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This Article is From Apr 11, 2019

मायावती के रंग समझना आसान नहीं, विपक्ष के लिए बढ़ गया है सिरदर्द...

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  • Updated:
    अप्रैल 11, 2019 16:55 pm IST
    • Published On अप्रैल 11, 2019 16:55 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 11, 2019 16:55 pm IST

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट, जिसकी बदौलत ऐतिहासिक दुश्मन रहे अखिलेश यादव और मायावती एक साथ आ गए थे, में आज मतदान हो रहा है. लेकिन लगभग एक साल पहले अखिलेश की समाजवादी पार्टी (SP) और मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) की मिली-जुली ताकत द्वारा भारतीय जनता पार्टी (BJP) को दी गई करारी शिकस्त से सामने आए 'कैराना मॉडल' के बाद से अब तक बहुत कुछ बदल चुका है, हालांकि इसी 'कैराना मॉडल' के परिणामों से उत्साहित होकर दोनों पार्टियां लोकसभा चुनाव 2019 में भी राज्य की 80 सीटों पर मिलकर लड़ रही हैं, ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दूसरा कार्यकाल हासिल करने से रोका जा सके.

आज पहले चरण में कैराना सहित उत्तर प्रदेश के आठ संसदीय क्षेत्रों में मतदान हो रहा है, लेकिन अटकलें गर्म हैं कि मायावती इस चुनाव में BJP के खिलाफ लड़ नहीं रही हैं, बल्कि शायद मज़ाक कर रही हैं. अटकलबाज़ी को दरकिनार कर भी दिया जाए, तो भी मायावती के हालिया कृत्यों ने विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं के मन में गहरी चिंता पैदा कर दी है. वे मायावती द्वारा उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों से की गई सार्वजनिक अपील का हवाला देते हैं, जिसमें BSP की मुखिया ने उन्हें कांग्रेस पर वोट बर्बाद न करने का आग्रह किया था. गौरतलब है कि कांग्रेस को अखिलेश और मायावती के गठबंधन से बाहर रखा गया है. अब मायावती की यह अपील कारगर साबित होती है या नहीं, इससे BJP को ठोस फायदा मिल सकता है, क्योंकि इससे लगेगा कि कांग्रेस और मायावती मुस्लिम वोटों के लिए लड़ रहे हैं, जिससे सवर्ण हिन्दुओं के वोटों का ध्रुवीकरण हो जाएगा.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और BJP नेता योगी आदित्यनाथ ने मायावती की अपील के तुरंत बाद हमला बोलते हुए अपने पसंदीदा नारे 'अली बनाम बजरंग बली' का इस्तेमाल किया, जिसने धर्म के नाम पर पहले भी वोटों का ध्रुवीकरण किया है.

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मेरठ में चुनावी सभा में कहा, "अगर कांग्रेस, SP और BSP को 'अली' पर भरोसा है, हमें भी 'बजरंग बली' पर भरोसा है..."

मायावती ने अपने भाषणों में BJP पर करारे हमले किए हैं, लेकिन उतनी ही सख्ती से उन्होंने कांग्रेस पर भी हमले किए हैं, और दोनों ही पार्टियों को 'एक सिक्के के दो पहलू' करार दिया है. यदि इस बात को ध्यान में रखा जाए कि कांग्रेस खुद ही मान चुकी है कि उत्तर प्रदेश में उसका खेल अगले विधानसभा चुनाव के लिए चल रहा है, और इस बार के लोकसभा चुनाव में उन्हें खास उम्मीद नहीं है, तो मायावती द्वारा कांग्रेस को भी BJP की ही तरह लताड़ा जाना अजीब लगता है.

जहां तक इस लेखक का प्रश्न है, उसे इस सबसे लग रहा है कि जिस तरह की 'लेन-देन की राजनीति' आज तक 'बहन जी' करती रही हैं, वह किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के साथ जा सकती हैं, जो 23 मई को आने वाले चुनाव परिणाम पर निर्भर करेगा.

इससे उनके सहयोगी अखिलेश यादव के लिए सिरदर्द पैदा हो सकता है, जो कांग्रेस की आलोचना बहुत हल्के-हल्के कर रहे हैं, ताकि चुनाव-बाद गठबंधन का रास्ता बना रहे. वरिष्ठ नेताओं ने मुझसे कहा कि मायावती ने अखिलेश के कांग्रेस के प्रति रुख को भी मुद्दा बनाया है और उन्हें पूरी ताकत के साथ कांग्रेस पर हमला बोलने के लिए कहा है.

समाजवादी पार्टी के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव पहले ही इस बात दुखड़ा रो रहे हैं कि उनका पुत्र सिर्फ अपने परिवार से ही कड़ाई से पेश आ सकता है (उनका इशारा अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव के पार्टी से निकलकर नई पार्टी बना लेने की ओर था), जबकि बाकी नेताओं और पार्टियों के लिए तो वह बिछ-बिछ जाते हैं. जूनियर यादव, यानी अखिलेश ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस को 100 सीटें दे दी थीं, और BJP रिकॉर्ड बहुमत पाकर सत्तासीन हो गई थी. उस वक्त भी, मायावती ने 100 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे थे, और ज़्यादा से ज़्यादा ध्रुवीकरण सुनिश्चित कर दिया था.

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी रैलियों में ज़ोरदार तरीके से इस बात को बार-बार कहा कि उन्होंने उन लोगों को टिकट नहीं दिया है, जो 'वोट बैंक' बनते हैं. गौरतलब है कि यह मुस्लिमों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला कोड है.

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प्रियंका गांधी ने मेरठ के अस्पताल में पिछले माह भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर से मुलाकात की थी...

ऐसा लगता है, मायावती इसलिए कांग्रेस से नाराज़ हैं, क्योंकि वह भीम आर्मी अध्यक्ष तथा युवाओं में लोकप्रिय जाटव दलित नेता चंद्रशेखर को उनके खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर रही है. लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस द्वारा किए गए बाकी सभी प्रयासों की ही तरह इसका नतीज़ा भी सिफर रहा, क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी ने एक बार चंद्रशेखर से मुलाकात की, और फिर कोई फॉलो-अप नहीं.

मायावती इस बात से भी नाराज़ हैं कि तीन दशक तक उनके सबसे करीबी सहयोगी रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी, जिन्हें उन्होंने वर्ष 2017 में BSP से निकाल दिया था, को कांग्रेस ने ऐसी सीट से टिकट दे दिया है, जहां आज मतदान हो रहा है.

माना जाता है कि मायावती कई नेताओं से कांग्रेस से रवैये की शिकायत कर चुकी हैं. बताया जाता है कि उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा कांग्रेस नेता कमलनाथ से कहा, "आप लोग (कांग्रेस पार्टी) हाथी (BSP का चुनाव चिह्न) पर सवार होकर आराम से दिल्ली पहुंच जाना चाहते हैं... मैं ऐसा नहीं होने दूंगी..."

दूसरी ओर कांग्रेस के पास भी मायावती के खिलाफ ढेरों शिकायतें हैं, जिनमें उनके घमंड से लेकर सीटों की अजीबोगरीब मांग तक शामिल हैं. लेकिन विपक्षी दलों के बीच इस तनाव से BJP खुश हो गई है. आखिरकार, 'कैराना मॉडल' का अर्थ BJP के खिलाफ एक साझा प्रत्याशी सुनिश्चित करना ही तो था, क्योंकि यही वह एकमात्र मणित है, जो BJP को पटखनी दे सकता था.

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BJP अध्यक्ष अमित शाह ने रैलियों में बार-बार कहा कि उन्होंने उन लोगों को टिकट नहीं दिया है, जो 'वोट बैंक' बनते हैं... गौरतलब है कि यह मुस्लिमों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला कोड है...

बहरहाल, अमित शाह ने सुनिश्चित कर दिया है कि BJP को उत्तर प्रदेश की हर सीट पर कई-कई प्रत्याशियों से भिड़ना पड़े. शिवपाल यादल की पार्टी, जो SP के वोट ज़रूर काटेगी, को संभवतः BJP से ही आर्थिक सहायता मिल रही है. शिवपाल यादव ने साफ-साफ मुझसे कहा, "मैं अपने भतीजे (अखिलेश यादव) को पसंद नहीं करता, जिसने मेरा अपमान किया... मैं BJP के साथ काम कर सकता हूं..."

चाचा के इरादे भले ही सार्वजनिक रूप से स्पष्ट हैं, लेकिन 'बुआ' मायावती ने BJP के साथ चुनाव-बाद सौदा हो जाने को लेकर अब तक चुप्पी साधी हुई है. एकमात्र संकेत यह हो सकता है कि मायावती के सबसे करीबी सहयोगी सतीश मिश्रा की ससुराल से जुड़ीं अनुराधा मिश्रा 9 मार्च को BJP में शामिल हुई थीं. विपक्ष के लिए सिरदर्द बढ़ गया है.

स्वाति चतुर्वेदी लेखिका तथा पत्रकार हैं, जो 'इंडियन एक्सप्रेस', 'द स्टेट्समैन' तथा 'द हिन्दुस्तान टाइम्स' के साथ काम कर चुकी हैं...

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