Somnath Temple Explainer: एक ऐसा मंदिर जिसे एक-दो बार नहीं, बल्कि पूरे 17 बार हमलावरों ने नष्ट करने की कोशिश की! जिसे लूटा गया, तोड़ा गया और जिसका अस्तित्व मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई. लेकिन हर बार वो मंदिर और भी भव्य होकर स्वाभिमान के साथ खड़ा हो गया. आखिर इस मंदिर में ऐसा क्या है कि लुटेरों की नज़र हमेशा इसी पर रहती थी? और कैसे समंदर के किनारे खड़ा ये मंदिर आज भी विज्ञान और आस्था की एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है? चलिए, आज सोमनाथ मंदिर की इस अविश्वसनीय गाथा को विस्तार से समझते हैं.
गुजरात के वेरावल में स्थित सोमनाथ मंदिर को भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है. यानी हिंदुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र. हमारे प्राचीन वेदों और पुराणों में भी इसका ज़िक्र मिलता है. 'सोम' का मतलब होता है चंद्रमा, और 'नाथ' का मतलब स्वामी. यानी 'चंद्रमा के स्वामी'.
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पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण खुद चंद्रदेव ने किया था. कहा जाता है कि राजा दक्ष के श्राप से मुक्ति पाने के लिए चंद्रमा ने इसी जगह पर मिट्टी का शिवलिंग बनाकर महादेव की घोर तपस्या की थी. जब शिव जी प्रसन्न हुए, तो यहां 'सोमनाथ' के रूप में स्थापित हो गए. तभी से ये जगह आस्था का केंद्र बन गई.
सोमनाथ मंदिर का इतिहास
अब बात करते हैं इतिहास के उस काले पन्ने की, जिसने सोमनाथ को लहूलुहान किया... महमूद गजनवी ने करीब 1000 साल पहले यहां हमला किया. इतिहासकार बताते हैं कि उसने न सिर्फ मंदिर की मूर्ति तोड़ी, बल्कि यहां से भारी मात्रा में खजाना लूटा. दावा तो यहां तक किया जाता है कि वो अपने साथ 1600 किलो सोना लूटकर ले गया था.
खिलजी और औरंगजेब: गजनवी के बाद भी ये सिलसिला थमा नहीं. अलाउद्दीन खिलजी और बाद में मुगल शासक औरंगजेब ने भी इस मंदिर को भारी नुकसान पहुंचाया और लूटपाट की.
इन आक्रांताओं का मकसद सिर्फ धन दौलत नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को चोट पहुंचाना था. लेकिन इतिहास गवाह है हम तबसे लेकर आज तक स्वाभिमान के साथ लगातार आगे बढ़ रहे हैं.
आजादी के बाद पुनर्निर्माण
आजादी के बाद देश के 'लौह पुरुष' सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के जीर्णोद्धार का संकल्प लिया. इस समय महात्मा गांधी ने सलाह दी थी कि मंदिर के निर्माण में सरकारी पैसा नहीं, बल्कि जनता का दान लगना चाहिए. और हुआ भी यही! लोगों ने दिल खोलकर दान दिया.
1951 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नए बने मंदिर को राष्ट्र को समर्पित किया. इतने आक्रांताओं के आक्रमण के बाद भी सोमनाथ पहले से ज्यादा भव्य होकर सामने आया.
सोमनाथ मंदिर का 'चमत्कार'
ये मंदिर बिल्कुल अरब सागर के किनारे पर है. लेकिन यहां एक अद्भुत बात देखने को मिलती है. समंदर की विशाल लहरें कितनी भी उग्र क्यों न हों, वो कभी भी मंदिर के गर्भगृह को नहीं छूतीं. लोग इसे महादेव की कृपा मानते हैं कि समंदर अपनी सीमा कभी नहीं लांघता. इसके अलावा यहाँ एक 'बाण स्तंभ' भी है, जो बताता है कि सोमनाथ से लेकर दक्षिण ध्रुव (South Pole) तक बीच में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं है. ये उस दौर के इंजीनियरिंग का कमाल है या चमत्कार जो आज भी सबको हैरान कर देता है! 6ठी शताब्दी से इस स्तंभ का इतिहास में उल्लेख भी मिलता है.
आज का सोमनाथ मंदिर
आज सोमनाथ मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि पर्यटन का एक बहुत बड़ा केंद्र है. हर साल यहां 1 करोड़ से ज्यादा भक्त दर्शन के लिए आते हैं. मंदिर में हर साल करीब अरबों रुपये का दान आता है, जो लोक कल्याण में इस्तेमाल होता है.
सोमनाथ की कहानी हमें सिखाती है कि इमारतें तोड़ी जा सकती हैं, पत्थर बिखेरे जा सकते हैं, लेकिन एक देश की संस्कृति, सभ्यता, आस्था और उसकी जीवटता को कभी खत्म नहीं किया जा सकता.
निशान्त मिश्रा NDTV में पत्रकार हैं.
डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.
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