विज्ञापन

गाज़ा में पीछे क्यों हटा हमास, क्या शांति ला पाएगा उसका यह कदम

डॉ सलीम अहमद
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 09, 2026 16:15 pm IST
    • Published On जुलाई 09, 2026 16:15 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 09, 2026 16:15 pm IST
गाज़ा में पीछे क्यों हटा हमास, क्या शांति ला पाएगा उसका यह कदम

पश्चिम एशिया की सियासत एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां एक निर्णय केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता, सुरक्षा और भविष्य की शांति प्रक्रिया की दिशा तय कर सकता है. गाज़ा पट्टी में हमास द्वारा अपने प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण से पीछे हटने का निर्णय इसी श्रेणी की घटना है. करीब दो दशक तक गाज़ा की राजनीतिक, प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्था पर प्रभावी नियंत्रण रखने वाले हमास का यह कदम केवल एक प्रशासनिक परिवर्तन भर नहीं है, बल्कि यह इज़रायल–फ़िलिस्तीन संघर्ष की बदलती प्रकृति, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और युद्ध के बाद की राजनीतिक व्यवस्था का संकेत भी माना जा रहा है.

गाजा का विनाश

हमास का यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है जब गाज़ा लंबे समय से युद्ध, मानवीय संकट, आर्थिक बदहाली और व्यापक विनाश का सामना कर रहा है. लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं. अस्पताल और विद्यालय बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, बुनियादी ढांचा नष्ट हो चुका है और सामान्य जीवन लगभग ठहर सा गया है. ऐसे वातावरण में शासन का प्रश्न केवल सत्ता का नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व और पुनर्निर्माण का भी बन जाता है. इसलिए हमास के इस निर्णय को केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि मानवीय, सामरिक और कूटनीतिक दृष्टि से भी समझना जरूरी है.

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमास वास्तव में सत्ता छोड़ रहा है या केवल अपनी राजनीतिक रणनीति बदल रहा है? साल 2007 से हमास ने गाज़ा पर शासन किया. उसने प्रशासनिक संस्थाएं विकसित कीं, सुरक्षा व्यवस्था संचालित की और स्थानीय शासन की जिम्मेदारी निभाई.  किंतु हाल के युद्ध ने उसकी प्रशासनिक क्षमता पर भारी दबाव डाला है. किसी भी संगठन के लिए एक साथ युद्ध लड़ना और नागरिक प्रशासन चलाना अत्यंत कठिन होता है. ऐसे में प्रशासनिक जिम्मेदारी से पीछे हटना परिस्थितियों की विवशता भी हो सकती है और रणनीतिक पुनर्संरचना भी. यहां
यह भी समझना जरूरी है कि प्रशासनिक नियंत्रण छोड़ देना और राजनीतिक या सैन्य प्रभाव समाप्त हो जाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं.यदि हमास अपनी संगठनात्मक संरचना, सामाजिक आधार और सुरक्षा नेटवर्क को बनाए रखता है, तो केवल प्रशासनिक परिवर्तन से गाज़ा की वास्तविक शक्ति-संरचना में बड़ा बदलाव नहीं आएगा. इसलिए इस निर्णय का मूल्यांकन केवल औपचारिक सत्ता हस्तांतरण के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक राजनीतिक प्रभाव और भविष्य की शक्ति-संरचना के संदर्भ में किया जाना चाहिए.

गाजा में कैसे आएगी शांति

जहां कुछ देशों और राजनयिक विश्लेषकों ने इस निर्णय को सकारात्मक संकेत माना है, वहीं इज़रायल ने इसे पर्याप्त नहीं माना. इज़रायल की राय है कि केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी छोड़ने से गाज़ा में स्थायी शांति स्थापित नहीं होगी. उसकी मुख्य चिंता हमास की सैन्य क्षमता और हथियारबंद ढांचे को लेकर है. इज़रायल का तर्क है कि यदि हमास की सैन्य संरचना बनी रहती है, तो भविष्य में संघर्ष दोबारा भड़कने की आशंका खत्म नहीं होगी. यही कारण है कि वह प्रशासनिक परिवर्तन के साथ-साथ व्यापक सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव की भी मांग करता है. इस प्रकार दोनों पक्षों की प्राथमिकताओं में अभी भी मूलभूत अंतर बना हुआ है.

युद्ध के बाद गाज़ा के सामने सबसे बड़ी चुनौती पुनर्निर्माण की है. अस्पताल, विद्यालय, सड़कें, बिजली, जलापूर्ति और आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं को पुनः स्थापित करने के लिए विशाल आर्थिक संसाधनों की जरूरत होगी. अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अरब देशों ने पुनर्निर्माण में सहयोग की इच्छा जताई है. लेकिन यह सहायता किस प्रशासन के माध्यम से पहुंचेगी, इस सवाल का जवाब अभी भी अनिश्चित है. कई पश्चिमी देश ऐसे प्रशासन के साथ प्रत्यक्ष सहयोग करने से बचना चाहते हैं जिसमें हमास की निर्णायक भूमिका हो. यही कारण है कि तकनीकी विशेषज्ञों या गैर-दलीय प्रशासन की अवधारणा को आगे बढ़ाया जा रहा है. हालांकि यह भी स्पष्ट है कि केवल नया प्रशासन स्थापित कर देने से गाज़ा की समस्याएं समाप्त नहीं होंगी. स्थिर शासन, सुरक्षा, राजनीतिक वैधता और जनता का विश्वास, ये चारों समान रूप से जरूरी होंगे.

Add image caption here

Add image caption here

हमास के इस निर्णय का प्रभाव केवल गाज़ा तक सीमित नहीं रहेगा. यह पूरे फ़िलिस्तीनी राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित कर सकता है.लंबे समय से फ़िलिस्तीनी राजनीति हमास और फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण के बीच विभाजित रही है. इस विभाजन ने फ़िलिस्तीनी राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर किया है. इसने एक साझा नेतृत्व के निर्माण में बाधा उत्पन्न की है. यदि गाज़ा में सभी पक्षों की सहमति से कोई नई प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित होती है, तो यह फ़िलिस्तीनी राजनीतिक एकता की दिशा में महत्वपूर्ण अवसर सिद्ध हो सकती है. लेकिन यदि आपसी अविश्वास और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बनी रहती है, तो यह परिवर्तन भी स्थायी समाधान नहीं दे पाएगा. 

कितना बड़ा है गाजा का सवाल

गाज़ा का प्रश्न अब केवल फ़िलिस्तीन और इज़रायल तक सीमित नहीं है. मिस्र, क़तर, सऊदी अरब, तुर्किये, ईरान और अमेरिका सहित अनेक क्षेत्रीय एवं वैश्विक शक्तियां इस संकट के समाधान में अपनी-अपनी भूमिका निभा रही हैं. मिस्र और क़तर लंबे समय से युद्धविराम और वार्ता के मध्यस्थ रहे हैं, जबकि खाड़ी देश पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग देने की संभावनाएं तलाश रहे हैं. दूसरी ओर ईरान, फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध समूहों के समर्थन के कारण इस पूरे घटनाक्रम को अपनी क्षेत्रीय रणनीति के दृष्टिकोण से देखता है. अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की प्राथमिकता यह है कि गाज़ा में ऐसी व्यवस्था स्थापित हो जो सुरक्षा और पुनर्निर्माण दोनों को संतुलित कर सके. स्पष्ट है कि गाज़ा का भविष्य अब व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी हिस्सा बन चुका है.

संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है. मानवीय सहायता, युद्धविराम की निगरानी, विस्थापित नागरिकों की सहायता और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में इन संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक होगी.इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून, नागरिकों की सुरक्षा और मानवाधिकारों के संरक्षण जैसे मुद्दे भी इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में बने रहेंगे. यदि इन सिद्धांतों की उपेक्षा की जाती है, तो स्थायी शांति की संभावना और अधिक कठिन हो जाएगी. 

इस पूरे संकट का सबसे बड़ा बोझ गाज़ा के आम नागरिकों ने उठाया है. राजनीतिक नेतृत्व, सैन्य रणनीतियों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बीच सबसे अधिक प्रभावित वही लोग हुए हैं जिन्हें सुरक्षित जीवन, भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मानजनक भविष्य की जरूरत है. किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की सफलता अंततः इस बात से तय होगी कि वह आम नागरिकों को सुरक्षा,स्थिरता और गरिमापूर्ण जीवन कितना उपलब्ध करा पाती है.

गाजा में भारत के हित क्या हैं

भारत के दृष्टिकोण से भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है. भारत लंबे समय से आतंकवाद के विरुद्ध अपनी स्पष्ट नीति और फ़िलिस्तीनी जनता के वैध अधिकारों के समर्थन, दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास करता रहा है. पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, समुद्री संपर्क और प्रवासी भारतीयों के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है. इसलिए गाज़ा में स्थिरता भारत के व्यापक सामरिक और आर्थिक हितों से भी जुड़ी हुई है. भारत की कूटनीति के सामने भविष्य में भी यही चुनौती रहेगी कि वह मानवीय सहायता, क्षेत्रीय स्थिरता और शांतिपूर्ण समाधान के समर्थन के बीच संतुलित भूमिका निभाए.

Gaza, Hamas

गाजा पर हमास 2007 से शासन कर रहा था, जिसे अब उसे छोड़ने की घोषणा की है.
Photo Credit: AP

क्या हमास वास्तव में कमजोर हुआ है? इस प्रश्न पर विशेषज्ञों के बीच मतभेद हैं. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि लंबे युद्ध, अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रशासनिक चुनौतियों ने उसे पीछे हटने के लिए विवश किया है. वहीं अन्य विशेषज्ञ इसे परिस्थितियों के अनुरूप अपनाई गई नई रणनीति मानते हैं, जिसके माध्यम से संगठन अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखना चाहता है. संभवतः वास्तविकता इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच कहीं स्थित है. यह स्पष्ट है कि युद्ध ने हमास की स्थिति को प्रभावित किया है, लेकिन उसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो गया है, ऐसा निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाज़ी होगी.

गाजा की जरूरत क्या है

अंततः सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इस निर्णय से स्थायी शांति स्थापित हो जाएगी? इसका उत्तर फिलहाल नकारात्मक ही प्रतीत होता है. जब तक सुरक्षा, सीमाओं, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, फ़िलिस्तीनी राज्य की आकांक्षा, पारस्परिक विश्वास और दीर्घकालिक राजनीतिक समझौते जैसे मूल प्रश्नों का समाधान नहीं होगा, तब तक केवल प्रशासनिक परिवर्तन स्थायी शांति की गारंटी नहीं बन सकता.

इतिहास यह बताता है कि युद्ध किसी पक्ष को अस्थायी विजय तो दिला सकता है, किंतु स्थायी शांति केवल राजनीतिक समाधान, संवाद और विश्वास निर्माण से ही संभव होती है. गाज़ा में आज आवश्यकता केवल नई सरकार बनाने की नहीं, बल्कि ऐसी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करने की है जो सुरक्षा, न्याय, विकास और मानवीय गरिमा के बीच संतुलन स्थापित कर सके. यदि संबंधित पक्ष अल्पकालिक राजनीतिक लाभों से ऊपर उठकर दीर्घकालिक शांति को प्राथमिकता देते हैं, तो हमास का यह निर्णय वास्तव में एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत सिद्ध हो सकता है. अन्यथा यह भी पश्चिम एशिया के लंबे संघर्षपूर्ण इतिहास का एक और अधूरा अध्याय बनकर रह जाएगा.

(डिस्क्लेमर: लेखक हरियाणा के गुरुग्राम में स्थित केआर मंगलम विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स के राजनीति विज्ञान विभाग में वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं,उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)  

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Gaza, Hamas, Israel Hamas War
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com