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युद्ध तक कैसे आ पहुंचे अमेरिका-इजरायल और ईरान, कितना बड़ा है भारत का हित

Dr Amar Singh
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 05, 2026 13:45 pm IST
    • Published On मार्च 05, 2026 13:45 pm IST
    • Last Updated On मार्च 05, 2026 13:45 pm IST
युद्ध तक कैसे आ पहुंचे अमेरिका-इजरायल और ईरान, कितना बड़ा है भारत का हित

अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ एक व्यापक और समन्वित सैन्य हमला शुरू किया. इसे हाल के दशकों में मध्य-पूर्व के सबसे गंभीर टकरावों में गिना जा रहा है. आधिकारिक रूप से इसे पूर्व-निवारक हमला (Pre-Emptive Strike) बताया गया. अमेरिका ने इसे 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' और इजरायल ने 'ऑपरेशन रोअरिंग लायन' नाम दिया है. अभियान के दौरान ईरान के सैन्य ढांचे, नेतृत्व प्रतिष्ठानों, परमाणु सुविधाओं (नतांज) और उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों को निशाना बनाया गया. यह कार्रवाई आधुनिक बहु-आयामी युद्ध का उदाहरण है. इसमें वायु शक्ति, साइबर क्षमता, अंतरिक्ष आधारित निगरानी और मनोवैज्ञानिक दबाव का संयोजन देखा जा रहा है. अमेरिका और इजरायल ने इसे ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और उसके क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क से पैदा हुए 'अस्तित्वगत खतरे' के खिलाफ  जरूरी कदम बताया है. वहीं दूसरी ओर तेहरान ने इन हमलों को बिना उकसावे की आक्रामकता और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करार दिया है.

युद्ध की पृष्ठभूमि और रणनीतिक संदर्भ

ईरान–पश्चिम टकराव को समझने के लिए 20वीं सदी की घटनाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. 1921 में रज़ा खान के तख्तापलट के बाद 1925 में रज़ा शाह पहलवी ने सत्ता संभाली. उन्होंने केंद्रीकरण और आधुनिकीकरण की नीति अपनाई. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1941 में ब्रिटेन और सोवियत संघ के दबाव में उन्हें पद छोड़ना पड़ा. उनके बेटे मोहम्मद रज़ा पहलवी शाह बने. 1948 के अरब–इजरायल युद्ध के बाद इजरायल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन ने 'परिधि सिद्धांत' अपनाया. इसके तहत ईरान जैसे गैर-अरब देशों से संबंध मजबूत किए गए.उस समय ईरान ने इजरायल को तेल दिया और दोनों के बीच खुफिया व सैन्य सहयोग रहा. शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी ने पश्चिम समर्थित आधुनिकीकरण और 'श्वेत क्रांति' कार्यक्रम चलाया.इससे आर्थिक विकास तो हुआ, लेकिन पारंपरिक और धार्मिक वर्गों में असंतोष भी बढ़ा.साल 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई. इसके बाद ईरान ने अमेरिका-विरोधी नीति अपनाई. साल 1980–88 के ईरान-इराक युद्ध, उसके बाद प्रतिबंधों की लंबी श्रृंखला और परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद ने तनाव को स्थायी रूप दे दिया. ईरान का परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल विकास और क्षेत्रीय आतंकवादी समूहों को समर्थन (Hezbollah (लेबनान), Hamas (गाज़ा) और यमन के हूती विद्रोहियों) ने मामले को और गंभीर बना दिया. साल 2015 का परमाणु समझौता (JCPOA) कुछ समय के लिए तनाव कम करने का प्रयास था.लेकिन 2018 में अमेरिका के इससे बाहर निकलने के बाद स्थिति फिर बिगड़ गई. इस प्रकार वर्तमान संघर्ष दशकों पुराने अविश्वास, शक्ति-राजनीति और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा की ऐतिहासिक निरंतरता का परिणाम है.

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ईरान के नेतृत्व पर प्रभाव 

अमेरिकी और इजरायली हवाई तथा मिसाइल हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की मृत्यु के साथ कई उच्च पदस्थ सैन्य और सुरक्षा अधिकारियों, जिनमें इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के वरिष्ठ कमांडर भी शामिल हैं मारे गए हैं. इससे नेतृत्व ढांचे में बड़ा खालीपन उत्पन्न हुआ है. ख़ामेनेई की मृत्यु के बाद एक अंतरिम नेतृत्व परिषद का गठन हुआ है. इसमें वर्तमान राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन, न्यायिक प्रमुख घोलाम हुसैन मोहसेनी एजई और वरिष्ठ मौलवी अलिरेज़ा आरफी शामिल हैं. यह परिषद अस्थायी रूप से देश का नेतृत्व कर रही है, जब तक कि नया सर्वोच्च नेता नहीं चुना जाता. हालांकि यह परिवर्तन देश की शासन प्रणाली को जारी रखने का प्रयास है, कई विशेषज्ञ मानते हैं कि नेतृत्व शून्यता और आंतरिक सत्ता संघर्ष जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं. ईरानी समाज की प्रतिक्रिया भी एकरूप नहीं है. देश दो दबावों के बीच फंसा है अंदर से दमनकारी और अक्षम शासन और बाहर से विदेशी हस्तक्षेप का खतरा. लोग सुधार की उम्मीद लगभग छोड़ चुके हैं, क्योंकि प्रयास बार-बार विफल हुए हैं. इसके बाद भी वे शासन के पतन से आशंकित हैं, क्योंकि इराक, लीबिया, सीरिया और अफगानिस्तान में पश्चिमी हस्तक्षेप के बाद अराजकता व अस्थिरता देखी गई है. इसलिए अनेक ईरानी न तो वर्तमान शासन पर भरोसा करते हैं और न ही बाहरी शक्तियों पर.

युद्ध में ईरान की रणनीति क्या है 

यह संघर्ष पारंपरिक द्विपक्षीय टकराव से आगे बढ़कर बहु-आयामी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में बदल चुका है. 

धैर्य बनाम त्वरित निर्णायकता: अली लारीजानी ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी हैं. वो युद्ध को 'एंड्यूरेंस कॉन्टेस्ट' के रूप में पेश कर रहे हैं. संदेश यह है कि समय ईरान के पक्ष में काम कर सकता है, क्योंकि लंबा संघर्ष अमेरिका और इजरायल की सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक लागत बढ़ाएगा.

क्षरण आधारित मिसाइल रणनीति : ईरान कथित तौर पर चरणबद्ध हमले कर रहा है, पहले रडार और एयर-डिफेंस सेंसर, फिर कम-लागत ड्रोन/मिसाइलों से विरोधियों के इंटरसेप्टर के भंडार को कम करना और बाद में उन्नत हथियारों का उपयोग. इसका लक्ष्य तत्काल भारी विनाश नहीं, बल्कि धीरे-धीरे प्रतिद्वंद्वी की रक्षा क्षमता को कम करना है.

मनोवैज्ञानिक युद्ध: इजरायल के शहरों और अमेरिका के सहयोगी देशों (कतर, कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, इराक और जॉर्डन) के महत्वपूर्ण स्थलों और वहां स्थित अमेरिकी ठिकानों पर निरंतर मिसाइलें दागने का उद्देश्य केवल सैन्य दबाव नहीं, बल्कि लंबे समय तक आर्थिक हानि और शेल्टर-स्थिति बनाकर सामाजिक थकान पैदा करना भी है. 

इस युद्ध में अमेरिका और इजरायल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई शहीद हो गए थे.

इस युद्ध में अमेरिका और इजरायल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई शहीद हो गए थे.

ऊर्जा और समुद्री आयाम: ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य में सख्ती का संकेत वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति (वैश्विक तेल का लगभग 20 फीसदी) को रणनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करने की ओर इशारा करता है. 

विकेंद्रीकृत मोज़ैक रक्षा सिद्धांत: यह ईरान की वह सैन्य रणनीति है, जिसके तहत देश को 31 प्रांतीय सैन्य इकाइयों में विभाजित किया गया है. जहां प्रत्येक कमांडर को ड्रोन, मिसाइल और स्थानीय बलों पर अपेक्षाकृत स्वायत्त अधिकार प्राप्त है. यह संरचना 'डिकैपिटेशन स्ट्राइक' को निष्प्रभावी करने के लिए बनाई गई है, ताकि केंद्रीय संचार बाधित होने पर भी संचालन जारी रह सके. इसी संदर्भ में राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन द्वारा आपात शक्तियों का विस्तार शासन-निरंतरता सुनिश्चित करने के साथ ही, असहमति पर कड़ी चेतावनी आंतरिक स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने और संभावित आंतरिक अस्थिरता को रोकने की रणनीति का संकेत देती है.

यह युद्ध अब सैन्य, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और क्षेत्रीय स्तरों पर एक साथ चल रहा है. निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या यह बहु-स्तरीय दबाव अमेरिका और इजरायल के फायर पावर के सामने मोर्चा ले पाएगा.

युद्ध में अब आगे की संभावनाएं क्या हैं

अमेरिका का दावा है कि ईरान के विरुद्ध चल रहा युद्ध परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल प्रसार और राज्य-प्रायोजित आतंकवाद की रोकथाम के उद्देश्य से चल रहा है. अमेरिका का तर्क है कि ईरान की 60 फीसदी तक संवर्धित यूरेनियम क्षमता, जिसे 90 फीसदी (हथियार-ग्रेड) तक तेज़ी से बढ़ाया जा सकता है, एक गंभीर परमाणु ख़तरा है. उसके क्षेत्रीय नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा हैं. लेकिन इसे केवल सुरक्षा के नजरिए से देखना अधूरा होगा. इस संघर्ष के पीछे व्यापक भू-राजनीतिक गणनाएं भी हैं, इनमें पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन की फिर से रचना, ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना और रणनीतिक समुद्री मार्गों पर प्रभाव बनाए रखना शामिल है. विशेष रूप से Strait of Hormuz पर. 

डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि यह संघर्ष चार-पांच हफ्ते के भीतर निर्णायक मोड़ ले सकता है. उनका विश्वास है कि तीव्र हवाई और मिसाइल हमलों के माध्यम से सैन्य दबाव बढ़ाकर ईरान में सत्ता परिवर्तन जैसे लक्ष्य अपेक्षाकृत जल्द प्राप्त किए जा सकते हैं. इसलिए अमेरिका ईरान की मज़बूत भूमिगत मिसाइल सुविधाओं और सैन्य संरचनाओं को नष्ट करने का प्रयास कर रहा है. हालांकि, इतिहास में इस बात के कई उदाहरण हैं कि केवल हवाई हमलों से स्थायी राजनीतिक परिवर्तन कर पाना कठिन है. इसके लिए जमीन पर मौजूदगी और दीर्घकालिक सैन्य प्रतिबद्धता की जरूरत होगी. जिसकी मानवीय और राजनीतिक लागत बहुत अधिक हो सकती है. यदि ईरान रणनीतिक रूप से संघर्ष को लंबा खींचने में सफल रहता है, तो इसके दूरगामी परिणाम सामने आ सकते हैं. लंबा युद्ध क्षेत्रीय अस्थिरता, प्रॉक्सी मोर्चों के विस्तार और वैश्विक शक्ति-संतुलन में बदलाव को जन्म दे सकता है.

अमेरिकी युद्धपोत अब्राह्म लिंकन पर तैनात लड़ाकू हवाई जहाज.

अमेरिकी युद्धपोत अब्राह्म लिंकन पर तैनात लड़ाकू हवाई जहाज.

भारत का हित और उसकी स्ट्रैटेजी क्या है

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रही लड़ाई सीधे तौर पर भारत के मुख्य राष्ट्रीय हितों पर असर डाल रही है. भारत के लिए, वेस्ट एशिया केवल लड़ाई का मैदान भर नहीं है, बल्कि यह उसकी एनर्जी सिक्योरिटी, डायस्पोरा वेलफेयर, ट्रेड कनेक्टिविटी और स्ट्रेटेजिक बैलेंसिंग और घरेलू आर्थिक चिंता का प्रमुख कारण बन सकता है. 

ऊर्जा सुरक्षा भारत की प्रमुख चिंता है. Strait of Hormuz ओमान और ईरान के बीच स्थित है. इसमें किसी भी प्रकार की रुकावट वैश्विक तेल कीमतों को तेजी से बढ़ा सकती है. भारत के कच्चे तेल और गैस आयात का लगभग 50 फीसदी हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है. इसके साथ ही करीब 53 फीसदी एलएनजी आयात कतर और यूएई से होता है, जबकि 85 फीसदी एलपीजी भी खाड़ी से आती है. आपूर्ति बाधा और ब्रेंट लिंक्ड कीमतों में बढ़ोतरी से भारत को दोहरा झटका लग सकता है. यदि तेल 10 डॉलर प्रति बैरल महंगा होता है, तो चालू खाता घाटा 40–50 बेसिस पॉइंट बढ़ सकता है. इससे रुपये पर दबाव, महंगाई में उछाल और आरबीआई की दर में कटौती की संभावनाएं कम हो सकती हैं.

पश्चिम एशिया में कितने भारतीय रहते हैं

भारतीय डायस्पोरा एक जरूरी फैक्टर है. करीब 90 लाख भारतीय पश्चिम एशिया में रहते और काम करते हैं. ये लोग मुख्य रूप से खाड़ी देशों में बसे हुए हैं. यूएई में करीब 35 लाख भारतीय, सऊदी अरब में करीब 25 लाख, कुवैत में करीब आठ लाख, कतर में करीब साढ़े साथ लाख और ओमान में करीब सात लाख भारतीय हैं. बहरीन और दूसरे क्षेत्रीय देशों में भी छोटे लेकिन महत्वपूर्ण समुदाय रहते हैं. भारत के सालाना रेमिटेंस इनफ्लो का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है, जो 2023-24 में 120 अरब डॉलर को पार कर गया था. ईरान से जुड़े मामले बढ़ने की स्थिति में, 2015 के यमन मिशन (ऑपरेशन राहत) जैसे निकासी ऑपरेशन की जरूरत पड़ सकती है. लाखों भारतीय कामगारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना नई दिल्ली के लिए मानवीय ज़िम्मेदारी और राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्राथमिकता होगी.

कनेक्टिविटी और स्ट्रेटेजिक प्रोजेक्ट दांव पर हैं.पाकिस्तान को बाइपास करते हुए अफ़गानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए ईरान के चाबहार पोर्ट में भारत का निवेश ज़रूरी है. मामले बढ़ने से इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास धीमा हो सकता है और प्रतिबंधों का पालन मुश्किल हो सकता है.

चौथा, स्ट्रेटेजिक बैलेंसिंग ज़रूरी है. भारत की रणनीतिक स्वायत्तता तीन जटिल संतुलनों पर आधारित है इजरायल से गहरे रक्षा तकनीक और सुरक्षा सहयोग, अमेरिका के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी और ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा संबंध. भारत पारंपरिक रूप से किसी गुट में शामिल हुए बिना तनाव कम करने, अंतरराष्ट्रीय कानून और संवाद का समर्थन करता है. ऐसे में यह सैन्य अभियान आधुनिक मध्य-पूर्व के इतिहास में एक निर्णायक क्षण बन सकता है. 

(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )

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