जमुई... बिहार का एक पहाड़ी इलाका. दूसरी तरफ... दिल्ली का पॉश आस्था कुंज पार्क. दोनों के बीच कोई समानता नहीं है, न जमीन की, न तरक्की की, न माहौल की. एक तरफ जमुई-लखीसराय मुख्य मार्ग से तीन किलोमीटर दूर सुनसान पहाड़ी, दूसरी तरफ राजधानी का एक मशहूर मंदिर, जहां रोज हजारों लोग दर्शन के लिए पहुंचते हैं. एक जगह गांव की गलियां हैं, दूसरी जगह मेट्रो की चमक-दमक. लेकिन नतीजा हैरान करने वाली हद तक एक जैसा-एक नाबालिग छात्रा को भीड़ ने घेरा, एक नाबालिग को वर्दी का डर दिखाकर दबोचा गया. सवाल यही उठता है- अगर जगह, तरक्की, शिक्षा का स्तर, संसाधन सब कुछ अलग है, तो फिर अपराध एक जैसा क्यों?
क्या कानून व्यवस्था से ही सुधर जाएगी महिलाओं के प्रति मानसिकता
जवाब आसान है, मगर कड़वा है. यह 'बिहार' या 'असुरक्षित दिल्ली' का मसला नहीं है, यह उस मानसिकता का मसला है, जो हर जगह मौजूद है, बस उसका चेहरा बदल जाता है. गांव में वह भीड़ बनकर घेरती है, शहर में वर्दी का वेष बनाकर डराती है. लोकेशन बदलती रहती है, पर सोच वहीं की वहीं रहती है. औरत या लड़की को मौका के तौर पर देखने की सोच. जब तक हम इस सोच को सिर्फ भूगोल की समस्या मानकर देखते रहेंगे, 'गांव में सुरक्षा कम है' या 'बड़े शहर में भीड़ ज़्यादा है', तब तक असली बीमारी पकड़ में नहीं आएगी.
यहीं से बात आती है सिस्टम की, क्योंकि मानसिकता बदलने में वक्त लगता है. लेकिन डर पैदा करना सिस्टम के हाथ में है. और यही वह जगह है जहां हमारा कानून-व्यवस्था तंत्र बार-बार पिछड़ जाता है. निर्भया कांड के बाद से महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर कानून लगातार सख्त हुए हैं. POCSO एक्ट, फास्ट ट्रैक कोर्ट, धाराओं में सख्ती. कागज पर व्यवस्था मजबूत दिखती है. लेकिन जमीन पर सच्चाई अलग है. जमुई कांड में POCSO एक्ट की धाराएं लगीं, SIT बनी. यह सब अच्छा है.लेकिन एक सवाल लोगों के मन में भी कौंध रहा होगा कि कानूनी प्रक्रिया कितनी तेज चलेगी? भारत में रेप और यौन उत्पीड़न के मामलों में औसत ट्रायल पूरा होने में सालों लग जाते हैं. फास्ट ट्रैक कोर्ट का नाम भले 'फास्ट' हो, लेकिन पेंडिंग केसों का अंबार इतना बड़ा है कि रफ्तार धीमी ही रहती है. जब तक अपराधी को यह भरोसा रहेगा कि 'सज़ा मिलने में सालों लगेंगे, तब तक बहुत कुछ बदल जाएगा', तब तक कानून का डर पैदा नहीं होगा. कानून सख्त होने से ज्यादा जरूरी है कानून का तेजी से लागू होना.
पुलिस बल में कितनी हैं महिलाएं
एक और पहलू जो अक्सर बहस से गायब रहता है, थानों और गश्ती दल में महिला पुलिसकर्मियों की भारी कमी. पीड़िता जब किसी घटना की शिकायत लेकर थाने पहुंचती है, तो सामने अक्सर सिर्फ पुरुष अधिकारी होते हैं. ऐसे में कई बार लड़कियां और महिलाएं झिझक की वजह से शिकायत तक दर्ज नहीं करा पातीं हैं या पूरी बात खुलकर नहीं बता पातीं हैं. देश के पुलिस बल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व आज भी अपेक्षाकृत कम है, जबकि जरूरत कहीं ज्यादा है. केवल महिला डेस्क बना देना काफी नहीं है. हर थाने, हर गश्ती यूनिट में महिला पुलिसकर्मियों की सार्थक मौजूदगी ज़रूरी है, ताकि पीड़िता को यह भरोसा मिले कि उसकी बात सुनी जाएगी, समझी जाएगी. हालांकि इस मामले में बिहार ने देश के बाकी राज्यों को पीछे छोड़ा है.
बिहार में बाकी राज्यों के मुकाबले महिला पुलिसकर्मियों की संख्या अधिक है. बिहार के पुलिस बल में महिलाओं की संख्या इस समय करीब 30 हजार है.
जमुई की घटना सुनसान पहाड़ी इलाके में हुई, जहां पेट्रोलिंग की व्यवस्था खुद सवालों के घेरे में आ गई. दिल्ली के मामले में भी अपराधियों ने वर्दी का भेस बनाकर डराया यानी असली वर्दी वहां मौजूद नहीं थी, जिसका डर काम आता. यह विजिबल पुलिसिंग की कमी की मिसाल है. पुलिस का सिर्फ थाने में मौजूद होना काफी नहीं है, सुनसान इलाकों, पार्कों, मंदिरों के आसपास, स्कूल-कॉलेज के रास्तों पर पुलिस की दिखती हुई मौजूदगी ज़रूरी है. जब गश्ती गाड़ी, वर्दी वाला सिपाही या CCTV कैमरा लगातार नज़र आता है, तभी अपराधी के मन में झिझक पैदा होती है. पुलिस बजट का बड़ा हिस्सा वीआईपी सुरक्षा और शहरी थानों पर खर्च होता है, जबकि सुनसान इलाकों और आम जनता के रोज़मर्रा के रास्तों पर पुलिसिंग कमज़ोर रह जाती है. यही अंतर अपराधियों को मौका देता है.लेकिन कानून, पुलिस बल और गश्त, यह सब सिर्फ बाद की व्यवस्था है. अपराध होने के बाद सज़ा दिलाना अलग बात है, अपराध होने ही न देना अलग. यह काम सिस्टम अकेले नहीं कर सकता. जमुई में गिरफ्तार आरोपियों में नाबालिग भी शामिल हैं. यह सिर्फ एक कानूनी आंकड़ा नहीं, एक चेतावनी है कि इतनी कम उम्र में इतनी क्रूरता कहीं न कहीं घर से, परवरिश से, आसपास के माहौल से आई है. हम अक्सर बेटियों को सिखाते हैं कि कैसे बचना है, कहां नहीं जाना है, क्या नहीं पहनना है,लेकिन बेटों को यह सिखाने में पीछे रह जाते हैं कि सम्मान क्या होता है, 'ना' का मतलब क्या होता है, दूसरे की गरिमा का मतलब क्या होता है. जब तक परवरिश की यह असंतुलन नहीं टूटेगा, तब तक कानून और पुलिस सिर्फ घटना के बाद सफाई करते रहेंगे, घटना रुकेगी नहीं.
जमुई और दिल्ली में घटी घटनाएं चीख-चीखकर बता रही हैं कि समस्या किसी एक राज्य, किसी एक इलाके या किसी एक व्यवस्था की खामी नहीं है. यह कानून की सख्ती, ट्रायल की रफ्तार, पुलिस की मौजूदगी और घर की परवरिश. इन चारों मोर्चों पर एक साथ लड़ी जाने वाली लड़ाई है.
(डिस्क्लेमर: लेखक देश की राजनीति पर पैनी नजर रखते हैं. वो राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)