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This Article is From Mar 30, 2022

बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं की ये उपलब्धियां वाक़ई गौरव और कविता लेखन के विषय

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 30, 2022 22:30 pm IST
    • Published On मार्च 30, 2022 21:31 pm IST
    • Last Updated On मार्च 30, 2022 22:30 pm IST

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट आई है. इस रिपोर्ट में बिहार के पांच ज़िलों के ज़िला अस्पतालों का अध्ययन किया गया है कि वहां 2014-15 से 2019-20 के बीच किस तरह के बदलाव आए हैं. इन अस्पतालों में जाने और ख़राब इलाज के कारण दर-दर भटकने वाली जनता को तो पता ही होगा.जब पांच साल में भी कुछ न बदले, तब फिर ऐसी सूचना का क्या मतलब रह जाता है. 

CAG ने बिहारशरीफ़, जहानाबाद, हाजीपुर, मधेपुरा और पटना के ज़िला अस्पतालों के बारे में लिखा है कि केवल जहानाबाद में ICU है लेकिन वहां उपकरण नहीं है, नर्स, पैरामेडिक्स स्टाफ नहीं है. दवा भी नहीं है. क्या इसे ICU कहा भी जाएगा? पांचों ज़िला अस्पतालों में कार्डिएक केयर यूनिट नहीं थी. स्ट्रोक और कैंसर के इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी. मतलब दिल का दौरा पड़ने पर किसी ने ज़िला अस्पातल का रुख़ किया तो मौत निश्चित है. पांच ज़िला अस्पताल में आपात स्थिति में ऑपरेशन के लिए ऑपरेशन थियेटर तक नहीं है. यही नहीं, जहां OT मिली है वहां पर दवा भी नहीं है. अब आप सोचिए, ऐसी जगह पर स्वास्थ्य बीमा का कार्ड लेकर जाएंगे भी तो क्या इलाज होगा? लेकिन मेरी मानिए तो इसे लेकर परेशान न हों, धर्म या जाति का गौरव बढ़ाने में लगे रहिए. उस काम में कम से कम मानसिक शांति की तो गारंटी है ही. 

बिहार के कई ज़िला अस्पतालों में दस साल से बेड की संख्या नहीं बढ़ाई गई है. जो स्वीकृत संख्या है, उससे भी काफ़ी कम बेड उपलब्ध हैं. पंजीकरण काउंटर पर मरीज़ों की संख्या में 13 से 208 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है. यही नहीं, स्वीकृत पदों में से केवल 24 से 32 प्रतिशत बेड ही ज़िला अस्पतालों में मौजूद हैं. 59 प्रतिशत रोगियों ने अपने पैसे से दवा ख़रीदी. ज़ाहिर है नि:शुल्क दवा की योजना काग़ज़ पर ही सभी के लिए है. 

पटना के अलावा नौ ज़िला अस्पतालों में ब्लैड बैंक तक नहीं था. चार अस्पतालों के ब्लड बैंक में कहीं भी हेपिटाइटिस ए का परीक्षण नहीं किया गया था. मतलब अगर यहां का ख़ून चढ़ गया और उस रक्त में हेपिटाइटिस ए होगा तो मरीज़ का क्या हाल होगा, आप समझ सकते हैं. हाजीपुर के ज़िला अस्पताल में वेंटिलेटर, ईसीजी मशीन, कार्डिएक मॉनिटर काम नहीं करते हैं. कई ज़िला अस्पतालों में टी टी ई का इंजेक्शन था लेकिन इंजेक्शन होते हुए भी गर्भवती महिलाओं को नहीं दिया गया. लेकिन आप इन सब को नज़रअंदाज़ करते हुए बिहार दिवस के मौक़े पर 'मैं बिहार हूं' टाइप की कविता लिखते रहिए ताकि आपकी भावनाएं गर्व कर सकें. अस्पताल और डॉक्टर को लेकर परेशान ही क्यों होना. जो आपका स्तर है, उसे किसी भी हाल में ऊपर नहीं आने देना है. 

CAG की रिपोर्ट के अनुसार, अस्पतालों में दवाओं और उपकरणों की सप्लाई के लिए बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर नाम की एक संस्था बनाई गई है. इसके पास 10 हज़ार करोड़ से अधिक का बजट है फिर भी खर्च केवल 3100 करोड़ हुआ है. पांच साल के दौरान BMSI के द्वारा 1000 से अधिक परियोजनाएं शुरू की गई हैं लेकिन 187 ही पूरी हुई हैं. 387 योजनाएं तो शुरू भी नहीं हो सकी हैं. 2014-20 तक डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिक्स स्टाफ की लगातार कमी रही लेकिन इन पदों को भरने के लिए कुल रिक्तियों को कभी प्रकाशित नहीं किया गया. 

बीस साल से नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं. बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था का यह रिकॉर्ड है. इलाज कराने के नाम पर घर और ज़मीन बेच देने, क़र्ज़ लेने में जो सुख मिलता है उसका कोई जवाब नहीं. कम से कम संतोष होता है कि इलाज के लिए जान लगा दिए. खूब सेवा किए. स्वास्थ्य को राजनीतिक सवाल बना देंगे तो फिर बिहार दिवस पर आप बिहार को लेकर गर्व ठेलते हुए कविता कैसे लिखेंगे. मैं बिहार हूं फ़लां हूं ढिमकाना हूं. है कि नहीं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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