कांग्रेस डूबता जहाज़ है या अपरिहार्य और स्थगित होता विकल्प?

आज की तारीख़ में कांग्रेस के बारे में क्या लिखा जाए? क्या नवजोत सिंह सिद्धू के इस्तीफे के साथ इस बात पर हंसा जाए कि पंजाब में कांग्रेस किस तरह अपने ही दांव में उलझ कर रह गई है?

कांग्रेस डूबता जहाज़ है या अपरिहार्य और स्थगित होता विकल्प?

आज की तारीख़ में कांग्रेस के बारे में क्या लिखा जाए? क्या नवजोत सिंह सिद्धू के इस्तीफे के साथ इस बात पर हंसा जाए कि पंजाब में कांग्रेस किस तरह अपने ही दांव में उलझ कर रह गई है? या फिर कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी के कांग्रेस में शामिल होने का उदाहरण देते हुए बताया जाए कि कांग्रेस अब भी एक संभावना है और नया ख़ून उसकी रगों में बहने को तैयार है? या पिछले कुछ अरसे से कांग्रेस के भीतर चल रहे घटनाक्रम को याद करते हुए दावा किया जाए कि कांग्रेस के दिन अब ढल चुके, उससे उसके पुराने साथी ही मायूस और नाउम्मीद हैं? आख़िर ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद के अब पुराने पड़ चुके उदाहरणों के बाद सुष्मिता देव और लुइजिन्हो फलेरो के नए उदाहरण हैं ही जो बताते हैं कि कांग्रेस का जहाज़ छोड़ कर उसके पुराने सहयोगी जा रहे हैं. इसमें राजस्थान के टकराव को जोड़ लें और मध्य प्रदेश में आपसी टकराव में सत्ता गंवाने के खेल को- तो कांग्रेस की कहानी पूरी हो गई लगती है जिसे कुछ ग़ैरपेशेवर क़िस्म के युवा नेता अब भी आगे बढाने की कोशिश में हैं.

लेकिन क्या इन दोनों तरह की घटनाओं में कोई संगति खोजी जा सकती है? क्या आने-जाने के इस खेल में कांग्रेस हिंदुत्व के चक्रवाती तूफ़ान में फंसा एक बड़ा और जर्जर जहाज़ है या समय की रेत पर औंधी पड़ी नाव, जिसकी पतवार कहीं खो गई है? या फिर ये दोनों बातें ग़लत हैं और कांग्रेस अपनी ताज़ा नाकामियों के बावजूद भारत में अतिवाद की ओर बढ़ती दक्षिणपंथी राजनीति का इकलौता सक्षम विकल्प है जिसे समर्थन देना दूसरे क्षेत्रीय दलों की मजबूरी है? क्या यह वह पनडुब्बी है जो किसी दिन निकलेगी और हिंदुत्ववादी राजनीति के अभेद्य लगते जहाज़ को भेद कर समुद्र में डुबो देगी? 

इसमें शक नहीं कि कांग्रेस के भीतर एक उद्वेलन जारी है. यह उद्वेलन वैचारिक भी है और सांगठनिक भी. वैचारिक स्तर पर कांग्रेस पुराने समाजवादी मूल्यों के क़रीब है- बेशक, अस्मितावादी राजनीति के समकालीन मुहावरों के साथ- यानी वह दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों की हमदर्द है. सांप्रदायिकता के विरुद्ध उसका रुख़ बेहद स्पष्ट है. यानी वह किसी भी सूरत में धर्मनिरपेक्षता पर समझौता करने को तैयार नहीं. लेकिन उसकी एक वैचारिक दुविधा यह है कि समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति की घटती हुई साख के साथ वह बर्बर होती सांप्रदायिक राजनीति के उन्माद का मुक़ाबला कैसे करे. यहां उसे नरम हिंदुत्व की चादर ओढ़नी पड़ती है, राहुल को मंदिरों के चक्कर काटने पड़ते हैं और शशि थरूर को याद दिलाना पड़ता है कि वे कैसे हिंदू हैं. हालांकि यह नुस्खा राजनीतिक तौर पर उसके लिए अभी तक कारगर साबित होता नहीं दिखता. कांग्रेस की दूसरी दुविधा आर्थिक मोर्चे पर है. यह स्पष्ट है कि अब इस देश में आर्थिक सुधारों के इंजन का मुंह मोड़ा नहीं जा सकता. लेकिन कांग्रेस के सामने यह सवाल है कि वह भारत के पूंजीपतियों के साथ खड़ी रहते हुए मज़दूरों और किसानों के साथ भी खड़ी होने का रास्ता कैसे निकाले.

लेकिन इन वैचारिक दुविधाओं से ज़्यादा बड़ा कांग्रेस का सांगठनिक संकट है. उसके जाने-पहचाने युवा चेहरे कांग्रेस को छोड़ कर जा रहे हैं, जहां उसकी सरकारें चल रही हैं, वहां अंदरूनी कलह शिखर पर है. पंजाब, छत्तीसगढ़, राजस्थान- सब इसकी मिसाल हैं. पिछली दो लोकसभाओं में उसे शर्मनाक ढंग से दस फीसदी सीटें भी नहीं मिल पाईं. नेतृत्व के स्तर पर सोनिया गांधी की थकान, राहुल गांधी की अनिच्छा और प्रियंका गांधी के आधे-अधूरे हस्तक्षेप के साथ पार्टी की दिशाहीनता लगभग स्पष्ट है.

यानी कांग्रेस अभी जहां से खड़ी है वहां से आगे बस नाउम्मीदियां ही नाउम्मीदियां हैं. लेकिन अतीत में कांग्रेस ऐसी नाउम्मीदियों से निकल कर सामने आती रही है. 2003 में भी कांग्रेस लगभग ऐसी ही- या इससे भी बुरी स्थिति में थी. तब अटल-आडवाणी की बिल्कुल विराट लगती जोड़ी के सामने सोनिया गांधी का कुछ वैसा ही मज़ाक बनाया जाता था जैसे इन दिनों राहुल गांधी का बनाया जाता है. लेकिन 2004 के चुनावों में सबको हैरान करते हुए कांग्रेस अपने गठबंधन के साथ इस तरह सत्ता में आई कि अगले दस साल तक राज करती रही. इसी तरह आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की जीत को दूसरी आज़ादी का नाम दिया गया. तब वाकई सबने मान लिया कि अब कांग्रेस नहीं लौट पाएगी. लेकिन तीन साल के भीतर इंदिरा गांधी सत्ता में थीं. चाहें तो याद कर सकते हैं कि साठ के दशक में कांग्रेस के विभाजन और नौ राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकारों के गठन के बाद भी कांग्रेस के खात्मे की भविष्यवाणी शुरू हो चुकी थी, लेकिन 1966 की गूंगी गुड़िया 1971 आते-आते देवी दुर्गा में बदल चुकी थीं और कांग्रेस फिर से विकल्पहीन दिख रही थी. 
तो कांग्रेस अपनी राख से उठ खड़ी होती है- शायद इसलिए भी कि सवा सौ साल के अपने कुल इतिहास में वह भारत की मिट्टी में रच-बस गई है, सारी पस्तहाली के बाद भी हर इलाक़े में कांग्रेस के कुछ नामलेवा ज़रूर निकल आते हैं. लेकिन क्या राहुल-प्रियंका या सोनिया इस अतीत के भरोसे ही रह सकते हैं? यह सच है कि कांग्रेस का हाल इतना बुरा कभी नहीं था. 2019 में कांग्रेस के कुल वोट 20 फ़ीसदी से भी नीचे चले गए. 1998 या 1999 में ऐसी स्थिति नहीं थी. इस लिहाज से कांग्रेस के इन नए सिपाहसालारों की लड़ाई कहीं ज़्यादा मुश्किल है.

पंजाब में सिद्धू प्रकरण ने क्या इस लड़ाई को कुछ और मुश्किल बनाया है? इसका ठीक-ठीक आकलन मुश्किल है, लेकिन कांग्रेस के भीतर पहले भी बहुत सारे लोग मानते रहे कि सिद्धू के सहारे चुनाव नहीं जीता जा सकता. पंजाब में अगर कांग्रेस मजबूत स्थिति में नज़र आ रही है तो इसके लिए कैप्टन अमरिंदर के समय के कामकाज से ज़्यादा लोगों की बीजेपी या अकाली दल से हताशा और मायूसी है. आम आदमी पार्टी इसी में सेंधमारी की कोशिश कर रही है और कल तक जो सिद्धू आम आदमी पार्टी को राजनीति के राखी सावंत लग रहे थे, अचानक एक उम्मीद लगने लगे हैं. बेशक, सिद्धू के रवैये ने बस यह बताया है कि कांग्रेस आलाकमान ने उन पर भरोसा कर गलती की और पंजाब में अपनी स्थिर सरकार को अस्थिर कर डाला और एक दिग्गज नेता को खुद से दूर कर लिया. आख़िर यही कैप्टन अमरिंदर सिंह थे जिन्होंने 2014 की मोदी लहर में भी अमृतसर से बीजेपी के दिग्गज नेता अरुण जेटली को हंसते-हंसते हराया था.

बहरहाल, नेताओं के आने-जाने से पार्टियों की सेहत पर ज़्यादा अंतर नहीं पड़ता, यह कांग्रेस और बीजेपी दोनों का अतीत बताता है. कल्याण सिंह, उमा भारती, येदियुरप्पा सब पार्टी छोड़ कर गए लेकिन लौट कर आने को अभिशप्त रहे. यही स्थिति कांग्रेस के कई नेताओं की रही. वैसे भी ज्योतिरादित्य सिंधिया या जितिन प्रसाद या ऐसे दूसरे नेता कांग्रेस का कोई ज़मीनी आधार बना रहे थे- यह भ्रम शायद उनको छोड़ कर किसी और को नहीं रहा होगा. उनको उनकी जातिगत या पैतृक हैसियत से कुछ लाभ मिले हों तो बेशक मिले हों, लेकिन वे ज़मीन पर उतर कर राजनीति की शक्ल बदल नहीं सकते थे- ऐसा होता तो कांग्रेस का ये हाल न होता. दरअसल इनकी कुल राजनीति व्यक्तिवादी राजनीति रही जिसमें सबसे ज़्यादा नज़र अपनी हैसियत पर रही.

इस लिहाज से कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी का कांग्रेस में शामिल होना फिर भी एक बड़ी घटना है. बेशक, कन्हैया भी अब तक एक नाटकीय वक्ता से ज़्यादा बड़ी हैसियत अर्जित नहीं कर पाए हैं, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि उनकी वाकपटु आक्रामकता कांग्रेस के कुछ काम आ सकती है. इसी तरह जिग्नेश मेवाणी की मौजूदगी भी कांग्रेस की राजनीति में एक युवा और दलित आयाम जोड़ती है.

लेकिन यह सच है कि कोई करिश्मा इनसे भी नहीं होगा. भारतीय लोकतंत्र दरअसल ऐसे करिश्मों की इजाज़त कम देता है. 2014 में नरेंद्र मोदी अगर करिश्मे की तरह उभरे तो इसलिए भी कि मनमोहन सरकार के खिलाफ़ भ्रष्टाचार का आरोप इतना गहरा हो गया कि जनता उनका विकल्प खोजने लगी. लेकिन 2014 के बाद बीजेपी बहुत सचेत ढंग से भारतीय लोकतंत्र और वोटर का चरित्र बदलने मे जुट गई. उसने भारतीय वोटर के बड़े हिस्से को हिंदू वोटर में बदला और इसके सहारे 2019 की जीत हासिल की. इस काम में नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसे चेहरे उसके काम आए.

तो दरअसल यह कांग्रेस की नहीं, भारतीय लोकतंत्र की चुनौती है कि वह इस बदलते चरित्र का क्षरण रोके, नागरिक को सांप्रदायिक वोटर में बदलने न दे. लेकिन यह काम कांग्रेस से ज़्यादा ख़ुद बीजेपी कर डालेगी. दरअसल सांप्रदायिकता का यह खेल एक हद के बाद नहीं चलेगा, उसकी नाकामियां उसके वोटरों को निराश करेंगी और देर-सबेर समझाएंगी कि अंततः देश को ठोस मुद्दों से चलाया जाना है, नागरिकों के वास्तविक सवालों और संकटों के हल खोजने हैं. बेशक, समझाने का यह काम भी कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को करना होगा.

देर-सबेर यह हुआ तो अचानक कांग्रेस ‘बाउंस बैक' करती दिखेगी. सोए हुए पुराने कांग्रेसी जैसे जाग उठेंगे. फिर नेताओं को लेकर लोगों का नजरिया बदलेगा और विकल्प की राजनीति परवान चढ़ेगी. कन्हैया या जिग्नेश जैसे नेताओं का कांग्रेस में आना इसी विकल्प की तलाश की भी शुरुआत है. निस्संदेह, आगे का रास्ता बहुत मुश्किल है- लेकिन वह है और बना रहेगा.


प्रियदर्शन NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...

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