कानून का शासन, संविधानवाद, अंतरराष्ट्रीय मानदंड तय करना और मानवाधिकारों के प्रति सम्मान अमेरिकी विदेश नीति, अमेरिकी सोच और 'अमेरिकन ड्रीम' के प्रमुख आधार माने जाते हैं. हालांकि, वियतनाम, अफगानिस्तान, इराक, क्यूबा, लीबिया और वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप और हाल में ईरान के खिलाफ 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' को देखते हुए कई लोग इन दावों को पाखंडपूर्ण भी मान सकते हैं.
यह भी कहा जा सकता है कि रूस और ईरान जैसे देशों पर दबाव बनाने के लिए प्रतिबंध अमेरिकी विदेश नीति का एक बेहद प्रभावी और ताकतवर हथियार रहे हैं. अमेरिकी कांग्रेस ने सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर एक व्यापक प्रतिबंध कानून पारित किया है. लिंडसे ग्राहम अमेरिकी राजनीति के प्रमुख नेताओं में से एक रहे हैं.
क्यों हुई थी 'बोस्टन टी पार्टी'
इतिहास पर नजर डालें तो अमेरिकी क्रांति से पहले ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने अमेरिकी लोगों पर कई तरह के कर लगाए थे. इनमें चाय पर लगाया गया कर भी शामिल था, जिसके विरोध में 1773 में 'बोस्टन टी पार्टी' हुई. इन करों और ब्रिटिश नीतियों के विरोध ने आगे चलकर अमेरिकी क्रांति को जन्म दिया.
इस नए कानून का मुख्य प्रावधान यह है कि जो भी देश रूस से तेल खरीदता है, उस पर बहुत ऊंचे टैरिफ लगाया जा सकता है. इस प्रावधान ने भारत को भी मुश्किल स्थिति में डाल दिया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के बाद भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों और रूस के साथ अपने रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ा.
भारत के सामने एक कठिन स्थिति थी. उसे एक तरफ अमेरिकी कानून की कड़ी शर्तों का सामना करना था, तो दूसरी तरफ अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' और राष्ट्रीय हितों को भी बनाए रखना था. इस कानून की पहल करीब डेढ़ साल पहले हुई थी. अब यह आगे बढ़ चुका है. इससे रूस और पश्चिमी देशों के बीच पहले से जारी तनाव और बढ़ सकता है. दुनिया एक नए 'शीत युद्ध' की तरफ बढ़ सकती है. रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका और नाटो के नेतृत्व वाले यूरोपीय देश पहले ही रूस के खिलाफ कड़े कदम उठा रहे हैं.
अमेरिकी सीनेट के कुछ ताकतवर सदस्य इस कानून को बहुत कठोर और दमनकारी मानते हैं. उनका कहना है कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति की टैरिफ और प्रतिबंध लगाने की शक्तियों को और मजबूत करता है.
अगर इस कानून को विस्तार से समझें, तो इसका असर केवल रूसी सरकार तक ही सीमित नहीं है. इसका प्रभाव रूसी नौकरशाही, बड़े अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और ऊर्जा क्षेत्र की उन कंपनियों तक भी पहुंच सकता है, जिन पर रूस की युद्ध मशीनरी को मदद देने का आरोप लगाया जाता है. इस तरह इन संस्थाओं पर भी प्रतिबंधों का दबाव बढ़ सकता है.

ईरान पर अमेरिकी पाबंदियां
ईरान भी पिछले करीब तीन दशक से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है.'ईरान प्रतिबंध कानून' को अब लिंडसे ग्राहम कानून के जरिए और व्यापक बनाने की कोशिश की गई है. ईरान लंबे समय से यह मांग करता रहा है कि अगर अमेरिका के साथ समझौतों और संघर्षों के कारण ईरान को नुकसान हुआ है, तो उसे उचित मुआवजा दिया जाए. ईरान का मानना है कि जब तक ऐसा मुआवजा नहीं मिलता, तब तक बातचीत के सफल होने की संभावनाएं सीमित रहेंगी.
अमेरिका ने 2015 के बाद ईरान पर प्रतिबंध और कड़े किए. अमेरिका का आरोप था कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को हथियार बनाने की दिशा में ले जा रहा है.
ईरान के नतांज, फोर्डो और कोम जैसे परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमलों के दौरान यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया कि वहां मौजूद गुप्त परमाणु सुविधाएं पूरी तरह नष्ट हुईं या उन्हें कितना नुकसान पहुंचा. इसके साथ ही अमेरिकी रणनीतिक चर्चाओं में यह सवाल भी सामने आया कि ईरान के परमाणु ठिकानों पर हवाई हमलों के साथ जमीन पर सैनिकों की तैनाती यानी 'बूट्स ऑन द ग्राउंड' की जरूरत पड़ सकती है या नहीं.
इसी युद्ध और तनाव के माहौल में लिंडसे ग्राहम प्रमुखता से सामने आए. उन्होंने प्रस्तावित कानून को प्रभावी कानून में बदलने के लिए जोरदार पैरवी की. इसका एक उद्देश्य ईरान की ओर से हूती, हिज्बुल्लाह और हमास जैसे नॉन स्टेट एक्टर को समर्थन देने पर रोक लगाना भी बताया गया है.
ईरान के मामले में अमेरिकी प्रतिबंधों का इतिहास काफी पुराना है.साल 1979 के ईरान बंधक संकट के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने ईरान की करीब 8.1 अरब डॉलर की संपत्तियों को प्रतिबंधित कर दिया था. बाद में यह राशि बढ़कर करीब 12 अरब डॉलर हो गई.
दो-दो अमेरिकी पाबंदियों का सामना कर रहा है भारत
1979 में पहलवी शासन के खत्म होने और अयातुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में नए शासन की शुरुआत के बाद दोनों देशों के संबंध बेहद खराब हो गए थे.प्रतिबंधों की कहानी को आगे देखें तो 1984 में ईरान-इराक युद्ध के दौरान अमेरिका ने ईरान को 'आतंकवाद को प्रायोजित करने वाला देश' घोषित किया. यह आरोप और वर्गीकरण आज भी अमेरिकी नीति का हिस्सा है. ईरान के खिलाफ 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के अमेरिकी तर्कों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है.
इसके बाद ईरान के विभिन्न क्षेत्रों पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए. इनमें खनन, कृषि और कपड़ा कारोबार जैसे क्षेत्र भी शामिल थे. इस तरह जब 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' का दौर शुरू हुआ, तब तक ईरान पहले से ही आर्थिक प्रतिबंधों, अंतरराष्ट्रीय अलगाव और दबाव का सामना कर रहा था.
कुल मिलाकर, अमेरिकी प्रतिबंधों का असर भारत पर भी पड़ा है. इसे सिर्फ 'प्राथमिक प्रतिबंध' तक सीमित नहीं माना जा सकता. प्राथमिक प्रतिबंधों में आम तौर पर सीधे अमेरिका और संबंधित देश के बीच होने वाले कारोबार पर असर पड़ता है. लेकिन भारत, रूस और चीन जैसे देशों को 'द्वितीयक प्रतिबंधों' यानी Secondary Sanctions का भी सामना करना पड़ा है.
द्वितीयक प्रतिबंधों का मतलब है कि अगर कोई देश अमेरिका के विरोधी देश के साथ कारोबार करता है, तो उस देश पर भी अमेरिकी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. इस तरह 'हम और वे' वाली सोच के आधार पर प्रतिबंधों का दायरा दूसरे देशों तक भी फैल जाता है.
पाबंदियों से बचने की भारतीय पहल
भारत ने इसका सामना करने के लिए अपनी तेल आयात व्यवस्था में बदलाव किए. उसने अलग-अलग देशों से तेल खरीद बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू शुल्क व्यवस्था में भी बदलाव किए हैं. उदाहरण के तौर पर, भारत ने हार्ले-डेविडसन जैसी महंगी मोटरसाइकिलों पर पहले लगाए गए शुल्क में बदलाव किया था. इसे ट्रंप प्रशासन की शुरुआती टैरिफ नीति के दबाव को कम करने की कोशिश के रूप में देखा गया.
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का करीब 37 फीसद रूस से पूरा करता है, जबकि चीन की ऊर्जा आपूर्ति में रूस की हिस्सेदारी करीब आधी है. हालांकि, अगर रूसी तेल की जगह दूसरे स्रोतों से तेल खरीदना पड़े, तो परिवहन की दूरी बढ़ सकती है. इससे माल ढुलाई, बीमा और अन्य लागत भी बढ़ सकती है.
इसका असर भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी पर भी पड़ सकता है. चीन भी अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंधों का जवाब अपने शुल्क और प्रतिबंधों से देता रहा है. इस तरह यह स्थिति धीरे-धीरे व्यापार युद्ध का रूप ले सकती है.
इस समय भारत और अमेरिका एक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में लगे हुए हैं. ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ से पैदा होने वाला तनाव दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को प्रभावित कर सकता है. इससे भारत की संप्रभुता और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से जुड़े सवाल भी कई तरह से सामने आते हैं.
(डिस्क्लेमर: लेखक नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में अंतरराष्ट्रीय संबंध और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बारे में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहम होना जरूरी नहीं है.)