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वेनेजुएला की राष्ट्रपति की भारत यात्रा का मकसद क्या है, क्या भारत की तेल की जरूरत पूरी होगी

राजन कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 05, 2026 17:14 pm IST
    • Published On जून 05, 2026 17:14 pm IST
    • Last Updated On जून 05, 2026 17:14 pm IST
वेनेजुएला की राष्ट्रपति की भारत यात्रा का मकसद क्या है, क्या भारत की तेल की जरूरत पूरी होगी

वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज की भारत यात्रा का समय बड़ा दिलचस्प है. अभी छह महीने पहले ही, वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिका ने गिरफ्तार कर लिया था. मादुरो पर न्यूयॉर्क में मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में मुकदमा चल रहा है. अमेरिका की इस कार्रवाई की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक निंदा हुई और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य अभियान की कड़ी आलोचना करते हुए इसे 'एक खतरनाक मिसाल' बताया था. भारत ने अमेरिकी हमले की स्पष्ट निंदा किए बिना अपनी 'गहरी चिंता' जताई थी. 

भारत-वेनेजुएला संबंध कैसे रहे हैं

डेल्सी रोड्रिगेज, जो मादुरो के शासनकाल में उपराष्ट्रपति थीं, ट्रंप प्रशासन की मंजूरी से वेनेजुएला की वास्तविक नेता बन गईं. अमेरिका ने कठोर शर्तें रखीं कि तेल का निर्यात केवल अमेरिका या उन देशों को किया जा सकता है जिन्हें अमेरिका अनुमति देता है. रोड्रिगेज की यात्रा से संकेत मिलता है कि भारत ने इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है और नए नेतृत्व के साथ बातचीत के लिए तैयार है. यह भी संभव है कि ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला को भारत के साथ व्यापारिक संबंध विकसित करने के लिए भी प्रोत्साहित किया हो. परंपरागत रूप से, चीन वेनेजुएला के तेल का सबसे बड़ा आयातक रहा है.

वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक है, लेकिन इसका कच्चा तेल बहुत भारी होता है, जिसे हर रिफाइनरी में रिफाइन नहीं किया जा सकता है. केवल कुछ देशों के पास ही इस भारी तेल को रिफाइन करने की क्षमता है. भारत उनमें से एक है.

वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज पांच दिन की भारत यात्रा पर आई हैं.

वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज पांच दिन की भारत यात्रा पर आई हैं.
Photo Credit: PTI

रोड्रिगेज़ की यात्रा से भारत और वेनेज़ुएला के बीच चल रहे तेल व्यापार को महत्वपूर्ण गति मिलेगी. होर्मुज़ में जारी संकट को देखते हुए भारत ऊर्जा के सभी संभावित स्रोतों की तलाश कर रहा है. भारत अपने कच्चे तेल का करीब 87 फीसदी अन्य देशों से आयात करता है. इसका एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता था. लेकिन होर्मुज़ में जारी संकट के कारण फारस की खाड़ी से आयात बंद हो गया है. आशंका है कि अगर जल्द ही युद्धविराम भी हो जाता है, तो भी स्थिति को स्थिर होने में छह महीने लग सकते हैं.

कितनी बड़ी है भारत की ऊर्जा जरूरत 

इन परिस्थितियों में, भारत के लिए वैकल्पिक स्रोतों की खोज करना अनिवार्य है. वेनेज़ुएला के पास विशाल भंडार हैं. वह एक विश्वसनीय बाजार और अपने ऊर्जा अवसंरचना में निवेश के संभावित स्रोत की तलाश कर रहा है. भारत की ओएनजीसी विदेश और वेनेज़ुएला की पेट्रोलियम कंपनियों ने मिलकर तेल खोजने और उसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में रुचि दिखाई है. 

पिछले दो महीनों में भारत ने वेनेजुएला से भारी मात्रा में तेल खरीदा है. संभावना है कि यह रूझान जारी रहेगा. साल के अंत तक वेनेजुएला, रूस, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बाद भारत को कच्चे तेल का निर्यात करने वाले प्रमुख देशों में से एक बन सकता है. साल 2019 से पहले,वेनेजुएला के साथ मुख्य रूप से तेल का व्यापार करीब पांच अरब डॉलर का था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण 2025-26 में यह घटकर करीब 700 मिलियन डॉलर रह गया है. लेकिन अमेरिका द्वारा वेनेजुएला को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करने के लिए प्रोत्साहित करने और कुछ देशों के लिए प्रतिबंधों में ढील दिए जाने के कारण, भारत के साथ उसका तेल व्यापार नई ऊंचाई छू सकता है. इससे वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने में मदद मिलेगी, जो आवश्यक उत्पादों की गंभीर कमी का सामना कर रही है.

नेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के साथ. अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए वेनेजुएला को भारत का साथ जरूरी है.

नेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के साथ. अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए वेनेजुएला को भारत का साथ जरूरी है.
Photo Credit: PTI

कर्ज के दलदल में फंसे वेनेजुएला की भारत से उम्मीदें क्या हैं

अमेरिकी थिंक टैंक काउंसिल ऑफ फॉरेन रिलेशंस के मुताबिक वेनेजुएला पर करीब 170 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज है. इसमें से करीब 20 अरब डॉलर चीन का और पांच अरब डॉलर रूस का है. वेनेजुएला का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) मात्र 80 अरब डॉलर का है. इस सीमित आधार के साथ, उसे अपना कर्ज चुकाने में सालों लग जाएंगे. इसके अलावा, घरेलू राजनीति की अस्थिरता और अस्थिर अंतरराष्ट्रीय माहौल को देखते हुए, न तो अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और न ही निजी कंपनियां उस देश में बड़ा पूंजी निवेश करने को तैयार होंगी. वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में निवेश से केवल दीर्घकालिक रूप से यानी पांच से 15 सालों में ही लाभ मिलेगा. इन परिस्थितियों में,डेल्सी रोड्रिगेज के लिए सबसे बड़ी चुनौती निवेशक ढूंढना है.

भारत एक उपयुक्त विकल्प है, क्योंकि उसके पास संभावित निवेशक, एक विशाल ऊर्जा बाजार और भारी कच्चे तेल को रिफाइन करने की क्षमता वाली रिफाइनरियां हैं. यही कारण है कि डेल्सी रोड्रिगेज ने इस समय भारत का दौरा किया है. यह माना जा सकता है कि डेल्सी के इस दौरे को ट्रंप प्रशासन की मंजूरी मिली हुई है. 

ओएनजीसी विदेश लिमिटेड और रिलायंस जैसी भारतीय तेल कंपनियां तभी निवेश करने में रुचि दिखाएंगी जब उन्हें स्थिर राजनीतिक माहौल और दीर्घकालिक लाभ की गारंटी मिलेगी. अन्यथा, व्यापारिक संबंध केवल भारत द्वारा वेनेजुएला से कुछ तेल खरीदने, उसे रिफाइन करने और भारतीय या विदेशी बाजारों में बेचने तक ही सीमित रहेंगे. हालांकि, सरकार के बयानों से संकेत मिलता है कि नई दिल्ली तेल के निष्कर्षण (अपस्ट्रीम) और आपूर्ति (डाउनस्ट्रीम) दोनों क्षेत्रों में सहयोग चाहती है. इरादे तो अच्छे हैं, लेकिन क्रियान्वयन एक चुनौती बना रहेगा.

(डिस्क्लेमर: डॉक्टर राजन कुमार दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फार रसियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज में पढ़ाते हैं.इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उससे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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