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This Article is From Sep 22, 2014

महाराष्ट्र के गठबंधनों पर संकट

Ravish Kumar
  • Blogs,
  • Updated:
    नवंबर 20, 2014 12:50 pm IST
    • Published On सितंबर 22, 2014 21:11 pm IST
    • Last Updated On नवंबर 20, 2014 12:50 pm IST

नमस्कार... मैं रवीश कुमार। जनता जनार्दन की निष्काम सेवा हो सके, इसके लिए महाराष्ट्र की चार पार्टियां तय नहीं कर पा रही हैं कि मिलकर लड़ें या अकेले। 288 सीटों की लिस्ट सबने बना ली है, मगर अकेले लड़ने का एलान सब दूसरे पर छोड़ रहे हैं।

बीजेपी और शिवसेना की खींचतान गठबंधन के भीतर आज़ाद लोकतंत्र का नमूना है या लोकतंत्र के नाम पर किसी अज्ञात भय या अविश्वास का नमूना। अल्टीमेटम का इतना दुरुपयोग हो रहा है कि उसकी गंभीरता ही समाप्त हो गई है। ज़ाहिर है इस खींचतान में मार्केटिंग कंपनियों के बनाए नारे किंचित अकुला रहे होंगे, जिन्हें आपके भविष्य को बदलने के लिए गढ़ा गया है। सवाल आपकी मुक्ति का है, ज़ाहिर है बैठकें लंबी तो होंगी ही।

फिलहाल हिन्दुस्तान की राजनीति में धर्म के रूप में मान्यता प्राप्त गठबंधन के तमाम स्वरूप संकट में हैं। व्याकरण के हिसाब से पार्टियां स्त्रीलिंग होती हैं, मगर इनका नज़रिया पुलिंग की तरह है। इसीलिए पत्रकार बिग ब्रदर इस्तेमाल कर रहे हैं, बड़ी बहन नहीं। शायद हमारी बड़ी बहनों को ऐसी नकारात्मक प्रतिष्ठा हासिल नहीं है।

क्या बीजेपी शिवसेना के साथ बिग ब्रदर का गेम खेल रही है? क्या शिवसेना बड़ा भाई बनना चाहती है? ये कहानी दो-चार सीटों की है या उससे भी कुछ ज्यादा। क्या शिवसेना बीजेपी की विस्तारवादी नीति से सचेत हो रही है या बीजेपी कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को बीजेपी युक्त भारत में बदल देने के लिए बेताब है। बीजेपी का स्ट्राइक रेट हमेशा बेहतर रहा है। क्या बीजेपी को ज्यादा सीटें मिलने पर शिवसेना को कुर्सी नहीं मिलने का खतरा है।

शिवसेना साफ-साफ कह चुकी है कि महाराष्ट्र में उसे सत्ता चाहिए। बीजेपी ने इस पर कुछ नहीं कहा है। उद्धव ठाकरे कार्यकर्ताओं के बीच बीजेपी का मज़ाक उड़ाते हैं कि सीट मांगने आए हैं या देने आए हैं। नरेंद्र मोदी को 2002 में बाला साहब ठाकरे ने बचाया था। आप दिल्ली में राज कीजिए हम महाराष्ट्र में करेंगे। क्या शिवसेना असुरक्षित महसूस कर रही है? क्या उसे भरोसा नहीं है बीजेपी पर? क्या इस वजह से नहीं है, क्योंकि एनडीए नहीं है। नाम के लिए है मगर वाजपेयी के समय जो ढांचा बना था, जिसका चेयरमैन छोटे सहयोगी दलों से भी हो सकता था, वैसा एनडीए नहीं है।

शिवसेना बीजेपी का विवाद किसी कॉमन फोरम पर नहीं सुलझाया जा रहा है। पुणे में अमित शाह की सभा में नारा लग गया कि छत्रपति शिवाजी का है आशीर्वाद, चले चलो मोदी के साथ। टाइम्स ऑफ इंडिया में बीजेपी के नेता का बयान है कि उसके मंचों पर शिवाजी की तस्वीर होगी। जय शिवाजी-जय भवानी का नारा बीजेपी के कार्यकर्ता भी लगाएंगे। तो क्या बीजेपी भी सेना को उकसा रही है?

द हिन्दू में प्रियंका काकोदकर ने लिखा है कि इस बार जब अमित शाह मुंबई गए और मातोश्री नहीं गए तो शिवसेना के कार्यकर्ता पुरानी तस्वीर बांटने लगे कि कैसे मोदी ने बाला साहब ठाकरे के सामने सर झुकाया था।

लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने शिवसेना को केंद्रीय मंत्रिमंडल में खास महत्व नहीं दिया। शपथ ग्रहण तक शिवसेना के संभावित मंत्री ना-नुकुर कर रहे थे। शिवसेना ने भी दो बार यूपीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को समर्थन देकर बीजेपी के सामने बिग ब्रदर का रोल प्ले किया था। बड़ी बहन का नहीं।

लोकसभा चुनाव से पहले शिवसेना सुषमा स्वराज की काफ़ी वकालत किया करती थी। संजय राउत का बयान था कि बाला साहब ठाकरे ने प्रधानमंत्री पद के लिए सुषमा स्वराज को उपयुक्त माना था और उनके ये शब्द हमारे लिए आखिरी हैं। कर्नाटक विधानसभा में हारने के बाद सामना ने कहा था कि बीजेपी के सुपर स्टार मोदी ने जहां-जहां प्रचार किया, वहीं बीजेपी हार गई। क्या ऐसे बयानों के अतीत में इस खटास को देखा जाए या बीजेपी की चाहत को।

अगर यह गठबंधन टूटा तो क्या राजनीति के छात्र हिन्दुत्व के दो दावेदारों के बीच कोई तीव्र राजनीतिक संघर्ष देखेंगे। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद सामना ने लिखा था कि भारतीय जनता पार्टी हिन्दुत्व का चोला उतारकर सेकुलरिज्म की टोपी सर पर न चढ़ाए। अगर ऐसा किया तो कांग्रेस और बीजेपी में फर्क क्या? मोदी को गुजरात में वोट मिलते हैं तो कट्टर हिन्दुत्व की वजह से। क्या यह दिलचस्प नहीं है कि महाराष्ट्र की राजनीति की आउटलाइन बाहरी रेखाएं फिर से खींची जा रही हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया का एक कार्टून फिर से याद किया जा रहा है। महान कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण का बनाया हुआ है। इसमें बाल ठाकरे कुर्सी पर बैठे हैं और सामने वाली कुर्सी पर उनके पैर हैं। बीजेपी के नेता फाइल लेकर खड़े हैं और कुर्सी के नीचे मचिया रखी है जिसपर बैठने के लिए ठाकरे साहब कह रहे हैं। तो ऐसा नहीं है कि बीजेपी ने नहीं सहा है।

हो सकता है कि सब पितृपक्ष के खत्म होने का इंतज़ार कर रहे हों। भारतीय राजनीति का यह भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। चुनाव के बाद शरद पवार शिवसेना के साथ जाएंगे या बीजेपी के साथ यह भी एक अलग पक्ष है।

फिलहाल कांग्रेस एनसीपी के कार्यकर्ताओं के ना चाहने के बावजूद कांग्रेस एनसीपी एक साथ लड़ते हुए नज़र आ रहे हैं। संसद में पवार और उनकी पार्टी कांग्रेस या यूपीए से अलग लाइन लेने लगी है। जिस तरह से दो हिन्दुत्व दल अलग-अलग नाम से हो उसी तरह का संकट यहां भी हैं। दो कांग्रेस अलग-अलग नाम से हैं। एनसीपी नेता अजीत पवार कह चुके हैं कि वे पृथ्वीराज चौहान के नेतृत्व में अब और काम नहीं करना चाहेंगे। कांग्रेस ने चौहान को ही नेता बनाया है। पृथ्वीराज चौहान ने भी कहा है कि हम सभी सीटों पर विचार कर रहे हैं, अगर गठबंधन नहीं बन सका तो। कांग्रेस ने कहा है कि दो दिन इंतज़ार कीजिए।

इस बीच मनसे के राज ठाकरे अकेले हैं। जैसे लोकसभा चुनाव के पहले गडकरी की उनसे मुलाकात पर सेना नाराज़ हो गई थी। जैसे 2012 में नरेंद्र मोदी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण के दौरान अहमदाहबाद बुलाया था। उनके साथ कोई फिलहाल नहीं बात कर रहा है।

इसलिए महाराष्ट्र का चुनाव राष्ट्रीय हो गया है। गठबंधन टूटा तो महाराष्ट्र का चुनाव सीधे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए लिटमस टेस्ट हो जाएगा। यूपी और बिहार विधानसभा के चुनावों ने धोखा नहीं दिया होता तो अब तक बीजेपी फैसला कर चुकी होती। पितृपक्ष के कारण ही सब नहीं रुका पड़ा है। महाराष्ट्र का चुनाव चौतरफा हुआ तो किसे लाभ होगा? यूपी में तो बीजेपी को हुआ था। 73 सीटें मिल गईं थीं, लेकिन महाराष्ट्र में…

(प्राइम टाइम इंट्रो)

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