किसी भी राज्य में होने वाला धरना या प्रदर्शन उस राज्य की जनता द्वारा चुनी गई सरकार के ख़िलाफ़ ही होता है। कुछ प्रदर्शन कामयाब होते हैं, कुछ नाकाम और गुमनाम रह जाते हैं और कुछ लाठी खाकर खत्म हो जाते हैं।
ऑर्गेनाइजऱ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अंग्रेज़ी का मुखपत्र है। इसमें छपे दो लेखों के संदर्भ में ये बहस है कि क्या किसी प्रदर्शन या आंदोलन को एंटी हिन्दू कहा जा सकता है। किस पैमाने पर कहा जाना चाहिए और अगर इस तरह से सभी प्रदर्शनों को एंटी हिन्दू ठहराया जाने लगे तो क्या होगा।
जैसे जंतर मंतर पर कई दिनों से वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे पूर्व सैनिक भी क्या कभी हिन्दू विरोधी कहे जा सकते हैं। क्योंकि इनका विरोध भी तो उस सरकार से है जिसे जनता ने भारी बहुमत से चुना है। चुनाव का समय होता तो रोज़ कोई नेता प्रेस कांफ्रेस करता और छाती पीट पीट कर कहता कि मां भारती के सपूतों की ये दुर्दशा मुझसे नहीं देखी जाती है। हो सकता है कि सैनिकों की तरह किसानों, रेल मज़दूरों, शिक्षकों को अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करना पड़ जाए। लेकिन क्या आरएसएस के मुखपत्र ने ऐसा कहा है कि सभी प्रदर्शन हिन्दू विरोधी हैं। बिल्कुल ऐसा नहीं कहा है। सिर्फ आईआईटी मद्रास में हुए और एफटीआईआई पुणे में हो रहे प्रदर्शनों के बारे में ऐसा कहा है। आरएसएस का किसान संगठन मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध करता है लेकिन ऑर्गेनाइज़र ने किसान संघ को हिन्दू विरोधी नहीं लिखा है।
ऑर्गेनाइज़र पत्रिका में संदीप सिंह ने लिखा है कि जैसे ही केंद्र सरकार ने गजेंद्र चौहान को निदेशक के तौर पर नियुक्त किया, हिन्दू विरोधी तत्वों ने उनका इसलिए विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि उन्होंने धर्मराज युद्धिष्ठिर का रोल किया है। गजेंद्र चौहान ने 150 फिल्मों और 600 से ज़्यादा सीरीयल में काम किये हैं। उनके बराबर तो बीजेपी का विरोध करने वाले स्व यू आर अनंतमूर्ति भी नहीं हैं।
आप जानते हैं कि कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे एफटीआआई के छात्रों का अनुपम खेर, सलमान ख़ान, रणबीर कपूर, ऋषि कपूर जैसे कई कलाकारों ने समर्थन किया है। क्या अनुपम खेर अब हिन्दू विरोधी हो जाएंगे। अजय देवगन जैसे कई कलाकारों ने गजेंद्र चौहान का समर्थन भी किया है तो अजय देवगन हिन्दू समर्थक हो गए। क्या यह चेतावनी है कि जो विरोध करेगा उसकी पहचान ऐसे ही होगी। ऑर्गेनाइज़र ने लिखा है कि कोई दिमागी रूप से बीमार ही गजेंद्र चौहान की साख का विरोध कर सकता है। लेखक तय नहीं कर पा रहे हैं कि गजेंद्र चौहान के विरोधी एंटी हिन्दू हैं या मानसिक रोगी। उन्हें यह समझना चाहिए कि गजेंद्र जी ने युद्धिष्ठिर का रोल किया था, वे युद्धिष्ठिर नहीं हैं। मुझे नहीं मालूम कि गजेंद्र चौहान की फिल्म खुली खिड़की और जवानी जानेमन धार्मिक थी या नहीं। मैंने तो देखी नहीं।
लेखक ने हिन्दू विरोधी छात्रों के सामने एक और दिलचस्प तर्क रखा है कि विरोध करने वाले भूल जाते हैं कि भारतीय फिल्म उद्योग की शुरुआत ही राजा हरिश्चंद्र से शुरू होती है जो हिन्दू और भारतीय इतिहास की आदमकद हस्ती थे। आज भी इंडस्ट्री का सबसे बड़ा अवार्ड राजा हरिश्चंद्र बनाने वाले दादा साहब फाल्के के ऊपर ही है।
अनुमान ही लगा सकता हूं कि इन छात्रों का 'राजा हरिश्चंद्र' फिल्म और उसके निर्माता दादा साहब फाल्के से भी विरोध होगा। ऑर्गेनाइज़र ने न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे सलिल त्रिपाठी के लेख का हवाला देते हुए लिखा है कि यू आर अनंतमूर्ति का बस चलता तो भारतीय सिनेमा शताब्दी 2055 में मनती क्योंकि यू आर अनंतमूर्ति के अनुसार भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र नहीं, सत्यजीत रे की पाथेर पांचाली है। अगर ये बात सही भी है तो लेखक इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंच गए हैं कि प्रदर्शनकारी छात्र भी अनंतमूर्ति की तरह ही राय रखते होंगे। यही नहीं आईआईटी मद्रास के अंबेडकर पेरियार ग्रुप के बारे में भी पत्रिका ने कहा है कि वे एंटी हिन्दू हैं। केंद्र सरकार ने इन्हें मान्यता देकर हिन्दू विरोधी गतिविधियां चलाने की अनुमति दे दी है। गनीमत है कि लेखक ने हिन्दू विरोधी समूह को मान्यता देने वाली मोदी सरकार को हिन्दू विरोधी नहीं कहा है।
एक और लेख में कहा गया है कि करदाताओं के पैसे से चल रहे आईआईटी, आईआईएम और एनआईआईटी जैसे संस्थानों में भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी गतिविधियां चल रही हैं।
रुड़की देवभूमि हरिद्वार का हिस्सा है और इसलिए मांसाहारी खाना रुड़की के हॉस्टलों में नहीं दिया जाता था, लेकिन कांग्रेस की सरकार में आईआईटी रुड़की में मांसाहारी भोजन शुरू करवा दिया गया। आईआईटी रुड़की में कर्मचारियों के लिए बनी मस्जिद को कम्यूनिटी मस्जिद बना दिया गया। कंट्रोल सिर्फ आईआईटी का नहीं रहा।
हमारे सूत्रों से पता चला कि अक्टूबर 2014 से रुड़की के हॉस्टलों में मांसाहार मिलना शुरू हुआ है लेकिन बनता नहीं है। बाहर से आता है। अक्टूबर 2014 में यूपीए की नहीं एनडीए की सरकार थी। रुड़की के होस्टलों में शाकाहार की परंपरा रही है।
जहां तक मस्जिद का सवाल है जो आईआईटी कैंपस में आती है तो पहले तो कैंपस में बिना आईआईटी के स्टिकर के किसी को अमूमन नहीं जाने दिया जाता लेकिन अगर कोई मस्जिद में जाना चाहे तो कोई मनाही भी नहीं है... और मस्जिद आईआईटी रुड़की की प्रॉपर्टी नहीं है, वक्फ़ की प्रॉपर्टी है।
हरिद्वार में हरकी पौड़ी के छह किलोमीटर के दायरे में मांसाहार और मदिरा की अनुमति नहीं है। उसके बाहर इन दुकानों को सरकार ही लाइसेंस देती है। आईआईटी रुड़की के बाहर निकलते ही मांस और मदिरा की दुकानें सरकारी राजस्व में अपना योगदान कर रही होती हैं। इसके बाद भी हमें इस मुगालते में भी नहीं रहना चाहिए कि संस्थाओं का राजनीतिक इस्तेमाल सिर्फ बीजेपी आरएसएस करती है। सबने किया है। ऑर्गेनाइज़र ने भी बताया है कि कैसे कांग्रेस और लेफ्ट का भी कई संस्थाओं पर आज भी कब्ज़ा है।
2007 में सीपीआई नेता ए.बी. बर्धन के दामाद समीर बरूआ को आईआईएम अहमदाबाद का निदेशक बनाया गया था। फैकल्टी मेंबर ने समीर बरूआ को दूसरा टर्म दिये जाने का विरोध किया था।
लेखक ने ड्राफ्ट आईआईएम बिल 2015 का समर्थन किया है जिससे राजनीतिक दलों के लिए निदेशक या चेयरमैन तय करना मुश्किल हो जाएगा। ड्राफ्ट बिल में साफ-साफ लिखा है कि चेयरमैन या निदेशक की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी। बोर्ड ऑफ गर्वनर में केंद्र और राज्य के मनोनित सदस्य होंगे। फिर भी ऑर्गेनाइज़र ने ड्राफ्ट बिल को सही समझा है तो उस हिसाब से गजेंद्र चौहान से लेकर उन सभी का विरोध करना चाहिए जिनकी नियुक्ति एफटीआईआई में हुई है और जिनका संबंध बीजेपी और आरएसएस से रहा है।
- अनघा घईसस के पति संघ के प्रचारक रहे हैं, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रचार के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाई है।
- नरेंद्र पाठक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद महाराष्ट्र के अध्यक्ष रहे हैं
- प्रांजल सैकिया आरएसएस से जुड़ी संस्था संस्कार भारती के सदस्य रहे हैं।
- राहुल सोलापुरकर बीजेपी के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं।
क्या व्यापमं घोटाले में खुलासा करने वाले कई पूर्व स्वयंसेवक भी एंटी हिन्दू बता दिये जाएंगे। मुझे नहीं मालूम कि ऑर्गेनाइज़र और आरएसएस की सोच को कितना अलग कर सकते हैं लेकिन बिना आरएसएस की सोच की सहमति के ऑर्गेनाइज़र में कुछ छप भी नहीं सकता। तो क्या होगा अगर किसी विरोध प्रदर्शन को एंटी हिन्दू, एंटी इंडिया कह दिया जाए।
This Article is From Jul 20, 2015
शिक्षण संस्थाओं का भगवाकरण?
Reported By Ravish Kumar
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Updated:जुलाई 20, 2015 23:29 pm IST
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Published On जुलाई 20, 2015 21:29 pm IST
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Last Updated On जुलाई 20, 2015 23:29 pm IST
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