जब सात अगस्त को मक्का में सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के नेताओं ने हाथ मिलाया, तो यह सिर्फ एक और रक्षा समझौता नहीं था. यह इस बात का संकेत था कि तीन बड़ी सुन्नी-बहुसंख्यक शक्तियां अब उस मध्य-पूर्व से खुद को बचाने के लिए एक नया रास्ता खोज रही हैं, जिसमें अमेरिका पर भरोसा करना अब पहले जैसा आसान नहीं रहा. मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में कहा गया है कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा, यह भाषा नॉटो के मशहूर अनुच्छेद-5 से मिलती है, लेकिन इसमें नॉटो जैसी कोई ठोस संस्थागत व्यवस्था नहीं है. यही अस्पष्टता असल कहानी है. इस समझौते का कोई सार्वजनिक दस्तावेज़ नहीं है, कोई स्पष्ट पदानुक्रम नहीं, किसी दुश्मन का नाम नहीं, बस तीन देशों का यह भरोसा कि अस्पष्टता और गहरे रक्षा-औद्योगिक सहयोग का वादा वही काम कर देगा, जो पहले साफ़-साफ़ लिखी गई प्रतिबद्धताएं करती थीं.
क्यों महत्वपूर्ण है पाकिस्तान-तुर्किए और सऊदी अरब का समझौता
इस समझौते की जरूरत समझने के लिए पृष्ठभूमि देखना ज़रूरी है. यह उस समय आया है जब अमेरिका-ईरान युद्ध अभी थमा नहीं है. ईरानी मिसाइलें खाड़ी के तेल ठिकानों पर गिरी हैं, सऊदी अरब का पैट्रियट मिसाइल भंडार युद्ध के शुरुआती हफ्तों में करीब 80 फीसद तक खाली हो गया था और अमेरिका की संघर्ष विराम और नाकेबंदी वाली कूटनीति फरवरी से लगातार टूटती-बनती रही है. रियाद का गणित सीधा है: वह अब सिर्फ अमेरिकी गारंटी पर निर्भर नहीं रह सकता, उसके पास अभी तक अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान नहीं है. उसे ऐसे साझेदारों की ज़रूरत है जो उसे सिर्फ हथियार बेचें नहीं, बल्कि उसकी खुद की रक्षा-औद्योगिक क्षमता बनाने में मदद करें. सऊदी अरब के लिए यह समझौता ईरान और अस्थिर अमेरिका- दोनों के खिलाफ एक बचाव है. उसके विज़न 2030 के तहत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम भी है.
तुर्किए की सोच थोड़ी अलग है.उसके विदेश मंत्री हकान फिदान का कहना है कि यह समझौता ईरान को निशाना बनाकर नहीं किया गया है और नाटो के अनुच्छेद-5 जैसा सिर्फ 'तकनीकी रूप से' है, यानी मदद तभी मिलेगी जब हमला झेलने वाला देश खुद मदद मांगे. लेकिन तुर्किए की असली चिंता ईरान नहीं, इजरायल है. सीरिया में, जहां अहमद अल-शरा का दमिश्क अब तुर्किए की तरफ झुक रहा है. इससे तुर्किए और इजरायल के हित टकरा रहे हैं.तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगन बार-बार लेबनान और सीरिया में इजरायली हमलों को अपने देश की सुरक्षा के लिए खतरा बता चुके हैं. तुर्किए इस गठबंधन में नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना, एक मजबूत ड्रोन और लड़ाकू विमान उद्योग (कान लड़ाकू विमान, बायरकतार आकिंजी ड्रोन) लेकर आता है. इसके साथ ही वह पश्चिमी हथियार प्रणालियों के साथ अपनी तकनीकी क्षमता को इस साझेदारी में जोड़ता है, इसमें पाकिस्तान के ज़रिए चीन भी परदे के पीछे मौजूद है.
इस समझौते का सबसे अधिक फायदा किसे होगा
पाकिस्तान इस पूरे समझौते की सबसे अहम कड़ी है. शायद इसके लिए यह पैक्ट किसी और से ज़्यादा बड़ा बदलाव लेकर आया है. सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने एक दशक पुरानी, दोनों प्रमुख दलों की सहमति वाली उस नीति को पलट दिया है, जिसके तहत पाकिस्तान खाड़ी के झगड़ों में तटस्थ रहता था. यह तटस्थता पाकिस्तान की अपनी 10-20 फीसद शिया आबादी को ध्यान में रखकर बनाई गई थी. अब पाकिस्तान खुलकर एक सुन्नी सुरक्षा ढांचे के साथ खड़ा हो गया है. यह एक घरेलू जुआ भी है, जो बलूचिस्तान में अशांति, उत्तर-पश्चिम में तनाव और इमरान खान की लगातार जेल में मौजूदगी को लेकर बढ़ते असंतोष के बीच खेला जा रहा है. मुनीर को इससे अपनी राजनीतिक ज़मीन मजबूत करने के अलावा जो सबसे बड़ा फायदा मिलता है, वह है तुर्किए और चीन की सैन्य तकनीक तक पहुंच और सऊदी पैसे से अपनी सेना का आधुनिकीकरण यानी वही ताकत, जिसकी कमी पिछले साल भारत के साथ युद्ध के दौरान पाकिस्तान को साफ़ महसूस हुई थी.
ईरान की प्रतिक्रिया हैरानी की बात यह है कि उसने इस समझौते को गंभीरता से लेने से साफ़ इनकार कर दिया है, बल्कि इसका मज़ाक भी बनाया है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि मुस्लिम देशों को 'बुरे इरादों वाले बाहरी लोगों' पर निर्भर रहने के बजाय आत्मनिर्भर बनना चाहिए, जबकि सांसद इब्राहिम रज़ई ने इस समझौते को महज़ एक 'कागज़ी समझौता' कहकर खारिज कर दिया, जो सऊदी अरब को असली सुरक्षा नहीं दे सकता. ईरान की गहरी सोच, जिसे कई विश्लेषक भी दोहरा रहे हैं, यह है कि यह समझौता अमेरिकी गारंटी पर घटते भरोसे और क्षेत्रीय ताकतों के अपने स्तर पर सुरक्षा-व्यवस्था बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. यह एक ऐसी बात है, जिससे ईरान को डरने की बजाय शायद फायदा भी मिल सकता है.

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में कहा गया है कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा. समझौते की यह भाषा नाटो के मशहूर अनुच्छेद-5 से मिलती-जुलती है.
भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती है यह समझौता
भारत के लिए इस समझौते की सबसे बड़ी अहमियत उसके अभी तक अनआज़माए 'अनुच्छेद-5' जैसे प्रावधान में नहीं है, बल्कि इस बात में है कि यह पाकिस्तान के इर्द-गिर्द के पूरे ढांचे को कैसे बदल रहा है. भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि सऊदी अरब अब पाकिस्तान-तुर्किए-चीन के गठजोड़ के और करीब जा रहा है, जबकि तुर्किए का भारत के प्रति ऐतिहासिक रुख हमेशा से टकराव भरा रहा है. पिछले साल 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान उसने पाकिस्तान को खुलकर सैन्य सहयोग दिया था.वहीं दूसरी ओर, सऊदी अरब ने खुद पिछले एक दशक में भारत के साथ भी गहरे रणनीतिक रिश्ते बनाए हैं. वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों का व्यापार करीब 42 अरब डॉलर तक पहुंच गया.दोनों देशों का रक्षा, ऊर्जा और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग भी बढ़ा है. अब भारत के रणनीतिकारों को यह देखना होगा कि सऊदी अरब की सुरक्षा-सोच में पाकिस्तान को मिली नई ताकत कहीं भारत के साथ बने इस निवेश को कमजोर तो नहीं कर देगी.
भारत के लिए इस समझौते में मौके और खतरे दोनों साथ-साथ मौजूद हैं. एक तरफ यह कोई 'सुन्नी नाटो' नहीं है, तुर्किए, सऊदी अरब और पाकिस्तान के दुश्मन एक जैसे ज़रूर हैं, लेकिन पूरी तरह एक नहीं हैं और इन तीनों देशों का एक-दूसरे के लिए वाकई लड़ने का इतिहास बहुत कमजोर रहा है. दूसरी तरफ, यह समझौता रावलपिंडी को लंबी सप्लाई चेन, गहरी जेब और ऐसी तकनीक देता है, जो आने वाले सालों में पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को और तेज़ कर सकती है. ऐसे भारत को अपनी रक्षा योजना बनाते समय इस बात को अभी से ध्यान में रखना होगा.
पाकिस्तान के लिए अब कैसी होनी चाहिए भारत की रणनीति
भारत की रणनीति अब तीन दिशाओं में आगे बढ़नी चाहिए. पहला, भारत को सऊदी अरब के साथ अपने रिश्तों को सिर्फ बनाए रखना नहीं, बल्कि और गहरा करना होगा. रक्षा सहयोग समिति की गतिविधियां तेज़ करके और ऊर्जा-निवेश की ऐसी प्रतिबद्धताएं हासिल करके, जिससे सऊदी अरब के पास पाकिस्तान की तरफ पूरी तरह झुकने से बचने की वजह बनी रहे. दूसरा, भारत को खाड़ी में अपने रिश्तों का दायरा जानबूझकर बढ़ाना चाहिए- यूएई, कतर और ओमान के साथ. भारत को ओमान के दुक़्म बंदरगाह पर अपनी नौसैनिक मौजूदगी को मजबूत करना चाहिए ताकि कोई एक देश अपने गठबंधन के फैसलों से भारत को क्षेत्रीय रूप से अलग-थलग न कर सके. तीसरा और सबसे ज़रूरी, भारत के रक्षा योजनाकारों को अब एक ऐसे पाकिस्तान के लिए तैयार रहना होगा, जिसके पास बेहतर सप्लाई और लंबे समय तक टिकने की क्षमता होगी. अब हथियारों के भंडार, स्वदेशी उत्पादन की समय-सीमा और कूटनीतिक संवाद को फिर से परखने की ज़रूरत है ताकि सीमा पार से होने वाली किसी भी हरकत का जवाब देने पर उसे गलती से इस अस्पष्ट 'रक्षा-प्रावधान' को भड़काने वाला कदम न मान लिया जाए. इस पूरे इलाके में जब कागज़ी समझौते भी असली हिसाब-किताब बदल रहे हैं, तो भारत के लिए बहु-आयामी संतुलन साधना ही सबसे समझदारी भरा रास्ता है, महज़ शांत बैठे रहना नहीं.
(डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)