मैंने सबसे ज्यादा क्रिकेट अपने स्कूली दिनों में देखा है। समझिए पूरी गर्मी की छुट्टी टेस्ट मैच देखते हुए और गर्मी की छुट्टियों का होमवर्क करते हुए बीता। यह आदत बाद में भी बनी रही ग्रेजुएशन तक जितने भी नोट्स बनाए वह टेस्ट मैच देखते हुए। एक समय ऐसा था कि मैं और पापा रात-रात भर डे-एंड नाइट मैच भी देखा करते थे, जो चुनाव रिज़ल्ट के तीन दिवसीय कार्यक्रम के अलावा दूसरा महत्वपूर्ण साझा प्रोग्राम हुआ करता था हम दोनों का।
राजनीति और क्रिकेट की समझ तभी पापा के साथ विकसित हुई और स्कूल व कॉलेज के दिनों में दोनों में गाहे-बगाहे हाथ भी आज़माती रही हूं। क्रिकेट के साथ मैदान में मेरा रिश्ता, चौके या छक्के लिए आसमान में उछाले गए एक कॉरकेट बॉल द्वारा मेरे गालों को चूमने के साथ ही घरवालों द्वारा खत्म कर दिया गया। एह़तियातन मैं बेस-बॉल खेलने लग गई, क्योंकि उसकी गेंद कोहड़े या सीताफल की तरह होती है जो आपको चोट तो पहुंचा सकती है, पर उससे चेहरा ख़राब होने का डर नहीं होता। लेकिन क्रिकेट समझने में आज भी कोई दिक्कत नहीं आती, फिर चाहे वह टेस्ट मैच हो, 20-20 या वन-डे और जब समझती हूं तो बहुत रोमांचित होती हूं... जैसे आज हुई।
मेरे ख्य़ाल से हर लड़की को जीवन में कभी ना कभी क्रिकेट से प्यार करना चाहिए... क्रिकेटर से ना कर पाएं तब भी... क्योंकि ऐसा ना करके वे जीवन के एक बेहद महत्वपूर्ण रोमांच से महरूम रह जाएंगी। क्रिकेट खेलने के लिए हमारे पास कई वजह भी हैं, शरीर और दिमाग को चुस्त-दुरुस्त रखने के अलावा यह या कोई भी अन्य खेल हमारे भीतर कॉम्पिटेटिव भावना का तो संचार करती ही है... विषम परिस्थितयों में लड़ने की प्रेरणा भी देती है।
आप ख़ुद ही सोचिए कि हमारे आस-पास जितनी भी महिलाएं या पुरुष किसी भी परिभाषा के अनुसार अगर सफल हैं तो कोई ना कोई खेल से उनका जुड़ाव ज़रूर है। वह खेल क्रिकेट भी हो सकता है, एडवेंचर स्पोर्ट भी और शतरंज भी। कपिल देव जब क्रिकेट से रिटायर हुए तो गोल्फ़ खेलने लगे, बछेंद्री पाल जब एवरेस्ट पर फतह करके लौटीं तो जमशेदपुर में टाटा के कर्मचारियों को खेल-कूद की ट्रेनिंग देने लगीं। सुनील गावस्कर, पीटी उषा, मैरीकॉम, सानिया मिर्ज़ा, साएना नेहवाल, मिताली राज, अंजुम चोपड़ा, ऋतु रानी आदि-आदि। यहां महिलाओं के नाम ज्य़ादा इसलिए मैंने लिए क्योंकि खेलों में महिलाओं की ज्य़ादा भागीदारी की ज़रूरत है।
हालांकि क्रिकेट के साथ जो ग्लैमर और रुमानियत जुड़ी है वह अन्य खेलों के साथ नहीं, इसलिए जैसे हम पहले एक्ज़ाम में आसान सवाल का जवाब देते हैं ठीक वैसे ही आप क्रिकेट से प्यार कीजिए, इसलिए नहीं कि ये आपको आपके प्रिंस चार्मिंग मिलाएगा, बल्कि इसलिए कि ये पूरे जीवन आपके जीवन को चार्म-लेस नहीं होने देगा। आपको कभी हारने नहीं देगा, आपको कभी डिप्रेशन या अवसाद में डूबने नहीं देगा।
मैदान में अंतिम गेंद तक लड़ने की जो जिजिविषा सामने आती है वह आपको ज़िंदगी की हर कठिन घड़ी में लड़ने की ताकत देगा, जब कोई बॉलर आपकी तरफ़ यॉकर फेंकेगा तब आप पूरे दम-ख़म से उसका सामना करेंगे और जब कोई स्पिनर कोई गुगली फेंकेगा तब आप भी उसे बदले में गुगली देने की कोशिश करेंगे। कहने का मतलब यह है कि ये खेल आपको ज़िंदगी के शह-मात में माहिर कर देगा, इतना कि अगर आप कभी क्लीन बोल्ड या हिट-विकेट भी हुए तो अकेले में खुद को यह कहकर खुश कर सकते हैं कि यार, अंपायर को समझ नहीं आया ये तो नो-बॉल था।
लब्बोलुआब यह कि एक क्रिकेटर कभी भी हमेशा के लिए नहीं हारता, हर दूसरा मैच उसके सामने नई चुनौतियों के साथ-साथ ऊर्जा का संचार करता है। इसलिए प्यार कीजिए... क्रिकेट से, भले ही माध्यम कोई क्रिकेटर ही क्यों ना हो।
This Article is From Mar 24, 2015
स्वाति अर्जुन की कलम से : क्रिकेटर ना सही, क्रिकेट से प्यार कीजिए
Swati Arjun
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Updated:मार्च 24, 2015 21:58 pm IST
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Published On मार्च 24, 2015 20:55 pm IST
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Last Updated On मार्च 24, 2015 21:58 pm IST
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