AKTU के छात्रों को क्यों लगता है कि उनकी सुनी जाएगी?

अब के समाज में किसी की नहीं सुनी जाती होगी. जब बाकियों की नहीं सुनी जा रही थी तो आप चुप थे .आपकी नहीं सुनी जाएगी तो बाक़ी चुप रहेंगे. उम्मीद है यूनिवर्सिटी में किसी को अक्ल आएगी कि आपकी बात सुनें और कोई रास्ता निकालें.

AKTU के छात्रों को क्यों लगता है कि उनकी सुनी जाएगी?

डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी के छात्रों को इस बात से एतराज़ है कि आफलाइन परीक्षा ली जा रही है. मुझे एक पत्र मिला है जिसमें कहा गया है कि 20 हज़ार छात्रों ने गूगल फार्म भर कर ऑनलाइन परीक्षा लेने की बात कही है. बस और ट्रेन से यात्राएं करना आसान नहीं है. ऑफलाइन परीक्षा कराने से कोरोना का ख़तरा है. कॉलेज ने जब ऑन लाइन परीक्षा ली है तो ऑफलाइन का कोई तुक नहीं बनता है. भारत की कई यूनिवर्सिटी आफ लाइन परीक्षा ले रही हैं. इस यूनिवर्सिटी के छात्र यूपी से बाहर के राज्यों में रहते हैं. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में किसान आंदोलन के कारण बहुत से छात्र प्रभावित होंगे. छात्रों की बात ठीक हो सकती है. इसी तर्क पर GATE की परीक्षा देने वाले कुछ छात्रों ने संपर्क किया था कि कुछ इलाकों में नेट बंद होने के कारण उनकी तैयारी प्रभावित हुई है. परीक्षा की तारीख़ में छूट दी जानी चाहिए. इस तरह की चिन्ता की यूनिवर्सिटी के छात्रों ने ज़ाहिर की है. बहुत से छात्र परीक्षा के हक में भी होते हैं. 

इस तरह की दलीलें मई और जून के महीने में भी दी गईं जब कोरोना का प्रकोप भयंकर था. लोग मर रहे थे और अस्पतालों में जगह नहीं थी. सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हो गईं कि NEET और JEE की प्रवेश परीक्षा नहीं होनी चाहिए. छात्र अचानक हुई तालाबंदी के कारण अपनी किताबें किसी और शहर में छोड़ आए थे. दूसरा परीक्षा देने के लिए यात्राएं करनी होंगी लेकिन बस और ट्रेन बंद है. उन सभी को संक्रमण का ख़तरा होगा. 17 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परीक्षा होगी. छह राज्यों ने पुनर्विचार याचिका दायर की कि परीक्षा नहीं होनी चाहिए. मीडिया में खूब कवरेज़ हुआ. सुप्रीम कोर्ट में फिर से केंद्र सरकार ने कहा कि वह परीक्षा कराने के लिए तैयार है और परीक्षा होगी. सुप्रीम कोर्ट को सरकार की बात माननी पड़ी. 13 सितंबर को NEET और 16 सितंबर को JEE की परीक्षा हुई. 25 लाख छात्रों ने किस हालात में परीक्षा दी और उनके साथ क्या हुआ, वही जानते होंगे. लेकिन उस दिन छात्र तालाबंदी में अपनी आवाज़ हार गए. कई विश्वविद्यालयों में परीक्षाओं का आयोजन हुआ और नहीं चाहते हुए भी परीक्षा देनी पड़ी. 

हम सब तब मानते थे कि परीक्षा नहीं होनी चाहिए लेकिन परीक्षा हुई. उसके बाद तमाम यूनिवर्सिटी में परीक्षा हुई और छात्र शामिल हुए. इस संदर्भ में देखें तो नहीं लगता कि AKTU में कोई राहत मिलने वाली है. तालाबंदी और कोरोना के समय परीक्षाओं को लेकर एक नीति बननी चाहिए थी. ऐसी नीतियों की क्या हालत है आपको पता है. दिक्कत है आप तब जागते हैं जब आप पर बन आती है. जब तक आपका जीवन प्रभावित नहीं होता है इन बातों से मतलब नहीं रखते हैं. लिहाजा कई जगहों पर छात्रों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा और परीक्षा देनी पड़ी. 

डॉ ए पी ए अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी है के सैंकड़ों छात्र मुझे मैसेज कर रहे हैं. यह सरासर अभद्रता और अज्ञानता है.किसी के नंबर पर लगातार फ़ोन करना भी ठीक नहीं है. मैं समझता हूँ कि आप परेशान हैं लेकिन इसमें मेरी भूमिका नहीं है. अब के समाज में किसी की नहीं सुनी जाती होगी. जब बाकियों की नहीं सुनी जा रही थी तो आप चुप थे .आपकी नहीं सुनी जाएगी तो बाक़ी चुप रहेंगे. उम्मीद है यूनिवर्सिटी में किसी को अक्ल आएगी कि आपकी बात सुनें और कोई रास्ता निकालें. नहीं तो व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में नेहरु मुसलमान हैं या मुसलमानों की आबादी बढ़ने वाली है इस तरह के मीम की सप्लाई कर दे नौजवान सारी तकलीफ़ भूल कर उसमें रम जाएँगे. यह काम यूनिवर्सिटी भी कर सकती है या नौजवान अपने माता पिता के व्हाट्स एप से ऐसे मैसेज ले सकते हैं. मुझे क्यों दिन रात मैसेज करते हैं.

मैंने तो सार्वजनिक तौर पर कहा है कि नौकरी सीरीज़ और यूनिवर्सिटी सीरीज बंद कर दी है. उसके कारण भी विस्तार से बताए हैं. आप पढ़ सकते हैं. पर किसी को जानने में दिलचस्पी नहीं है. सब अपनी पसंद की लाइन खोज कर पढ़ना चाहते हैं. आपकी मर्ज़ी. आप इसी में खुश रहे हैं कि नेहरू मुसलमान थे. आप को कभी इस बात से फर्क नहीं पड़ा कि शिक्षा का सिस्टम खत्म हो रहा है. मीडिया का सिस्टम खत्म हो रहा है. जब सब खत्म हो गया तो एक आदमी से सारे मुद्दों की आस करना ठीक नहीं है. न मैं कर सकता हूं. 

ख़ैर, जब साठ लाख किसानों से जुड़े मसले पर सुनवाई नहीं है. उन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. इसका मतलब है कि बाकी का समाज चुप है. उसे फर्क नहीं पड़ता या वह भी इसे सही मानता होगा. जो भी है. तो फिर कुछ यूनिवर्सिटी के छात्रों को क्यों लगता है कि उनकी परीक्षा की बात पर टीवी में डिबेट होगा. उन्होंने कब इस तरह का डिबेट देखा है. मैंने ढाई साल नौकरी सीरीज़ और यूनिवर्सिटी सीरीज़ की. वह छात्रों के बीच ही मुद्दा नहीं बना. छात्रों को हिन्दू मुसलमान टापिक चाहिए. बस अपना डेट कैंसिल हो जाए या परीक्षा का डेट अनाउंस हो जाए. रिज़ल्ट निकल जाए. आप यहीं तक सीमित रहना चाहते हैं. आपकी मर्ज़ी. मुझे एक सवाल का जवाब दीजिए. जब साठ लाख किसानों की नहीं सुनवाई हो रही है तो आप अपनी संख्या चार लाख या पांच लाख बताकर किसे जताना चाहते हैं? किसे फर्क पड़ता है? 


मुझे नहीं पता कि यूनिवर्सिटी क्या फैसला लेगी. वैसे भी तारीख रद्द कराने और स्थगित कराने के मामलों से पत्रकारों को बचना चाहिए .तारीख़ न आ रही हो तो अलग बात है. क्योंकि कई बार सरकारें फार्म भरा कर परीक्षा ही नहीं लेती हैं. छात्रों का जीवन बर्बाद होता है. AKTU के छात्रों की बात सही है कि पढ़ाई का मौका नहीं मिला. कोरोना का ख़तरा था. पर इस देश में कोरोना को लेकर सतर्कता बरती ही कब गई. सब चुनावी रैली कर रहे हैं. आप आवाज़ उठाएंगे, किसान आवाज़ उठाएंगे तो ये कोरोना के समय के लिए बने नियमों का डर दिखाएंगे. इस व्यवस्था को बनाने में आप भागीदार थे. अब भी हैं.

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