सज्जन कुमार का निधन दिल्ली की राजनीति के एक जटिल और विवादास्पद अध्याय को बंद करता है. उनका आज 20 अगस्त 2026 की सुबह सफदरजंग अस्पताल में देहांत हो गया. वे तिहाड़ जेल में 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे थे और लंबे समय से बीमार चल रहे थे. 80 साल की आयु में उनका जाना उन लोगों के लिए दुख की खबर है, जो उन्हें दिल्ली का लोकप्रिय नेता मानते थे, तो कुछ के लिए यह एक अधूरे न्याय की याद दिलाता है. उनकी शख्सियत को समझना आसान नहीं है. वे एक ऐसे नेता थे जो गरीबी से निकलकर सत्ता के शिखर तक पहुंचे, जनता से सीधा जुड़ाव रखते थे, लेकिन जिनके नाम पर इतिहास का एक काला पन्ना भी जुड़ा रहा.
- सज्जन कुमार कांग्रेस में संजय गांधी की मार्फत आए थे.
- वे तो मोतिया खान में चाय की रेहड़ी लगाते थे.
- कहते हैं कि इमरजेंसी के दौर में उनका संजय गांधी से परिचय हुआ था.
- उन्होंने ही सज्जन कुमार को नगर निगम का चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया.
- नगर निगम का चुनाव जीतने के बाद उन्हें कांग्रेस ने बाहरी दिल्ली से 1980 के लोकसभा चुनाव में अपना उम्मीदवार बनाया.
- वे आराम से चुनाव जीत गए. उनकी एक जन नेता की छवि भी बनी.
- पर 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में भड़के दंगों के लिए उन्हें भी दोषी माना गया.
सज्जन कुमार का जन्म 23 सितंबर 1945 को दिल्ली के एक साधारण जाट परिवार में हुआ था. पिता रघुनाथ सिंह और माता मी कौर के घर में आर्थिक हालात इतने अच्छे नहीं थे. परिवार का गुजारा मुश्किल से चलता थ. उन्होंने खुद कई बार बताया कि बचपन और किशोरावस्था में उन्हें परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ी. दिल्ली के मोतियाखान में चाय बेचना उनका रोजी-रोटी का जरिया बना. छोटी-सी रेहड़ी या दुकान पर चाय बेचते हुए उन्होंने मेहनत की कद्र सीखी. शिक्षा मैट्रिक तक ही हो पाई. बाद में उन्होंने बेकरी का काम भी किया. यह साधारण शुरुआत ही उनकी शख्सियत की बुनियाद बनी.
आम आदमी से विवादित राजनेता तक
राजधानी के जाने-माने पत्रकार दिलबर गोठी कहते हैं कि सज्जन कुमार ‘आम आदमी' से उठकर नेता बने, इसलिए वे जनता की भाषा समझते थे और उनकी समस्याओं को करीब से जानते थे.
- 1970 के दशक में राजनीति में उनका प्रवेश हुआ
- इमरजेंसी के बाद के दिनों में वे संजय गांधी के करीब आए
- संजय गांधी की नजर उनकी संगठनात्मक क्षमता और जमीनी पकड़ पर पड़ी.
- 1977 में उन्होंने दिल्ली नगर निगम के चुनाव में मादीपुर-नांगलोई क्षेत्र से जीत हासिल की और पार्षद बने.
- उसी साल वे दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव भी नियुक्त हुए.
- यह तेजी से हुआ उदय था.
- 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें बाहरी दिल्ली सीट से उम्मीदवार बनाया
- उस समय यह सीट दिल्ली की सबसे बड़ी और जाट बहुल मानी जाती थी
- सज्जन कुमार ने दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश को हराकर सबको चौंका दिया
- महज 35 साल की उम्र में वे सांसद बन गए
- यह जीत उनके राजनीतिक कद को एकदम ऊंचा कर गई
इसके बाद वे बाहरी दिल्ली के अविवादित नेता के रूप में उभरे. 1991 और 2004 में फिर लोकसभा पहुंचे. 2004 में उन्होंने रिकॉर्ड वोट हासिल किए.
उनके समर्थक उन्हें ‘जनता का नेता' कहते थे. वे इलाके-इलाके घूमते, लोगों की शादियों में जाते, विधवाओं और गरीब परिवारों की मदद करते, झुग्गी-झोपड़ी कॉलोनियों के पुनर्वास में रुचि लेते और विकलांगों के लिए काम करते बताए जाते हैं. लोकसभा की आधिकारिक प्रोफाइल में भी उनके सामाजिक कार्यों का जिक्र है. जाट समुदाय में उनका दबदबा इतना मजबूत था कि दशकों तक बाहरी दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली और उत्तर-पश्चिमी इलाकों में उनकी बात चलती रही. वे सत्ता के गलियारों में भी पहुंच रखते थे, लेकिन अपनी छवि आम आदमी वाली बनाए रखते थे. साधारण कपड़े,
सीधी बात और जमीनी संपर्क उनकी शैली थी. कई पुराने कार्यकर्ता याद करते हैं कि सज्जन कुमार किसी भी समय मिल सकते थे, किसी की भी समस्या सुनते थे.
लेकिन उनकी शख्सियत का एक दूसरा पक्ष भी है, जो उनके पूरे जीवन पर छाया रहा. 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली
में सिख समुदाय पर भीषण हिंसा हुई. हजारों लोग मारे गए. कई प्रत्यक्षदर्शियों और जांच रिपोर्टों में सज्जन कुमार का नाम भीड़ उकसाने और हिंसा में शामिल होने के आरोपों के साथ सामने आया. लंबे समय तक वे इन आरोपों से बचे रहे. कई आयोग बने, जांचें हुईं, लेकिन सजा देर से आई. 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने पालम कॉलोनी मामले में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई. 2025 में एक और मामले मेंउन्हें फिर उम्रकैद हुई. वे तिहाड़ जेल में
बंद रहे और आखिरी सालों में स्वास्थ्य खराब होता गया. 2018 में सजा के बाद उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ दी.
समर्थकों में कितने लोकप्रिय थे
इन आरोपों और सजाओं के बावजूद उनके समर्थकों में उनकी लोकप्रियता बनी रही. कई लोग उन्हें राजनीतिक साजिश का शिकार मानते रहे. दूसरी तरफ सिख समुदाय और पीड़ित परिवारों के लिए वे अन्याय का प्रतीक बने. चार दशक बाद भी न्याय की लड़ाई चलती रही. यह द्वंद्व ही उनकी शख्सियत को परिभाषित करता है. एक तरफ गरीबी से निकलकर मेहनत और संगठन बल से दिल्ली की बड़ी राजनीति में जगह बनाने वाला नेता, दूसरी तरफ हिंसा के आरोपों से घिरा व्यक्ति जिसने आखिरी सांस जेल की दीवारों के बीच ली.
सज्जन कुमार की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है. यह दिल्ली की राजनीति और 1984 की त्रासदी की कहानी भी है. वे चाय बेचने वाले युवक से तीन बार सांसद बने. जनता से जुड़ाव उनकी सबसे बड़ी ताकत थी. लेकिन इतिहास उन्हें सिर्फ लोकप्रिय नेता के रूप में याद नहीं रखेगा. उनके नाम के साथ हमेशा 1984 का जिक्र भी चलेगा. निधन के बाद उनके समर्थक उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं, तो पीड़ित परिवार न्याय की लंबी प्रक्रिया की याद दिला रहे हैं. शख्सियत जटिल होती है. सज्जन कुमार की शख्सियत भी वैसी ही थी. साधारण शुरुआत, असाधारण उदय और अंत में विवादों से घिरा अध्याय. दिल्ली की राजनीति में उनका नाम लंबे समय तक चर्चा में रहेगा, चाहे प्रशंसा में हो या आलोचना में.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)