकती थी। इसलिए हम इस बच्चे के लिए कंडोलेंस मीटिंग रख रहे हैं। आप प्लीज़ ज़रूर आना, हम सब मिलकर उन अंकल आंटी से सुधरने और ध्यान से चलाने की रिक्वेस्ट करेंगे जो सोसायटी में भी फार्मूला रेस की तरह गाड़ी चलाते हैं।
बच्चों ने बिल्ली के बच्चे की तस्वीर रखी और शोक सभा आयोजित की। ये सोसायटी की बंद दीवारों के बीच का लोकतंत्र है जो अपने तरीके से पनप रहा है। पिछले ही रविवार मेरी बेटी और उसकी सहेलियों ने आकर कहा कि अंकल हम सब मिलकर आपसे कुछ कहने आए हैं। पहले आप प्रॉमिस करो कि आप हमारी बात सुनोगे। अंकल जब हम फुटबॉल खेलते हैं तो लड़के ताकत दिखाते हैं। हमारे साथ बराबरी से नहीं खेलते। जब गोलकीपर बनने की हमारी बारी आती है तो बहुत ज़ोर से शॉट मारते हैं। आप ही बताओ ये ठीक नहीं है न। बिल्कुल गलत बात है बेटा। पर अंकल आप ये सब प्राइम टाइम में दिखाओ न। न्यूज़ बनाओ ताकि दुनिया को पता चले कि लड़कियों से ताकत दिखाना कितनी ग़लत बात है।
मुझे पता है कि अनगिनत सोसायटी में बच्चे अपने खेलने की जगह हासिल करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं। वे रोज़ लड़ते हैं और हम खड़ूस अंकलों आंटियों से हार जाते है। पर ये कहानी आपको इसलिए बताई क्योंकि बच्चों को अब पता चल गया कि उनकी बातें नहीं सुनी गईं तो किसे फोन करना है। बैठक में आए सभी बच्चों को रवीश अंकल का ज़ोरदार सलाम।