शरण कुमार लिंबाले को सरस्वती सम्मान : ‘हम फेंके हुए बस टिकटों जैसे थे’

शक, दलित जीवन ने बीती सदियों में जो कुछ झेला है और जो अब भी झेल रहा है, उसके मुक़ाबले यह प्रतिदान बूंद भर भी नहीं है, कि दलित सम्मान और बराबरी की लड़ाई अभी लंबी चलनी है और जितनी समाज में चलनी है उससे ज़्यादा दिलों के भीतर कई परतों में चलनी है.

शरण कुमार लिंबाले को सरस्वती सम्मान : ‘हम फेंके हुए बस टिकटों जैसे थे’

मराठी लेखक शरण कुमार लिंबाले (फाइल फोटो)

ज़ख़्मों के लिए पुरस्कार और उस पर ताली बजाना कोई बेहतर मानवीय उपक्रम नहीं है. इसलिए मराठी लेखक शरण कुमार लिंबाले के उपन्यास 'सनातन' पर 15 लाख रुपये के सरस्वती सम्मान की घोषणा को उस तरह नहीं देखना चाहिए जिस तरह हम सभी पुरस्कारों को देखते हैं. देखना हो तो इस पुरस्कार को एक मरहम की तरह देख सकते हैं- एक सामाजिक अन्याय के प्रति अपने पश्चाताप की तरह देख सकते हैं- या कम से कम दलित लेखन की मार्फत सामने आ रही सामाजिक सच्चाई के उस दबाव की तरह देख सकते हैं जो साहित्यिक संस्थाओं और आयोजनों को आंख झुकाने को मजबूर कर रहा है. बेशक, दलित जीवन ने बीती सदियों में जो कुछ झेला है और जो अब भी झेल रहा है, उसके मुक़ाबले यह प्रतिदान बूंद भर भी नहीं है, कि दलित सम्मान और बराबरी की लड़ाई अभी लंबी चलनी है और जितनी समाज में चलनी है उससे ज़्यादा दिलों के भीतर कई परतों में चलनी है. 

बहरहाल, अभी तो केके बिड़ला फाउंडेशन को इस बात की बधाई दी जानी चाहिए कि उसने मुख्यधारा के तथाकथित 'मानवीय' साहित्य के बाहर जाकर एक ऐसे लेखक को सरस्वती सम्मान के लिए चुना जिसने हमारे समाज की कुछ ऐसी सच्चाइयां लिखीं, जिनसे आंख मिलाना तो दूर, जिन्हें हम ठीक से पहचानते और समझते तक नहीं थे. जिस उपन्यास 'सनातन' के लिए शरण कुमार लिंबाले को यह सम्मान मिला है, वह भी अपने-आप में काफ़ी महत्वपूर्ण है. 2010 में प्रकाशित हुआ यह उपन्यास पिछली कुछ सदियों के सामाजिक इतिहास की तरह पढ़ा जा सकता है. मुगल काल और ब्रिटिश काल के बीच सिंहासन और सत्ता के टकराव के समानांतर अछूती रह गई एक बड़ी सामाजिक कथा इस उपन्यास में बहुत मार्मिकता के साथ दर्ज है- उस भीमा कोरेगांव का संघर्ष भी जिसकी स्मृति में हुए आयोजन को लेकर मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान ने बहुत निर्मम और निरंकुश ढंग से राजनीतिक प्रतिशोध की असमाप्त कार्रवाई कर रखी है. अगर यह इत्तिफ़ाक़ भी है तो छोटा नहीं है कि शरण कुमार लिंबाले ने जब भीमा कोरेगांव का इतिहास लिखा, उसके कुछ ही साल बाद उसकी स्मृति के आयोजन ने वर्तमान को और उसके हुक्मरानों को इस तरह आक्रांत कर दिया कि वे झूठे मुक़दमे बनाने लगे, 80 पार के कवियों और बुद्धिजीवियों को जेल में डालने लगे. 

एक तरह से देखें तो सरस्वती सम्मान के एक और विजेता लेखक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने अपने उपन्यास 'कई चांद थे सरे आसमां' में अगर रहन-सहन और सामाजिक जीवन के अभिजात पक्ष का अद्भुत चित्रण किया है तो शरण कुमार लिंबाले ने 'सनातन' में उस निचुड़ते हुए दर्द की कहानी कही है जो समाज की न जाने कितनी परतों के नीचे अनकहा और कराहता हुआ पड़ा रहा और जिसने समय-समय पर अपने ढंग से प्रतिरोध किया और अपने शौर्य का प्रदर्शन भी किया.

लेकिन शरण कुमार लिंबाले का महत्व इतना ही नहीं है. अपनी जिस कृति से उनको एक बड़ी पहचान मिली, वह उनकी आत्मकथा 'अक्करमाशी' है. अस्सी के दशक में पहली बार छप कर आई यह कृति सिर्फ़ मराठी ही नहीं, भारतीय दलित साहित्य के लिए जैसे युगांतरकारी साबित हुई. इसके कई भाषाओं में अनुवाद हुए. अंग्रेज़ी के अनुवाद 'आउटकास्ट' ने उनकी ख्याति को सरहदों के पार पहुंचाया. इसने संभवतः पहली बार दलित जीवन के उस संकट को सामने रखा हम जिसे ठीक से समझ तक नहीं सकते. 'बास्टर्ड'- या अवैध संतति होने की त्रासदी निजी और सामाजिक स्तरों पर कितनी चोट करती है, कितना कुछ छीन लेती है, इसका बिल्कुल सिहरा देने वाला ज़िक्र लिंबाले ने अपनी इस आत्मकथा में किया है. दलित होने का दंश कितना गहरा होता है- यह आत्मकथा बताती है. लिंबाले एक ज़्यादा बड़ी सच्चाई पर उंगली रखते हैं. वे लिखते हैं कि किसी व्यक्ति की जाति से ही जैसे उसका सबकुछ तय हो जाता है- वह क्या खाएगा, कैसे कपड़े पहनेगा, किससे शादी करेगा- सबकुछ. दलित होने की विडंबना तो यही है कि वे जैसे इस कुएं से बाहर निकल नहीं सकते, दूसरे कुओं में झांक तक नहीं सकते. लेकिन इसकी एक और विडंबना भी है. लिंबाले जैसे लोग पूरी जाति-व्यवस्था से ही बाहर कर दिए जाते हैं. लिंबाले की आत्मकथा बताती है कि उनके पिता एक पाटील सवर्ण थे, मां एक अछूत महिला. उन्हें पिता की पहचान भी नहीं मिली और वे मां की जाति से भी वंचित कर दिए गए. मां एक झोपड़ी में रहती थी जबकि पिता एक भव्य मकान में. लिंबाले हर जगह अपनी पहचान से वंचित रहे. उन्होंने लिखा, बस स्टैंड हमारे लिए घरों जैसे होते थे, हम बेकार हो चुके बस टिकटों की तरह पड़े रहते थे.'

'अक्करमाशी' का प्रकाशन किसी क्रांति से कम नहीं रहा. इसे पढ़ने के बाद दलित लेखकों के भीतर यह आत्मविश्वास जागा कि वे अपनी कहानी लिख सकते हैं. दलित आत्मकथाओं की बाढ़ आ गई. मराठी में दया पवार की 'अछूत' और लक्ष्मण गायकवाड की 'उठाईगीर' जैसी आत्मकथाएं तत्काल याद आती हैं. हिंदी में भी मोहनदास नैमिषराय की 'अपने-अपने पिंजड़े' ओम प्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन', तुलसीराम की ‘मुर्दहिया' और ‘मणिकर्णिका', श्यौराज सिंह बेचैन की 'मेरा बचपन मेरे कंधों पर', सुशीला टाकभौरे की ‘शिकंजे का दर्द', कौशल्या बैसंत्री की 'दोहरा अभिशाप', सूरजपाल सिंह की 'संतप्त' आदि एक बड़े सिलसिले के बस चंद नाम हैं.

फिर कहना होगा, ये आत्मकथाएं नहीं हैं, बरसों से घुटी हुई चीखें हैं, दशकों से उठाया जा रहा बोझ है, सदियों से झेली जा रही यंत्रणा है. कई बार वे इतनी कुरूप हो उठती हैं कि हम उन्हें देखते हुए डरते हैं, कई बार इतनी नाटकीय कि हम उन पर भरोसा नहीं करते, कई बार इतनी खुरदुरी कि हमें शिल्प की फ़िक्र सताने लगती है, कई बार इतनी अनगढ़ कि उन्हें संपादित करने की इच्छा होती है. लेकिन वे हमारी चिकनी चेतना पर लगातार पड़ रहे ऐसे पत्थर हैं जिनसे धीरे-धीरे सूराख शायद हो रहा है. अब तक समीक्षाओं और सम्मानों की कतार से बाहर खड़े इन लेखकों को अब सम्मान मिल रहा है- यह इस सरस्वती सम्मान से फिर साबित हुआ है.

बेशक, इसके साथ दलित साहित्य से उम्मीदें भी बड़ी हुई हैं और उसकी चुनौतियां भी. अब उसे निजी तकलीफ और सामाजिक ग़ैरबराबरी की दास्तानों से आगे जाकर वह वैचारिक उद्यम भी करना होगा जो एक नया समाज बनाने के लिए ज़रूरी है. बल्कि इस सिलसिले में भी काफ़ी कुछ काम पहले से चल रहा है. इस वैचारिक उद्यम के लिए पर्याप्त कच्चा माल गांधी से लेकर अंबेडकर और लोहिया तक के विचारों में तरह-तरह से मौजूद है. उम्मीद करें कि लेखन और विचार का यह सिलसिला आगे बढ़ेगा और विचार और सरोकार की नई सरहदों का संधान करेगा.


प्रियदर्शन NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...

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