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सीमा विवाद को हवा क्यों दे रहे हैं नेपाली प्रधानमंत्री बालेन शाह, भारत-नेपाल के बीच कहां खड़ा है चीन

डॉ नीरज कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 02, 2026 12:19 pm IST
    • Published On जून 02, 2026 12:18 pm IST
    • Last Updated On जून 02, 2026 12:19 pm IST
सीमा विवाद को हवा क्यों दे रहे हैं नेपाली प्रधानमंत्री बालेन शाह, भारत-नेपाल के बीच कहां खड़ा है चीन

नेपाली प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (बालेन शाह) ने नेपाल की संसद में भारत-नेपाल सीमा विवाद पर एक विवादित बयान दिया है. उनके इस बयान ने दक्षिण एशियाई कूटनीति में एक नई बहस छेड़ दी है. भ्रष्टाचार विरोधी छवि और युवा आक्रोश के दम पर सत्ता में आए बालेन शाह के बयानों को हमेशा से बहुत बारीकी से देखा जाता रहा है. ऐसे में संसद के भीतर सीमा विवाद पर दिया गया उनका ताजा बयान भारत-नेपाल के सदियों पुराने 'रोटी-बेटी के संबंधों' की दिशा और इसमें चीनी कारक की भूमिका को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े करता है.

नेपाल के प्रधानमंत्री ने कहा क्या है

संसद में अपने पहले भाषण में बालेन शाह ने रविवार को भारत-नेपाल सीमा विवाद को एक नया मोड़ दे दिया. उन्होंने कहा कि भारत-नेपाल सीमा पर ज़मीन पर कब्ज़े का मामला एकतरफ़ा नहीं है. उन्होंने कहा कि दोनों देश एक-दूसरे की ज़मीन पर कब्ज़ा किए हुए हैं. उन्होंने कहा कि भारत-नेपाल के सीमा विवाद में चीन और ब्रिटेन को भी शामिल किया जाना चाहिए. संसद में पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए शाह ने कहा,''प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे पता चला कि न केवल भारत ने नेपाल की ज़मीन पर कब्ज़ा किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगह भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा किया है.'' उन्होंने कहा कि नेपाल ने चीन और यूनाइटेड किंगडम के साथ भी यह मुद्दा उठाया है. शाह ने कहा,"हमने न केवल भारत और चीन से बात की है, बल्कि यूके सरकार से भी बात की है." उन्होंने कहा,"हमारा मानना है कि यूके को भी इसमें दिलचस्पी लेनी चाहिए, क्योंकि यह मुद्दा उस समय का है जब ब्रिटिश भारत ने इस क्षेत्र को छोड़ा था." नेपाली प्रधानमंत्री की ये टिप्पणियां कालापानी-लिम्पियाधुरा-लिपुलेख क्षेत्र पर विवाद की चर्चा के दौरान की गईं. यह क्षेत्र भारत, नेपाल और तिब्बत के त्रि-जंक्शन के पास स्थित एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाका है. 

भारत का कहना है कि यह क्षेत्र उत्तरी भारतीय राज्य उत्तराखंड का हिस्सा है. भारत नेपाल के दावों को लगातार खारिज करता रहा है.नेपाल लिपुलेख क्षेत्र पर अपना दावा 1816 की सुगौली संधि की अपनी व्याख्या पर आधारित करता है.यह संधि  ब्रिटिश भारत के साथ हस्ताक्षरित हुई थी. शाह ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि उनके अनुसार नेपाल ने भारत के किन हिस्सों पर अतिक्रमण किया है. हालांकि, उन्होंने कहा कि दोनों सरकारें राजनयिक बातचीत के माध्यम से इस मामले को सुलझाने पर सहमत हो गई हैं.

नेपाल का डैमेज कंट्रोल 

बालेन शाह के इस बयान पर नेपाल की नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी जैसी मुख्य विपक्षी पार्टियों ने तीखी आपत्ति जताई है. विपक्ष ने प्रधानमंत्री के इस बयान को 'राष्ट्रहित के खिलाफ' बताया है. इन पार्टियों ने संसद के रिकॉर्ड से प्रधानमंत्री के बयान को हटाने की मांग की है.विवाद बढ़ता देख नेपाल के विदेश मंत्रालय को तुरंत 'डैमेज कंट्रोल' मोड में आना पड़ा. विदेश मंत्रालय ने सफाई दी है कि प्रधानमंत्री के बयान का मतलब किसी औपचारिक क्षेत्रीय दावे से नहीं था, बल्कि वे दोनों देशों की सीमा पर स्थित 'नो-मैन-लैंड' (दशगजा क्षेत्र) और वहां गायब हुए सीमा स्तंभों (Boundary Pillars) के कारण स्थानीय स्तर पर दोनों तरफ के नागरिकों द्वारा अनजाने में किए गए 'क्रॉस-बॉर्डर कब्जों' का जिक्र कर रहे थे.

बालेन शाह के इस रुख का भारत-नेपाल संबंधों पर दूरगामी और बहुआयामी प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि पूर्व कम्युनिस्ट प्रधानमंत्रियों के विपरीत बालेन शाह ने दोनों पक्षों की कमियों को स्वीकार करने का संकेत दिया है. उन्होंने कहा है कि दोनों देशों को इतिहासकारों, सर्वेक्षणकर्ताओं और विशेषज्ञों की मदद से मिल-बैठकर इस मुद्दे को सुलझाया जाना चाहिए. यदि भारत इसे एक व्यावहारिक अवसर के रूप में देखता है, तो तकनीकी स्तर पर सीमा विवाद सुलझाने के रास्ते खुल सकते हैं. जबकि दूसरी तरफ बालेन शाह नेपाल के युवा और उग्र राष्ट्रवादी वोट बैंक का प्रतिनिधित्व करते हैं. घरेलू स्तर पर उन पर इस बयान को लेकर जो दबाव बना है, उसके कारण भविष्य में वे भारत के सामने अपनी छवि को कमज़ोर नहीं होने देना चाहेंगे. कूटनीतिक गलियारों में उन्होंने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वे केवल 'फोटो खिंचवाने'के लिए भारत के दौरे पर नहीं जाएंगे. उन्हें विमानन रूट और सीमा जैसे मुद्दों पर ठोस परिणाम चाहिए. हालांकि, शाह ने संसद में यह भी साझा किया कि नेपाल सरकार ने इस मुद्दे पर भारत को कूटनीतिक नोट भेजा था, जिसका भारत ने जवाब दिया है.दोनों पक्ष राजनयिक माध्यम से बातचीत के लिए सहमत हैं. यह दिखाता है कि तनाव के बावजूद संवाद का रास्ता खुला हुआ है.

भारत और नेपाल के बीच चीन का पक्ष

भारत-नेपाल सीमा विवाद, विशेषकर लिपुलेख दर्रे को लेकर चीन का रुख बेहद रणनीतिक और संतुलित रहा है. लिपुलेख वास्तव में भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) का एक त्रि-जंक्शन है. चीन का आधिकारिक रुख हमेशा से यही रहा है कि कालापानी और लिपुलेख का सीमा विवाद भारत और नेपाल के बीच का एक द्विपक्षीय मुद्दा है. चीन इसमें सीधे तौर पर मध्यस्थ या पक्षकार बनने से बचता रहा है. वह दोनों देशों को आपसी बातचीत से इसे सुलझाने की सलाह देता है.इसलिए, नेपाल के कड़े विरोध के बावजूद, भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे के जरिए आपसी सीमा व्यापार को फिर से बहाल करने पर सहमति जताई है. चीन इस मार्ग का उपयोग तिब्बत के साथ व्यापार और कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए करना चाहता है. यह दर्शाता है कि वह नेपाल की आपत्तियों के कारण भारत के साथ अपने आर्थिक और धार्मिक संपर्क को रोकने के मूड में नहीं है. लेकिन, कूटनीतिक स्तर पर चीन नेपाल को यह कहकर सांत्वना देता आया है कि वह नेपाल के संप्रभु दावों का सम्मान करता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वह भारत के साथ इस मार्ग पर बुनियादी ढांचे के विकास और तीर्थयात्रा के समझौतों को आगे बढ़ा रहा है. बालेन शाह ने संसद में यह भी बताया कि नेपाल ने इस सीमा विवाद के ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर न केवल भारत और चीन, बल्कि ब्रिटिश सरकार को भी पत्र लिखा है. चीन इस त्रिपक्षीय उलझन में सीधे कूदने के बजाय 'वेट एंड वॉच'की नीति अपना रहा है.

ऐसे में यह कहा जा सकता है कि बालेन शाह की दोनों तरफ से अतिक्रमण वाली टिप्पणी ने भारत-नेपाल सीमा विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है. जहां इसने नेपाल की घरेलू राजनीति में भूचाल ला दिया, वहीं इसने भारत के साथ एक कूटनीतिक और तकनीकी संवाद की जमीन भी तैयार की है. भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह बालेन शाह के इस व्यावहारिक और थोड़े अपरंपरागत रुख को भांपते हुए, चीन को इस क्षेत्र में रणनीतिक बढ़त लेने से रोके. दोनों देशों के बीच 97 फीसदी सीमा पहले ही तय हो चुकी है, बची हुई तीन फीसद सीमा (कालापानी और सुस्ता) को भी यदि इतिहास और भूगोल के विशेषज्ञों की टेबल पर छोड़ दिया जाए, तो सदियों पुराने भारत-नेपाल संबंधों को एक नई और परिपक्व ऊंचाई मिल सकती है.

(डिस्क्लेमर: डॉ नीरज कुमार बिहार के वैशाली स्थित डॉक्टर सीवी रमन विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं. लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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