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Ram Navami Special: कहां बसते हैं राम, कैसे हो सकते हैं दर्शन

मेधा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 26, 2026 17:13 pm IST
    • Published On मार्च 26, 2026 17:13 pm IST
    • Last Updated On मार्च 26, 2026 17:13 pm IST
Ram Navami Special: कहां बसते हैं राम, कैसे हो सकते हैं दर्शन

भारत कथा, श्रद्धा और स्वप्न का देश है. कथाएं हमारे भीतर श्रद्धा का संचार करती हैं. श्रद्धापुंज से आलोकित मनुष्य नई कथाएं रचता है अथवा पुरानी कथाओं का पुनर्सृजन करता है. कह सकते हैं कि श्रद्धा और कथा के माणिकंचन संयोग से स्वप्नों का निर्माण होता है. अपने युग धर्म की आवश्यकता के मुताबिक भिन्न-भिन्न श्रद्धावान आलोकित आत्माओं ने एक ही कथानायक की कथा को थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ अलग-अलग युगों में बांचा. श्रद्धा और कथाओं से बना भारत का एक ऐसा ही महास्वप्न 'राम' हैं.

'राम'नाम की श्रद्धा ने हमारे देश को कई महानायक दिए. उन महानायकों ने अपने-अपने ढंग से अपने-अपने युगों की आवश्यकता से प्रेरित होकर राम-कथा की पुर्नरचना की. उन कथाओं ने भारत के जनमानस को रचा, संस्कारित किया और 
देश को नया स्वप्न दिया. उन महानायकों की पंक्ति में पहला नाम महर्षि वाल्मीकि का आता है.

कैसे हैं महर्षि वाल्मीकि के राम

महर्षि वाल्मीकि का प्रारंभिक नाम रत्नाकर था. वे जीवनयापन और परिवार के भरण-पोशण के लिए डकैती करते थे. कहते हैं कि एक दिन उनकी भेंट नारद मुनि से हुई. नारद मुनि ने प्रश्न किया कि क्या परिवार उनके पापों में सहभागी होगा. परिवार ने जब पाप में सहभागी होने से इनकार कर दिया, तब उनका हृदय परिवर्तन हुआ. इसके बाद उन्होंने नारद मुनि के कहने पर 'राम' नाम का जप (प्रारंभ में 'मरा' जपते हुए) किया और कठोर तपस्या की. सालों की तपस्या से उनका शरीर दीमकों का घर बन गया. चूंकि दीमकों के घर को वाल्मीक कहते हैं, इसलिए उनका नाम 'वाल्मीकि' पड़ गया.

एक दिन वाल्मीकि ने तमसा नदी के तट पर एक क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर के वध को देखा. इस घटना से उनके हृदय में गहरी करुणा जागी. मादा क्रौंच की विरह-वेदना उनसे सही नहीं गई. मादा क्रौंच की विरह-वेदना से एकाकार होकर उनके मुख से पहला श्लोक फूटा, जिसे संस्कृत का प्रथम श्लोक माना जाता है. इसी करुणा से प्रेरित होकर उन्होंने रामायण की रचना की और 'आदिकवि' कहलाए. 'राम' नाम ने ऐसा हृदय परिवर्तन किया कि डाकू का मन करुणापूरित हृदय में रूपान्तरित हो गया. कह सकते हैं कि महर्षि वाल्मीकि के जीवन की कहानी 'राम' नाम के मर्म को उद्घाटित करती है - मनुष्य के भीतर दानव और देवता दोनों की संभावना है, लेकिन 'राम' नाम से मनुष्य अपने भीतर की दानवता पर विजय प्राप्त कर देवता बन सकता है.

महर्षि वाल्मीकि की वाल्मीकि रामायण के राम एक आदर्श मानव के रूप में सामने आते हैं, जिनमें गहरी मानवीय संवेदनाएं और उच्च नैतिक आदर्शों का समन्वय है. वे पिता की आज्ञा का पालन करते हुए सहज भाव से वनवास स्वीकार करते हैं और सीता-वियोग में दुःख प्रकट कर अपनी मानवीय संवेदनशीलता दिखाते हैं. धर्म, कर्तव्य, धैर्य और मर्यादा के प्रति उनकी अटूट निष्ठा उन्हें 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के रूप में स्थापित करती है, जो केवल पूजनीय ही नहीं, बल्कि अनुकरणीय भी हैं. वाल्मीकि के दशरथ सुत राम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे 'ईश्वर होते हुए भी पूर्ण मानव' हैं, ऐसे मानव, जो हमें सिखाते हैं कि जीवन में महानता शक्ति से नहीं, बल्कि धर्म, करुणा और मर्यादा से प्राप्त होती है.

कैसे हैं तुलसीदास के राम

प्राचीन काल के महर्षि वाल्मीकि के राम एक लंबी यात्रा तय करके मध्यकाल के भक्ति आंदोलन तक पहुंचते हैं. उस युग में राम विभिन्न सगुण-निर्गुण संतों के जरिए कई बार अवतरित हुए. उनमें सबसे प्रसिद्ध सगुण भक्त तुलसीदास के राम हैं.एक स्त्री के वासनात्मक प्रेम में निमग्न तुलसीदास की गुरु उनकी पत्नी रत्नावली बनती हैं. उनके धिक्कार से तुलसी का वासनायुक्त मन विरक्त होकर राम की शरण लेता है. उनके द्वारा रचित रामचरितमानस में एक बार पुनः राम अपने युगधर्म की आवश्यकता के अनुसार अवतरित होते हैं.

तुलसीदास के 'राम' करुणामय, भक्तवत्सल और सगुण-साकार ईश्वर हैं. वे अपने भक्तों के प्रेम को ही सर्वोपरि मानते हैं- इसी कारण शबरी के जूठे बेर प्रेमपूर्वक स्वीकार करते हैं और निषादराज को गले लगाकर यह सिद्ध करते हैं कि उनके लिए ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं, जैसा कि कहा गया है,'रामहि केवल प्रेम पियारा', विभीषण जैसे शत्रु-पक्ष के व्यक्ति को भी शरण देकर वे अपनी असीम दया और क्षमा का परिचय देते हैं-'शरणागत कहुं जे तजहिं'. तुलसी के राम में ईश्वरत्व और सरलता का अद्भुत समन्वय है; वे सर्वशक्तिमान होते हुए भी अपने भक्तों के निकट और उनके दुखों के सहभागी हैं. साथ ही,'राम नाम मनि दीप धरु' के माध्यम से तुलसी यह प्रतिपादित करते हैं कि राम का नाम ही मुक्ति का सरलतम मार्ग है. इस प्रकार तुलसी के राम विष्णु का अवतार होते हुए भी प्रेम, भक्ति और करुणा के जीवंत प्रतीक बनकर सामने आते हैं.

कह सकते हैं कि राम का स्वरूप महर्षि वाल्मीकि की वाल्मीकि रामायण और गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में भिन्न दृष्टियों से प्रस्तुत हुआ है. वाल्मीकि के राम एक आदर्श मानव हैं, जो सीता-वियोग में दुःखी होकर रोते हैं और परिस्थितियों से जूझते हैं- इससे उनकी मानवीय संवेदनाएं स्पष्ट होती हैं; जबकि तुलसी के राम साक्षात् ईश्वर हैं, जो शबरी के जूठे बेर प्रेमपूर्वक ग्रहण करते हैं और विभीषण को शरण देकर अपनी करुणा और भक्तवत्सलता दिखाते हैं, 'रामहि केवल प्रेम पियारा.' इस प्रकार, वाल्मीकि के राम 'जीने योग्य आदर्श' हैं, जबकि तुलसी के राम 'भक्ति के पूज्य ईश्वर' के रूप में सामने आते हैं.

सगुण और साकार राम

सच कहें तो वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस ने भारतीय जनमानस में सगुण-साकार राम के स्वरूप को गढ़ने का काम किया. दोनों के ही राम ईश्वर होते हुए भी मानवीय हैं और इसी आधार पर सगुण राम की आलोचना भी होती रही है समाज में. आज भी मिथिला के लोग अयोध्या की तरफ अपनी बेटी का ब्याह नहीं करना चाहते हैं. धोबी के कहने पर सीता को चुपचाप वनवास दे देना, राम के कई मानवीय स्वभाव की कमजोरी वाले क्षणों में से एक माना जाता है. लेकिन राम-सीता के वियोग का सबसे उज्जवल पक्ष यह है कि राम ने सीता के साथ संयोग और वियोग दोनों की मर्यादा का निर्वाह करते हुए सीता को अनन्य प्रेम किया. जिस विरह को सीता ने अपने प्रत्येक सांस में अनुभूत किया, उसी विरह को राम ने भी उसी तीव्रता से जिया. अन्तर केवल स्थान का था. सीता वन में विरह झेल रही थीं और राम महल में. लेकिन सीता के प्रति राम के अनन्य प्रेम को राजसी प्रलोभनों का संसार कभी डिगा नहीं पाया. सीता के प्रति राम का अनन्य प्रेम भारतीय पुरुष का आदर्श होना चाहिए. भारतीय स्त्री तो सदैव ही पति के धनोर्पाजन पर परदेश जाने पर उसके प्रति पतिधर्म का निर्वाह करते हुए अकेले ही बच्चों का पालन-पोषण करती रही है और गृहस्थी चलाती रही है और बिरहा गाती रही है. लेकिन परदेस गया वही पति परदेस में अपनी पत्नी की याद में बिरहा गाने की बजाय उसकी सौत कर लेता है. बहुधा वह किसी पति धर्म का निर्वाह नहीं कर पाता है. लोक साहित्य ऐसे प्रसंगों से भरा पड़ा है. सुप्रसिद्ध विदेशिया लोक नाटक की कथा यही है.

कहा जा सकता है कि भारतीय स्त्रियां तो सीता होती रही हैं लेकिन भारतीय पुरुष के राम होने की कथा कम ही है. राम के प्रति सच्ची भक्ति तो यही होगी कि हम राम के चरित्र के गुणों को अपने भीतर उतार सकें.

सगुण के संसार से बाहर भी राम का एक बहुत बड़ा भक्ति का साम्राज्य है. वह है निर्गुण निराकार राम का संसार. निर्गुण संत रविदास के राम पारंपरिक राजसी या अवतारी रूप से भिन्न, निराकार, सर्वव्यापक हैं और समानता के प्रतीक हैं. उनके लिए 'राम' किसी विशेष रूप या जाति-धर्म से बंधे देवता नहीं, बल्कि वह परम सत्ता हैं, जो हर जीव में विद्यमान है. रविदास कहते हैं,''रैदास हमारौ राम जी, दशरथ करि सुत नाहिं. राम हमउ मांहि रहयो, बिसब कुटंबह माहिं.''कह सकते हैं कि संत रविदास के 'राम' शुद्ध अंतःकरण में बसते हैं. उनके राम प्रेम, समता और आंतरिक भक्ति के प्रतीक हैं, जो मनुष्य को बाह्य भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता का मार्ग दिखाते हैं.

कबीर के राम भी पारंपरिक अवतारी या सगुण रूप से भिन्न, एक निराकार, निर्गुण और सर्वव्यापक सत्ता हैं. वह कहते हैं- 'कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढ़ूंढ़ै बन माहिं. ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखै नाहिं.'' कबीर के राम कहीं बाहर नहीं, बल्कि हर हृदय और कण-कण में विद्यमान हैं. कह सकते हैं कि सभी संतों की साधना का उत्कर्ष यह है कि सगुण और निर्गुण राम का भेद मिट जाता है. तब कबीर कह उठते हैं, ''एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट-घट में बैठा. एक राम का सकल पसारा, एक राम त्रिभुवन से न्यारा.'' और तुलसीदास जी इसी बात को इस तरह कहते हैं, ''सिय राम मय सब जग जानी. करहु प्रणाम जोरी जुग पानी.'' 

निष्कर्ष यह है कि राम तो जड़-चेतन सब में, कण-कण में व्याप्त हैं और उन्हें वही पा सकता है, जो जड़-चेतन सकल जगत में राम के दर्शन करता है और ऐसा मन की निर्मलता के बिना कर पाना संभव नहीं है. तुलसीदास जी ने स्पष्ट कह दिया है-

''निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा''

तो चलिए इस रामनवमी 'राम' को राजनीतिक एजेंडा बनाने अपने स्वार्थ के लिए उस नाम को इस्तेमाल करने के बजाय उनको पाने के लिए अपने अंतःकरण को निर्मल करने का उपक्रम करते हैं.

डिस्क्लेमर: लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में पढ़ाती हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखिका के निजी हैं और उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.

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