भारत में मां के शब्द किसी बच्चे के लिए पहला संविधान होते हैं.शपथ एक पल में ली जाती है, लेकिन मां को दिया गया वचन जीवनभर निभाया जाता है. इसके लिए मजबूत चरित्र की जरूरत होती है.
गुजरात में 2001 में आए भूकंप ने भुज को तबाह कर दिया था. पूरा गुजरात मलबे में तब्दील हो चुका था. ऐसे में कर्तव्य ने एक कार्यकर्ता को पुकारा. पदभार संभालने से पहले वे अपनी मां के पास गए. उनकी मां उनके काम के बारे में ज्यादा नहीं जानती थीं, उन्होंने अपने बेटे से केवल दो ही चीजें मांगी थीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद अपनी मां के उन शब्दों को साझा किया है-''पहला, तुम हमेशा गरीबों के लिए काम करोगे और दूसरा, तुम कभी रिश्वत नहीं लोगे.''
उन्होंने सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. इस साल सात अक्टूबर को वे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जैसे उच्च पदों पर रहते हुए सार्वजनिक सेवा के लगातार 25 साल पूरे कर लेंगे. भारत के प्रति उनकी समर्पित सेवा छह दशकों से भी अधिक समय की है. उनके जन्मदिन यानी 17 सितंबर को देश इस अवसर को उसी रूप में मनाता है जैसा वे चाहते हैं, 'सेवा पर्व' के रूप में. मील के पत्थरों को सालों में गिना जाता है, लेकिन नेतृत्व को विश्वास (भरोसे) से मापा जाता है. आइए, एक-एक करके उनके वचनों के रिकॉर्ड को देखते हैं.
पहला वचन: गरीबों के लिए काम करना
शुरुआत वहीं से करते हैं, जहां से उन्होंने की थी गरीबों से. पिछले एक दशक में करीब 25 करोड़ भारतीय गरीबी से बाहर आए हैं. इसकी पुष्टि दुनिया के बड़े संस्थानों ने भी की है. मोदी सरकार में हर बड़ी सरकारी योजना आम भारतीयों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए बनाई गई.
जनधन, आधार और मोबाइल की त्रिमूर्ति. यह दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर है, जिसने सबसे गरीब व्यक्ति के हाथ में बैंक खाता पहुंचाया. आज जन धन खातों की संख्या 59 करोड़ है. आज करीब 16 करोड़ ग्रामीण घरों में नल से पानी आ रहा है. 80 करोड़ से अधिक भारतीयों को मुफ्त अनाज मिल रहा है. करोड़ों लोगों को पांच लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा (आयुष्मान भारत), स्वच्छ ईंधन (उज्ज्वला योजना) और अपना घर मिला है.
जिस नागरिक को ये सुविधाएं मिली हैं, उसके लिए ये केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि डर और सम्मान के बीच का अंतर हैं. उन्होंने कभी गरीबों को केवल एक 'वोट बैंक' नहीं माना, बल्कि उन्हें 'कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति' के रूप में देखा, जिसमें आगे बढ़ने की असीम क्षमता है. आज परिणाम सामने है, जो कभी केवल योजनाओं के लाभार्थी थे, वे आज देश की प्रगति में अपना योगदान दे रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर ओडिशा के पुरी में समुद्र किनारे रेत से कृति बनाता एक कलाकार.
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दूसरा वचन: ईमानदारी
दूसरा वादा राजनीति में कम देखने को मिलता है. इसे आसानी से परखा भी जा सकता है. साल 2024 में वाराणसी से चुनाव लड़ते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी हलफनामे में अपनी अचल संपत्ति शून्य बताई थी यानी उनके नाम पर कोई घर या जमीन नहीं बताई गई थी. साल 2014 में गांधीनगर छोड़ते समय उन्होंने अपनी बचत के 21 लाख रुपये गुजरात सरकार के कर्मचारियों की बेटियों की शिक्षा के लिए दे दिए थे. मुख्यमंत्री रहते मिले उपहारों की नीलामी से जुटाई गई करीब 89.96 करोड़ रुपये की राशि भी लड़कियों की शिक्षा के लिए दी गई. समय-समय पर प्रधानमंत्री ने अपने वेतन से हुई बचत को भी सामाजिक कार्यों के लिए दिया है.
चुनाव के समय दिया जाने वाला हलफनामा किसी भी नेता के सार्वजनिक जीवन का सबसे कड़ा दस्तावेज होता है. सत्ता में 25 से अधिक साल रहने के बाद भी उनका हलफनामा किसी संत के जीवन जैसा दिखता है. उन्होंने सिस्टम में भी इसी ईमानदारी को लागू किया. भारत आज भी उस दौर को याद करता है, जब देश 2G, कोयला और कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे घोटालों से घिरा हुआ था, एक ऐसा दौर जो भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और नीतियों के ठप होने का प्रतीक बन गया था.
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कभी दुख जताते हुए कहा था कि दिल्ली से भेजे गए एक रुपये में से केवल 15 पैसे ही गरीबों तक पहुंचते हैं. लेकिन आज 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' के जरिए पूरा का पूरा रुपया सीधे हकदार के बैंक खाते में पहुंचता है.विरोधियों ने उन पर कई आरोप लगाए, यहां तक कि अदालतों में भी घसीटा, लेकिन आखिरकार उन्हें बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी. हाथ साफ रखना उनकी मां की शर्त थी. उन्होंने इसका पूरी निष्ठा से पालन किया है.
भारतीयों के लिए भारतीयों द्वारा बनाए कानून
देश से 1,500 से अधिक पुराने और बेकार कानूनों को खत्म कर दिया गया है. आम नागरिकों और व्यापारियों के लिए करीब 40,000 गैर-जरूरी नियमों (Compliances) को हटा दिया गया है. इससे जीवन और व्यापार आसान हुआ है. औपनिवेशिक शासकों द्वारा लोगों पर राज करने के लिए बनाए गए पुराने आपराधिक कानूनों की जगह अब 'भारतीयों द्वारा भारतीयों के लिए' नए कानून (भारतीय न्याय संहिता आदि) लाए गए हैं.
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), जिसे एक पीढ़ी तक असंभव माना जाता था, उसने पूरे भारत को एक बाजार बना दिया. अनुच्छेद 370 इतिहास का हिस्सा बन गया, जिसे खत्म करने को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने भी सही ठहराया.अयोध्या का सबसे पुराना विवाद शांति से सुलझ गया और रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हुए. जो सरकार कभी नागरिकों के रास्ते में बाधा बनती थी, उसने अब सेवा की भूमिका अपना ली है.
'सेवा' उनके लिए केवल एक नारा नहीं, बल्कि जीने का तरीका है. पद संभालने से पहले करीब तीन दशकों तक उन्होंने एक प्रचारक के रूप में काम किया. आपातकाल के दौरान उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए भेष बदलकर भूमिगत रहकर काम किया. इसके बाद वे ऐसे मुख्यमंत्री बने जिन्होंने भूकंप के बाद कच्छ और पूरे गुजरात को दोबारा खड़ा किया. ऐसे प्रधानमंत्री बने जिन्होंने संसद की सीढ़ियों पर सिर झुकाकर प्रवेश किया और हमेशा खुद को 'प्रधान सेवक' माना.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन मनाते लोग.
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उनके कार्यकाल में 'राजपथ' का नाम बदलकर 'कर्तव्य पथ' किया गया, और उनका कार्यालय ब्रिटिश काल के साउथ ब्लॉक से निकलकर 'सेवा तीर्थ' नामक पते पर आ गया. जब कोई व्यक्ति छह दशकों तक सेवा का जीवन जीता है, तो उसके आसपास की इमारतें भी उस सेवा भाव को अपना लेती हैं.
25 साल में मिले छह जनादेश
लोकतंत्र वह अदालत है, जिसके फैसले के खिलाफ कोई भी जन नेता अपील नहीं कर सकता. वे छह बार जनता के सामने अपनी पार्टी का चेहरा बनकर खड़े हुए. गुजरात में 2002, 2007 और 2012 में और पूरे देश में 2014, 2019 और 2024 में. जनता ने उन्हें कभी निराश नहीं किया.
इस साल मार्च में वे भारत के इतिहास में किसी निर्वाचित सरकार के सबसे लंबे समय तक रहने वाले प्रमुख बने और जून में लगातार सेवा करने वाले सबसे लंबे समय के प्रधानमंत्री बने. इस लंबे समय तक टिके रहने वाले भरोसे को केवल किस्मत नहीं कहा जा सकता, इसे हर चुनाव में कड़ी मेहनत से कमाया गया है.
अर्थव्यवस्था की सबसे तेज उड़ान
साल 2014 में भारत दुनिया की 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था. इसके बाद भारत ने एक बड़ी छलांग लगाई. वैश्विक स्तर पर तेल के संकट और अन्य चुनौतियों के बावजूद, पिछली तिमाही में भारत ने 7.8 फीसद की दर से विकास किया, जो दुनिया की किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था में सबसे तेज है. 2014 से अब तक भारत का उत्पादन करीब 90 फीसद बढ़ा है, जबकि दुनिया का औसत केवल 35 फीसद रहा है यानी भारत की रफ्तार दुनिया से करीब तीन गुना तेज है.
आज भारत के आर्थिक आधार बेहद मजबूत हैं. विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर पर है और महंगाई नियंत्रण में है. यह दो लाख से अधिक स्टार्टअप्स का देश बन चुका है, जिनमें से एक-तिहाई की कमान महिलाओं के हाथ में है. कतार में खड़ा आखिरी व्यक्ति भी अब इस विकास यात्रा का हिस्सा है. भारत जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है.
मजबूत विदेश नीति का दौर
उड़ी हमले का जवाब सर्जिकल स्ट्राइक से और पुलवामा का जवाब बालाकोट एयरस्ट्राइक से दिया गया. यह एक ऐसे मजबूत देश की पहचान है, जिसने अब गिड़गिड़ाना बंद कर और कड़े फैसले लेना शुरू किया है. साल 2014 तक जो नक्सली हिंसा देश के 126 जिलों में फैली थी, वह अब सिमटकर केवल दो जिलों में रह गई है. हाल ही में भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स देशों ने नई दिल्ली घोषणापत्र को अपनाया. दुनिया के तीन दर्जन से अधिक देशों ने पीएम मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा है. वे हमेशा कहते हैं कि यह सम्मान उनका नहीं बल्कि भारत के 140 करोड़ लोगों का है. अब दुनिया की महाशक्तियां यह नहीं पूछतीं कि भारत को क्या मंजूर है, बल्कि यह पूछती हैं कि भारत का इस पर क्या प्रस्ताव है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय विदेश नीति और मजबूत हुई है, अब हर बड़े मौके पर दुनिया भारत की बात को बड़े ध्यान से सुनती है.
बिना छुट्टी लिए निरंतर देश सेवा
यह सब आसानी से नहीं मिला. उन्होंने किशोरावस्था में ही घर छोड़ दिया था. भारत की मिट्टी और यहां के लोगों को करीब से समझने के लिए उन्होंने सालों तक देश का भ्रमण किया. प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद से उन्होंने एक भी दिन की छुट्टी नहीं ली है. इसका सबसे बड़ा और भावुक उदाहरण 30 दिसंबर 2022 को देखने को मिला, जब सुबह उन्होंने अपनी पूज्य माताजी के पार्थिव शरीर को कंधा दिया और उसके कुछ ही घंटों बाद वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पश्चिम बंगाल की 'वंदे भारत एक्सप्रेस' को हरी झंडी दिखाने के लिए जुड़ गए. उन्होंने मौके पर न आ पाने के लिए क्षमा भी मांगी. अपनी मां को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने मां के उन शब्दों को याद किया था- 'काम करो बुद्धि से और जीवन जियो शुद्धि से.'
जनता को दिया तीसरा वचन- विकसित भारत
एक मां ने अपने बेटे से दो वचन मांगे थे- गरीबों का कल्याण और ईमानदारी का जीवन. उनके बेटे ने हर पद और हर चुनाव के दौरान इन दोनों वचनों को पूरी निष्ठा से निभाया. देश के 140 करोड़ लोग हर दिन इसके साक्षी बने. वे इसके लाभार्थी हैं. इन्हीं दो वचनों की मजबूत नींव पर अब उनका तीसरा वचन टिका है, जो उन्होंने हर भारतीय से किया है- विकसित भारत का निर्माण. इसकी बहुत गहरी और मजबूत नींव रखी जा चुकी है. इस काम के लिए उनकी ऊर्जा अद्भुत है. एक बेटा जिसने अपनी मां को दिया कोई वादा नहीं तोड़ा, वह देश से किया यह वादा भी कभी नहीं तोड़ेगा. वे भारत को इस शिखर तक जरूर ले जाएंगे.
उनके जन्मदिन पर उनके किसी भी प्रशंसक के लिए इससे सच्ची श्रद्धांजलि और कोई नहीं हो सकती कि उनका खुद का सेवा रिकॉर्ड ही गवाही दे रहा है, 'भारत को समर्पित जीवन में किया हर वादा पूरा किया.'
(डिस्क्लेमर: लेखक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)