Somnath Mandir News: सोमनाथ मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है. गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के प्रभास पाटन वेरावल में यह भगवान शिव का पौराणिक मंदिर बना है. यह शिव के सबसे प्राचीन ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसका स्थापना वर्ष 1100 से 1500 वर्षों पहले होने का अनुमान है. सोमनाथ मंदिर की स्थापना के 1000 साल पूरे हो रहे हैं. हिंदुओं की आस्था के सबसे बड़े तीर्थस्थलों में एक होने के साथ ही ये धन संपदा से भरपूर था. इस मंदिर को मुस्लिम आक्रमणकारियों का छह बार हमला झेलना पड़ा.
चालुक्य, प्रतिहार और चूडासमा वंश के शासकों ने तब सोमनाथ मंदिर का पुनरोद्धार कराया.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर के इन्हीं हजार वर्षों की गौरव गाथा को लेकर एक पत्र लिखा है. वो 11 जनवरी को सोमनाथ मंदिर की यात्रा पर जा सकते हैं.PM मोदी ने 2 मार्च 2025 गुजरात में श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का दौरा किया था.उन्होंने पूजा-अर्चना की और रुद्राभिषेक किया था.
सोमनाथ मंदिर पर कब कब हमला
- अल-जुनैद (सिंध का अरब गवर्नर)था, जिसने 725 ईस्वी में सबसे पहला आक्रमण किया. जुनैद की सेनाओं ने सोमनाथ मंदिर को लूटा और उसे नष्ट किया था.राजा नागभट्ट द्वितीय ने 815 ईस्वी में इसे लाल पत्थर से बनवाया.
- महमूद गजनवी ने 1025-26 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर पर सबसे भयानक हमला किया. गजनवी ने सोमनाथ मंदिर का खजाना लूटा. ज्योतिर्लिंग को खंडित किया और भारी तबाही मचाई.
- अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति उलुग खान और नुसरत खान ने 1299 ईस्वी में गुजरात विजय के दौरान सोमनाथ मंदिर को पुनः तोड़ा और लूटपाट की.
- दिल्ली सल्तनत में गुजरात के गवर्नर (बाद में गुजरात सल्तनत का सुल्तान) जफर खान ने 1395 ईस्वी में इसे तीसरी बार बड़े हमले में नुकसान पहुंचाया.
- गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने 1451 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया और उसे अपवित्र किया.
- मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे गिराने का आदेश दिया था. उसने 1665 में इसे नष्ट करवाया और बाद में 1706 में फिर से कठोर सैन्य कार्रवाई की ताकि वहां पूजा न हो सके.
पहला आदि ज्योतिर्लिंग
मान्यता है कि श्री सोमनाथ महादेव वह पवित्र भूमि है, जहां चंद्रमा की तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उन्हें अंधेरे के श्राप से मुक्त किया था. यह भी माना जाता है कि यह वह स्थान है, जहां भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अंतिम यात्रा की थी. सोमनाथ का तट मंदिर 4 चरणों में बना था. पहला भगवान सोम द्वारा सोने से, दूसरा राजा रवि द्वारा चांदी से, तीसरा भगवान कृष्ण द्वारा लकड़ी से और आखिरी राजा भीमदेव द्वारा पत्थर से इसका निर्माण कराया गया था.
मंदिर में गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप हैं. इसका शिखर 155 फीट ऊंचा है.शिखर के ऊपर कलश का वजन 10 टन है और ध्वजदंड 27 फीट ऊंचा और 1 फुट परिधि का है. सातवां मौजूदा मंदिर कैलाश महामेरु प्रसाद शैली में बना है. महारानी अहिल्याबाई द्वारा जीर्णोद्धार किया गया मंदिर मुख्य मंदिर परिसर के पास है.
सोमनाथ मंदिर पर छह बार हमला
मुस्लिम आक्रमणकारियों ने 11वीं से 18वीं सदी के बीच छह बार मंदिर पर हमला किया. लेकिन हिंदुओं के जनज्वार से ओतप्रोत होकर हर बार इसका भव्य पुनर्निर्माण कराया गया. भारत की आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का काम सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रारंभ कराया. दिवाली के समय 13 नवंबर 1947 को सोमनाथ मंदिर दर्शन के वक्त उन्होंने मंदिर वहीं बनेगा का ऐलान किया. भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने 11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की. कहा जाता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इससे ज्यादा खुश नहीं थे. वो नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति और मंत्री इस सोमनाथ मंदिर स्थापना समारोह से जुड़ें.

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स्वामी विवेकानंद की सोमनाथ यात्रा
स्वामी विवेकानंद 1890 के दशक में सोमनाथ मंदिर गए थे. उन्होंने 1897 में चेन्नई में एक संबोधन में कहा, दक्षिण भारत के कुछ पुराने मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको बहुत सारी समझ सिखाएंगे.देखिए कैसे ये मंदिर सौ हमलों और सौ बार फिर से बनने के निशान दिखाते हैं. लगातार नष्ट होते रहे और लगातार खंडहरों से फिर से उभरते रहे. पहले की तरह ही नए और मज़बूत. यही राष्ट्रीय सोच है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है.
सोमनाथ मंदिर का दक्षिण ध्रुव कनेक्शन
सोमनाथ का तीर्थ स्तंभ (तीर) दक्षिण ध्रुव तक सीधे समुद्री मार्ग को दिखाता है.दक्षिण ध्रुव की ओर सबसे नजदीकी जमीन लगभग 9936 किमी दूर है. यह प्राचीन भारतीय भूगोल के ज्ञान और ज्योतिर्लिंग के रणनीतिक स्थान का एक अद्भुत संकेतक है.
सोमनाथ मंदिर का भगवान कृष्ण से संबंध
सोमनाथ में हरि हर तीर्थधाम भगवान श्री कृष्ण की निजधाम प्रस्थान लीला का पवित्र स्थान है. जिस स्थान पर भगवान श्री कृष्ण को एक शिकारी के तीर से निशाना बनाया था, उसे भालका तीर्थ के नाम से जाना जाता है. तीर लगने के बाद भगवान श्री कृष्ण हिरन, कपिला और सरस्वती नदियों के पवित्र संगम और समुद्र के साथ उनके संगम पर पहुंचे. उन्होंने हिरन नदी के पवित्र और शांत किनारों पर अपनी दिव्य निजधाम प्रस्थान लीला की.
सोमनाथ का इतिहास
प्राचीन भारतीय परंपराओं के अनुसार सोमनाथ का संबंध चंद्रमा (चंद्र देव) के अपने ससुर दक्ष प्रजापति के श्राप से मुक्ति से है. चंद्रमा का विवाह दक्ष की 27 बेटियों से हुआ था. मगर उन्होंने रोहिणी से अधिक प्रेम किया और दूसरी रानियों की उपेक्षा की. दुखी दक्ष ने चंद्रमा को श्राप दिया और चंद्रमा ने अपनी रोशनी की शक्ति खो दी. प्रजापिता ब्रह्मा की सलाह पर चंद्रमा प्रभास तीर्थ पहुंचे और भगवान शिव की पूजा की.चंद्रमा की तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उन्हें अंधेरे के श्राप से मुक्त किया.
चंद्रमा का मंदिर
पौराणिक परंपराओं के अनुसार, चंद्रमा ने एक सोने का मंदिर बनवाया था, उसके बाद रावण ने चांदी का मंदिर बनवाया और माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने चंदन की लकड़ी से सोमनाथ मंदिर बनवाया था.प्राचीन भारतीय शास्त्रीय ग्रंथों पर आधारित शोध से पता चलता है कि पहले सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा वैवस्वत मन्वंतर के दसवें त्रेता युग में श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष के तीसरे शुभ दिन हुई थी.
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