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ईरान युद्ध ने खोल दी खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा की पोल? क्या अब बदलनी पड़ेगी पूरे गल्फ की सुरक्षा व्यवस्था

कर्नल रिटा. राजीव अग्रवाल
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 11, 2026 15:22 pm IST
    • Published On मार्च 11, 2026 11:35 am IST
    • Last Updated On मार्च 11, 2026 15:22 pm IST
ईरान युद्ध ने खोल दी खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा की पोल? क्या अब बदलनी पड़ेगी पूरे गल्फ की सुरक्षा व्यवस्था

28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए प्री-एम्प्टिव हमलों के साथ शुरू हुआ ईरान का युद्ध अब दूसरे हफ्ते में पहुंच चुका है और अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं है कि कोई भी पक्ष जल्द पीछे हटने वाला है. उम्मीद के उलट, ईरान ने जोरदार पलटवार किया है और उस पर डाले जा रहे जबरदस्त दबाव के बावजूद झुकने से इनकार कर दिया है. ईरान के सुप्रीम लीडर और उसके 40 से ज्यादा शीर्ष सैन्य कमांडरों की टारगेटेड हत्या ने उसे कमजोर करने के बजाय उसके संकल्प को और मजबूत कर दिया है. पिछले 12 दिनों में ईरान ने न सिर्फ इजरायल के अंदर जवाबी हमले किए हैं बल्कि पूरे क्षेत्र में मौजूद कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों और संपत्तियों को भी सफलतापूर्वक निशाना बनाया है. इन हमलों के साथ-साथ तेल डिपो, तेल और गैस के बड़े फील्ड जैसे अहम ऊर्जा ढांचों पर हमले और सबसे महत्वपूर्ण हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र में घबराहट का माहौल पैदा कर दिया है.

सुरक्षा गारंटी पर सवाल, क्या अमेरिका की नाकामी है?

अब खाड़ी क्षेत्र में लोग बेहद कठिन सवाल पूछ रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों साबित हुई? दूसरा सवाल अमेरिका की उन सुरक्षा गारंटियों पर उठ रहा है जिन्हें वह दशकों से इस क्षेत्र को देता आया है. इस पूरे मॉडल की उपयोगिता पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं, जबकि कुछ देश भविष्य के लिए वैकल्पिक सुरक्षा विकल्प तलाशने लगे हैं.

सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? गल्फ देशों के पास इतनी संपत्ति और संसाधन होने के बावजूद वो ईरान के हमलों से अपनी जमीन की रक्षा क्यों नहीं कर पाए? और आगे चलकर क्षेत्र में पूरी तरह भरोसेमंद सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा सकती है? ये ऐसे कठिन सवाल हैं जिन पर युद्ध खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक बहस होती रहेगी. मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था को समझने और यह जानने के लिए कि वह क्यों नाकाम हुई, खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा संरचना को गहराई से समझना जरूरी है.

खाड़ी सुरक्षा व्यवस्था की शुरुआत

खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था की जड़ें 1960 के दशक के अंत तक ब्रिटेन की तरफ से दी जाने वाली सुरक्षा अंब्रेला में मिलती हैं. इसके बाद 1969 में घोषित निक्सन डॉक्ट्रिन के जरिए अमेरिका ने यह जिम्मेदारी अपने हाथ में ली. इस सिद्धांत के तहत अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों से कहा कि वे अपनी सुरक्षा में खुद भी योगदान दें, लेकिन उन्हें अमेरिकी सुरक्षा सहायता मिलती रहेगी. इसके बाद ट्विन पिलर्स पॉलिसी आई. जिसके तहत सऊदी अरब और ईरान को दो स्तंभ बनाकर फारस की खाड़ी की सुरक्षा सुनिश्चित करने की योजना बनाई गई.

ईरान क्रांति के बाद टूटा सुरक्षा ढांचा

लेकिन 1979 की ईरानी क्रांति के बाद यह नीति बुरी तरह बिखर गई क्योंकि इस नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ यानी ईरान इससे बाहर हो गया.1980 में अपने स्टेट ऑफ द यूनियन संबोधन में अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने इस पूरे क्षेत्र को आश्वासन देते हुए कहा था, “यदि कोई बाहरी ताकत फारस की खाड़ी क्षेत्र पर नियंत्रण करने की कोशिश करती है, तो इसे अमेरिका के महत्वपूर्ण हितों पर हमला माना जाएगा और ऐसे हमले को हर संभव तरीके से रोका जाएगा, जिसमें सैन्य ताकत का इस्तेमाल भी शामिल होगा.”

डर और बहिष्कार पर खड़ा हुआ GCC संगठन

इसके बाद 1981 में गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) का गठन किया गया. इस संगठन का मकसद खाड़ी देशों को दो संभावित दुश्मनों के खिलाफ एकजुट करना था. इसमें वैचारिक दुश्मन के रूप में ईरान और आक्रामक शक्ति के रूप में इराक था. इस तरह GCC का जन्म दो बड़े स्तंभों डर और बहिष्कार पर हुआ. लेकिन इस संरचना में एक बड़ी कमी यह थी कि इसने क्षेत्र की भौगोलिक और जियो-पॉलिटिकल वास्तविकताओं को नजरअंदाज कर दिया. ईरान और इराक फारस की खाड़ी के लगभग पूरे उत्तरी तट को कवर करते हैं और साथ ही वो मध्य एशिया और दक्षिण एशिया की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी हैं. इतना ही नहीं उनके पास प्राकृतिक संसाधनों के विशाल भंडार भी मौजूद हैं.

अमेरिकी सैन्य उपस्थिति और नए सुरक्षा ढांचे

1991 के इराक युद्ध के बाद अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति और मजबूत कर दी. 1995 में अमेरिकी नौसेना के फिफ्थ फ्लीट मुख्यालय को बहरीन में स्थानांतरित किया गया. 1996 में कतर में अल उदीद एयरबेस बनाया गया और 2003 में अमेरिकी सेंटकॉम को भी यहीं स्थानांतरित कर दिया गया. 1999 में अमेरिका ने कोऑपरेटिव डिफेंस इनिशिएटिव (CDI) शुरू किया. इस योजना का उद्देश्य GCC देशों, मिस्र और जॉर्डन की सेनाओं के बीच रक्षा सहयोग और खुफिया जानकारी साझा करना था. इसके बाद मई 2006 में अमेरिका ने गल्फ सिक्योरिटी डायलॉग (GSD) शुरू किया जिसका उद्देश्य GCC देशों और अमेरिका के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ाना था.

अरब NATO का विचार क्यों विफल हुआ?

2017 में रियाद में आयोजित अमेरिका-GCC शिखर सम्मेलन में अरब नेटो या मिडिल ईस्ट स्ट्रेटेजिक एलायंस (MESA) का विचार सामने आया. इसमें GCC देशों के साथ मिस्र और जॉर्डन को शामिल करने की योजना थी. लेकिन जून 2017 में कतर पर लगाए गए कूटनीतिक प्रतिबंध के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई. 2022 में जेद्दा में हुए GCC सम्मेलन में भी अमेरिका, मिस्र, इराक और जॉर्डन के नेताओं ने सामूहिक सुरक्षा का वादा दोहराया. यह भी कहा गया कि वे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता को खतरा पहुंचाने वाली गतिविधियों का सामना करेंगे. इसके बाद सितंबर 2025 में जब इजरायल ने दोहा में हमास नेतृत्व को निशाना बनाते हुए मिसाइल हमला किया तो अमेरिका ने कतर को NATO के आर्टिकल-5 जैसी सुरक्षा गारंटी देने का आश्वासन दिया था.

युद्ध ने सारी गारंटियां बेअसर कर दीं

इसके बावजूद मौजूदा युद्ध ने इन सभी सुरक्षा गारंटियों को लगभग बेअसर साबित कर दिया है. अमेरिका खाड़ी देशों को ईरान के मौजूदा हमलों से बचाने में असफल रहा है. साथ ही GCC भी पिछले कई दशकों में सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में प्रभावी साबित नहीं हो पाया. इसकी प्रमुक वजह संसाधनों की कमी और साझा रणनीतिक दृष्टि का अभाव है. मौजूदा युद्ध ने क्षेत्र की सुरक्षा प्रणाली की गहरी कमजोरियों को उजागर कर दिया है. इसलिए अब गंभीर समीक्षा और नए सिरे से सोचने की जरूरत है. ऐसे में आगे दो ही विकल्प नजर आते हैं. पहला, बाहरी ताकतों पर निर्भरता जारी रखना. खाड़ी क्षेत्र अमेरिका या किसी अन्य बाहरी शक्ति पर सुरक्षा के लिए निर्भर रह सकता है. लेकिन यदि दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना और क्षेत्र में 13 बड़े सैन्य ठिकानों के बावजूद अमेरिका इस क्षेत्र को सिर्फ एक देश ईरान से नहीं बचा पाया, तो भविष्य में इस मॉडल की सफलता पर गंभीर सवाल उठते हैं.

वहीं दूसरा विकल्प है कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा संरचना को नए सिरे से बनाया जाए. मार्च 2023 में सऊदी अरब और ईरान के बीच चीन की मध्यस्थता में शांति समझौता हुआ था. उसी समय क्षेत्र में अरब देशों के बीच मेल-मिलाप की एक नई लहर भी देखने को मिली. मिस्र ने तुर्किये और सीरिया के साथ रिश्ते सुधारने की पहल की. कतर और बहरीन ने भी अपने कूटनीतिक संबंध बहाल करने की घोषणा की. इसके अलावा 11 साल के निष्कासन के बाद अप्रैल 2023 में सीरिया को फिर से अरब लीग में शामिल कर लिया गया.

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हालिया युद्धों से मिले संकेत

गजा में और उसके बाद के संघर्षों के दौरान दो बातें खास तौर पर सामने आईं. कई खाड़ी देशों ने अमेरिका और इजरायल को ईरान पर हमला करने के लिए अपने हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने दिया, लेकिन ईरान ने अरब देशों पर सीधा हमला नहीं किया. अब तक के 12-दिवसीय युद्ध के दौरान जब इजरायल ने ईरान पर प्री-एम्प्टिव हमला किया, तब क्षेत्र के कई देशों ने ईरान की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए उसके साथ एकजुटता दिखाई. साथ ही उस संघर्ष के दौरान ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद भी नहीं किया.

इन घटनाओं से एक महत्वपूर्ण संदेश मिलता है. कई पुरानी धारणाओं के विपरीत, ईरान क्षेत्र के लिए तभी खतरा बनता है जब उसे लगता है कि क्षेत्र उससे लिए खतरा पैदा कर रहा है. यदि क्षेत्रीय देशों ने अमेरिका और इजरायल को अपने इलाके से ईरान पर हमला करने की अनुमति नहीं दी होती, तो शायद ईरान भी इस क्षेत्र के देशों पर जवाबी हमले नहीं करता.

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नई सुरक्षा व्यवस्था कैसी हो सकती है?

भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था बनाते समय पिछले अनुभवों की असफलताओं और मौजूदा रणनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा. एक नया कॉमन सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार करना होगा. यह व्यवस्था सहयोगी सुरक्षा मॉडल पर आधारित होनी चाहिए जिसमें हर देश दूसरे देशों के साथ संतुलन बनाकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करे. इसका मूल विचार यह है कि सभी देश सैन्य प्रतिस्पर्धा को सीमित करने के लिए आपसी जिम्मेदारियों के जरिए ज्यादा सुरक्षा हासिल कर सकते हैं, बजाय इसके कि कोई एक देश प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश करे. इस मॉडल में क्षेत्रीय शक्ति संतुलन भी जरूरी होगा ताकि कोई एक देश बाकी देशों के संयुक्त प्रभाव से ज्यादा ताकतवर न हो सके.

नई संरचना में किन देशों को शामिल करना होगा

नई सुरक्षा व्यवस्था अधिक समावेशी होनी चाहिए. इसमें ईरान और इराक समेत अन्य देशों को भी शामिल करना होगा. साथ ही इसमें सहयोग और विश्वास निर्माण के तंत्र होने चाहिए. बाहरी शक्तियों की भूमिका को भी स्वीकार करना होगा और पारंपरिक तथा अन्य खतरों से निपटने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर सामूहिक प्रतिक्रिया तंत्र बनाना होगा.

क्या GCC का अंत हो जाएगा?

यदि नई संरचना में ईरान और इराक को शामिल किया जाता है तो मौजूदा GCC अपने वर्तमान स्वरूप में शायद समाप्त हो जाएगा. क्योंकि यह संगठन ही उन्हीं दो देशों के खतरे के आधार पर बनाया गया था. लेकिन सुरक्षा की वास्तविक जरूरतें ऐसे कदम की मांग कर सकती हैं. इसे समझने के लिए एक उदाहरण दिया जा सकता है. कल्पना कीजिए कि दक्षिण एशिया के मुद्दों पर चर्चा करने वाला सार्क संगठन भारत या पाकिस्तान के बिना हो, तो यह लगभग असंभव लगता है.

इसी तरह खाड़ी क्षेत्र को एक संतुलित, प्रभावी और स्थानीय सुरक्षा संरचना की जरूरत है. जहां ईरान और इराक दोनों शामिल हों, लेकिन गहरे अविश्वास, वैचारिक टकराव और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण यह आसान काम नहीं होगा. फिर भी इस चुनौती से बचकर निकलने का कोई विकल्प नहीं है. अंतिम लक्ष्य भले ही महत्वाकांक्षी हो, लेकिन पहला कदम यह होना चाहिए कि सभी देशों को एक साझा मंच पर लाया जाए.

यदि ईरान, इराक, मिस्र, जॉर्डन, सीरिया और लेबनान जैसे देशों को इस ढांचे में शामिल किया जाता है तो इससे क्षेत्र में संतुलन भी बनेगा और संदेह भी कम होंगे. शुरुआत में समस्याएं जरूर आएंगी; यह फ्रेमवर्क शायद पूरी तरह से सफल भी न हो, पर कोशिश करना जरूरी है. क्योंकि सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि 10 या 20 साल बाद यह संरचना कैसी दिखेगी, बल्कि यह है कि ऐसा मंच बने जहां सभी पक्ष अपने संदेह और अविश्वास को पीछे छोड़कर साथ बैठ सकें.

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