राजनीति और पत्रकारिता में भाषा की नैतिकता के सारे नियम हो रहे ध्वस्त...

राजनीति और पत्रकारिता में भाषा की नैतिकता के सारे नियम ध्वस्त हो चुके हैं. किसने शुरूआत की और किसने कम या ज्यादा किया यह बहस बेमानी है. ऐसा नहीं है कि नियम और नैतिकता का इस्तेमाल बंद हो गया है.

नमस्कार मैं रवीश कुमार,राजनीति और पत्रकारिता में भाषा की नैतिकता के सारे नियम ध्वस्त हो चुके हैं. किसने शुरूआत की और किसने कम या ज्यादा किया यह बहस बेमानी है. ऐसा नहीं है कि नियम और नैतिकता का इस्तेमाल बंद हो गया है. इसका इस्तेमाल खासकर तब होता है जब जब किसी विरोधी को नोटिस भेजना होता है,मुकदमा करना होता है.प्राइम टाइम के इस एपिसोड में आप देखेंगे कि कैसे जिस आरोप को माइनॉरिटी हर दिल झेलती औऱ चुप रहना पड़ता है, उस तरह का आरोप एक दिन लग जाने पर दिल्ली के मुख्यमंत्री खुद को स्वीट आतंकवादी कहने लगते हैं. क्या अल्पसंख्य समुदाय पर इस तरह के आरोप के जवाब में राजनीतिक रुप से या मज़ाक के तौर पर यह छूट हो सकती है? और क्या तब खुद को स्वीट आतंकवादी कहने वाले केजरीवाल या कांग्रेस के ही नेता ऐसा कहने वाले माइनारिटी के किसी सदस्य के साथ खड़े होंगे? चुनावी राजनीति में आतंक और आतंकवादी के आरोप ने दोनों छोर के नेताओं को एक्सपोज़ कर दिया है. 

बताने की ज़रूरत नहीं कि आतंक के ये किस्से काल्पनिक नहीं हैं. इन घटनाओं की तबाही की वास्तिवकता ने दुनिया भर में दहशत पैदा की है और इसकी राजनीति भी. उस राजनीति के सारा आधार गलत नहीं कहा जा सकता लेकिन आतंक के नाम से ग़लत आधार पर भी राजनीति हुई है. इस्लामिक आतंकवाद का लेबल चिपका कर कई बेकसूर लोगों का एनकाउंटर कर दिया गया और देश तक पर हमला किया गया.आतंकवाद का संबंध धर्म से नहीं है, यह बात भी साबित हुई लेकिन आतंक का संबंध धर्म से जोड़ना बंद नहीं हुआ. टाइम पत्रिका ने म्यानमार को लेकर अपने कवर पर द फेस ऑफ बुद्धिस्ट टेरर लिखा तो काफी नाराज़गी हुई, भारत में भी कई बार हिन्दू आतंकवाद का इस्तमाल होता है तो नाराज़गी होती है औऱ बयान वापस लेना पड़ता है, केस हो जाता है.

कई साल पहले हिन्दू आतंकवाद कहने पर कांग्रेस नेता सुशील शिंदे को माफी मांगनी पड़ी थी. इस्लामिक आतंकवाद के इस्तेमाल से भी लोग नाराज़ होते हैं मगर इसका इस्तेमाल कभी बंद नहीं होता है.भारत में गोदी मीडिया के उभार के साथ सरकार से सवाल करने वालों को पाकिस्तान परस्त कहा गया, पाकिस्तान का इस्तेमाल आतंकवाद के बदले भी होता रहा. 2014 के बाद कांग्रेस और उसके नेताओं को खुलकर पाकिस्तान परस्त और आतंकवाद का समर्थक बताया गया, बाकी दल चुप रहे, अब उन दलों को भी आतंकवाद का समर्थक बताया जाने लगा है और खास बात यह है कि आतंक का लेबल चिपकाने वालों में कांग्रेस भी शामिल हो गई है.   

इन आरोपों के पीछे तथ्य क्या है, इसे लेकर किसी को मतलब नहीं है, आरोप लगाकर किसी के बारे में धारणा बना देना ही राजनीति हो गई है. इसका भी एक बैकग्राउंड है. आप जानते हैं कि नेताओं के बनाए इसी धारणा के कारण आतंकी बताकर कितने बेकसूर नौजवानों का एनकाउंटर कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने कितने ही नौजवानों को बीस बीस साल जेल में रहने के बाद बेकसूर पाया है और बरी किया है. कोई नेता इन बेकसूर नौजवानों के पास तक नहीं फटकता है. न ही पुलिस की इस हिंसा पर बोलता है. जब खुद पर आरोप लगता है तो नेता लोग आहत हो जाते हैं. जिस तरह से पुलिस के लिए किसी को आतंक के नाम पर मार देना खेल हो गया है उसी तरह नेताओ के लिए किसी को आतंकी बता देना खेल हो गया है.दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने आतंकवाद के समर्थक होने के आरोप के जवाब में खुद को स्वीट आतंकवादी कह दिया है.

क्या इस तरह के आरोप लगने पर माइनॉरिटी का कोई सदस्य खुद को स्वीट आतंकवादी कह सकता था? और कहता तो उसके बचाव में केजरीवाल सामने आते? नहीं आते. क्योंकि किसी को आतंकवादी कहना और खुद को स्वीट आतंकवादी कहना, मेजोरिटी यानी बहुसंख्यक धर्म के लोगों का खेल बन चुका है. जिस किसी को यह मास्टर स्ट्रोक लग रहा होगा उसे सोचना चाहिए कि भाषा में आतंक क्या इतना नार्मल हो जाएगा, कि स्वीट हो जाएगा,नमकीन हो जाएगा?  कहीं बच्चे स्वीट आतंकवादी और गोल्डी आतंकवादी का गुट बनाकर गेम न खेलने लग जाएं. क्या पता अगले चुनाव में कोई मुख्यमंत्री खुद को शुगर फ्री आतंकवादी कहने लगें. दर्शक, पाठक और मतदाता के बीच आतंकवाद का जो मूल मतलब है वह हिंसा और दहशत से जुड़ा है लेकिन उसकी जगह तू तू मैं मैं वाला आतंकवाद लाया जा रहा है.

आप ही बताइये क्या पुष्पा जो कि लक़ड़ी के तस्कर का किरदार है, तस्करों के गिरोह में काम करने वाला पुष्पा उस गिरोह का सरदार हो जाता है लेकिन हमारी राजनीति में नेता पुष्पा के फोटो पर अपना फोटो चिपका कर हीरो बन रहे हैं. क्या अलग अलग दलों के समर्थकों को अपने नेता को हीरे के रुप में प्रचारिक करने के लिए तस्कर का ही किरदार मिला? कांग्रेस समर्थकों का पुष्पा बीजेपी पर हमला करता है तो बीजेपी समर्थकों का पुष्पा कांग्रेस पर. इसी तरह सपा के समर्थक भी अखिलेश को पुष्पा बनाते हैं और आम आदमी पार्टी के नेता केजरीवाल को भी पुष्पा बनाया जा रहा है. जिन्होंने फिल्म नहीं देखी, कहानी नहीं जाना वो भी पुष्पा को जानते हैं और वीडियो वायरल कर रहे हैं. यही नहीं पुलिस से लेकर सूचना प्रसारण मंत्रालय भी पुष्पा के थीम पर प्रचार सामग्री बनाने लग जाता है. राजनीति में पुष्पा मर्दाना ताकत का चैंपियन बन जाता है. 

इस तरह अब जो भी नया थीम लांच करेगा उसे सब मिलकर हड़प लेते हैं और एक दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करते हैं.किसी के पास अपनी भाषा नहीं बची है. यही दो मिनट के वीडियो औऱ उसकी भाषा का कमाल है कि आपको सोचने और जानने से दूर रखा जाता है.केवल देख कर यकीन करने की ट्रेनिंग दी जा रही है. पंजाब और यूपी में आतंकवादी का समर्थक बताने के बयानों को गंभीरता से देखिए. किस तरह से लोग चाहते हुए भी और नहीं चाहते हुए भी एक धर्म को टारगेट करने लग जाते हैं. प्रियंका गांधी का बयान ग़ौर से सुनिए. प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री केजरीवाल का संबंध आर एस एस से बताना चाहती हैं लेकिन उस क्रम में छोटे मियां और बड़े मियां का इस्तेमाल करती हैं.आर एस एस से निकले दो लोगों को छोटे मिया और बड़े मियां कह रही हैं. 

छोटे मियां और बड़े मियां मुहावरा है. अब कहीं आर एस एस को बुरा न लगे कि उसके लिए छोटे मियां और बड़े मियां का इस्तेमाल हो रहा है. वैसे असम से लेकर गुजारत की राजनीति में मियां का इस्तेमाल याद कीजिए. जब नरेंद्र मोदी मियां मुशरर्फ कहते थे तब उसकी ध्वनि सीमा के पार के अलावा सीमा के भीतर किस तरह गूंजती थी. असम की राजनीति में मियां का ज़िक्र कैसे आता है. 2014 में प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली की सरकार को दिल्ली सल्तनत औऱ राहुल गांधी को साहबजादा कहा करते थे. इस बात को लेकर सतर्क रहने की ज़रूरत है कि एक समुदाय को टारगेट करने के लिए प्रधानमंत्री और बीजेपी ने जिस भाषा संसार की रचना की है, कांग्रेस या केजरीवाल उसी भाषा से अपने राजनीतिक हथियार तो नहीं चुन रहे हैं?

इन जुमलों के आगमन,प्रचलन, समापन और पतन के हिसाब से देखा जा सकता है. कई बार बार विरोधी दल उन जुमलों को हड़प लेते हैं. दिल्ली के चुुनाव में केजरीवाल को भगोड़ा बनाने के लिए मफलर मैन का जुमला लाया गया लेकिन केजरीवाल ने मफलर मैन को गले लगाकर खुद को हीरो बना लिया. कई बार जुमलों के ज़रिए नेता की छवि को लंबे समय के लिए ध्वस्त कर दिया जाता है. बीजेपी ने राहुल गांधी को पप्पू कहना शुरू किया, इस एक अभियान से राहुल को उबरने में लंबा समय लग गया बल्कि आज तक संघर्ष कर रहे हैं. जवाब में राहुल ने प्रधानमंत्री पर सूट बूट की सरकार से लेकर फेंकू तक का जुमला चिपका दिया. इन दिनों पप्पू और फेंकू दोनों का इस्तेमाल घट गया है.इन सब उदाहरणों के बावजूद जुमलों से हमला करने के मामले में बीजेपी सबसे आगे रही है. बल्कि इस मामले में मुख्यधारा बीजेपी ही बनाती है. उसका यही आत्मविश्वास था कि प्रधानमंत्री ने एक नया शब्द गढ़ दिया आंदोलनजीवी. 

“ये सारे आंदोलनजीवी परजीवी होते हैं. और यहाँ पर सबको मेरी बात से आनंद इसलिए हो रहा होगा क्योंकि आप जहाँ जहाँ सरकारें चलाते होंगे आपको ऐसे परजीवी आंदोलनजीवी का अनुभव होता होगा.”लोकसभा के मंच से जब आंदोलनजीवी और परजीवी लांच हुआ तब लगा कि कोई बड़ा तीर चल गया है. तालियों से स्वागत हुआ था लेकिन प्रधानमंत्री को भी पता नहीं होगा कि 8-9 महीनों के भीतर यह शब्द अपनी हार देखेगा.ज़रूरत पड़ी तो यहाँ से लेकर- फरवरी 2021 में आंदोलनजीवी आया था किसान आंदोलन को दागदार करने के लिए.

उन्हें फालतू और नकारा बताने के लिए आंदोलनजीवी लांच हुआ लेकिन उसी साल नवंबर में जब कृषि कानून वापस लिए गए तब प्रधानमंत्री ने अपने फैसले को राष्ट्रहित में बताया. इसलिए नेता जब शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तब उन्हें लगता है तीर मार लिया लेकिन उन्हें भी पता नहीं होता कि तीर निशाने पर लगेगा या लौट कर आ लगेगा.इस तरह से आंदोलनजीवी की हार हुई और आंदोलन करने वाले जीत गए. लेकिन जीवी प्रत्यय से जुमलों का गढ़ना बंद नहीं हुआ. यूपी के चुनावों में जीवी की तर्ज पर तरह तरह के वादी और धारी और बाज़ी का ज़िक्र हो रहा है. यूपी के हिन्दी के अखबारों में बीजेपी को लेकर जो हेडलाइन बनी है, पिछले दो महीनों में उसके शब्दों को लेकर शोध होना चाहिए. 

हिन्दी अख़बारों में बीजेपी से संबंधित ज़्यादातर ख़बरों में माफिया, गुंडा, बम, बंदूक, तमंचा, बाहुबली, बम-बम, बजरंगबली, माफिया की हवेली,आतंकी, दंगा, दंगाई, बुलडोजर, पलायन, तुष्टीकरण कब्रिस्तान का इस्तमाल होता है. कई दिन तक एक ही तरह की हेडलाइन छपी, जिससे संदेह पैदा होने लगा कि कहीं भाषण लिखने वाला और हेडलाइन लिखने वाला एक ही तो नहीं है. दूसरा चऱण आते आते इसमें बदलाव आता है. माफिया से माफियागंज हो जाता है. तमंचा से तमंचाधारी और तमंचावादी,दंगा से दंगावादी,परिवार से परिवारवादी,गुंडा से गुंडावादी, हो जाता है. बम से बमबाज़ी हो जाता है. बीजेपी इनके सहारे केवल समाजवादी पार्टी औऱ अखिलेश यादव को टारगेट नहीं करती बल्कि उनके सामाजिक आधार को भी टारगेट करती है. माफिया से मुसलमानों को टारगेट किया जाता है.

अमित शाह और बीजेपी के दूसरे नेता जल्दी ही माफिया का मतलब भी बता देते हैं. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान माफिया का मतलब बताते हुए केवल मुस्लिम अपराधियों का नाम लेते हैं. मुरादाबाद की सभा में गृह मंत्री अमित शाह निज़ाम का मतलब बताते हुए मुस्लिम नामों का ही सहारा लेते हैं.'NIZAM' का मतलब शासन होता है. लेकिन अखिलेश यादव के लिए 'N' मतलब नसीमुद्दीन, 'I' मतलब इमरान मसूद, 'ZA' मतलब आजम खान और 'M' मतलब मुख्तार अंसारी है. मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि आपको अखिलेश का निजाम चाहिए या योगी-मोदी का विकास निजाम?”

कभी माफिया तो कभी निज़ाम. उसके बाद अस्सी बनाम बीस फीसदी. ताकि लोगों को समझने के लिए मेहनत भी न करनी पड़े कि माफिया और बीस फीसदी किसे कहा जा रहा है. इस तरह से बीजेपी ने कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाने के नाम पर दोहरे अर्थे वाले जुमलों की खोज की, जिसके सहारे अखिलेश के मुख्यमंत्री काल के साथ साथ मुसलमानों को भी टारगेट किया जा सके. बेहद सावधानी से इस भाषा का चुनाव किया गया ताकि चुनाव आयोग की नज़र से भी बच जाएं.एक समाज लगातार माफिया कहा जाता रहा न राहुल आगे आए न अरविंद केजरीवाल न कोई और. खुद पर बात आई तो सब आहत हैं. अखिलेश यादव भी इसके जवाब में हमला करते हैं तब जाति के सहारे अपराधियों की लिस्ट बनाते हैं और बीजेपी पर उन अपराधियों के संरक्षक होने का आरोप लगाते हैं.

अखिलेश विकास दुबे के एनकाउंटर का नाम लेते हैं जिसका नाम बीजेपी नहीं लेती है. बीेजेपी विकास दुबे के एनकाउंटर का भी श्रेय ले सकती थी लेकिन नहीं लेती है. जबकि विकास दुबे भी एक माफिया था. सितंबर 2020 में महोबा के व्यापारी इंद्रकांत त्रिपाठी की हत्या होती है. इंद्रकांत ने आरोप लगाया था कि एसएसपी हर महीने छह लाख रिश्वत मांग रहे थे.जब हफ्ता देने से इंकार किया तो एस पी ने कथित रुप से जान से मार देने की धमकी दी. इंद्रकांत त्रिपाठी ने बकायदा वीडियो बनाकर कहा कि एसपी हत्या करवा सकते हैं औऱ इंद्रकांत की हत्या कर दी जाती है. आज तक एस पी माणिकलाल पाटिदार गिरफ्तार नहीं हो सके हैं. जो सरकार माफिया को खत्म करने का इतना श्रेय लेती है वह तो न विकास दुबे के एनकाउंटर की सफलता को भुनाती है और न इंद्रकांत त्रिपाठी की हत्या करने वाले आईपीएस को पकड़ पाती है, अखिलेश यह सब आरोप लगाते रहते हैं.

इस तरह से अपराध और कानून व्यवस्था का मुद्दा बनाने के क्रम में अपराधियों को धर्म और जाति के हिसाब से गिना जाने लगता है. जो नहीं गिने जाते हैं उनका भी आधार जाति और धर्म ही होता है. बस अपराधी के नाम पर बहुसंख्यक को टारगेट नहीं किया जाता है. इस तरह से एक समुदाय को माफिया, आतंक से जोड़ते जोड़ते आपके मन में उसकी ऐसी तस्वीर बना दी जाती है कि बिना किसी प्रक्रिया के उसके घर पर बुलडोजर चलवा देने की भाषा से आपको गुदगुदी होने लगती है. अभी हाल में इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपी. कानपुर में नागरिकता कानून के विरोध में हिंसा के नाम पर गरीब मज़दूरों को वसूली का नोटिस भेज दिया गया इनमें से ज्यादातर एक ही धर्म के थे. सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई है कि अदालत ने हर्जाना वसूलने की जो प्रक्रिया बनाई है उसका तक पालन नही हुआ है.

प्रधानमंत्री जब यूपी की कानून व्यवस्था की तारीफ करते हैं तब इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि बिना प्रक्रिया के किसी गरीब से हर्जाना वसूला जाता है.हमारा सवाल है कि क्या बुलडोजर का ज़िक्र सभी अपराधियों के संदर्भ में आता है या केवल एक धर्म विशेष के अपराधियों के संदर्भ में आता है? या उन्हे सुनने के लिए ऐसा कहा जा रहा है? 

एक और बदलाव आप नोट करेंगे.अभी तक एक दल किसी को दंगाई कहता था तो पलटकर वह दल भी कहने वाले को दंगाई कहता था. लेकिन इस बार केवल बीजेपी सपा को दंगाई कहे जा रही है. जैसे दंगे का कोई एक ही पक्ष होता है. दूसरा पक्ष होता ही नहीं है. दंगे को लेकर हवा बनाने वाले, हवा बना कर दंगे का माहौल बनाने वालों का ज़िक्र ही नहीं हो रहा है. आप कह सकते हैं कि अखिलेश यादव की भाषा में बीजेपी की तरह अतिक्रमण नहीं है लेकिन भाषा का खेल उनके यहां भी है. 

अखिलेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम लेते हैं तो नाम के पहले या बाद में धुआं का भी ज़िक्र करते हैं. यह धुआं किस चीज़ का है साफ साफ नहीं बताते हैं. अखिलेश बार बार बाबा कहते हैं और यह बताना नहीं भूलते कि उन्हें लैपटॉप चलाने नहीं आता. यह व्यंग्य हो सकता है लेकिन इसका मतलब ठीक नहीं है. क्या जिसे लैप टाप चलाने न आता हो वह अनुपयोगी है, फिर तो चुनावी वही लड़ेगा जो आई आई टी पास हो. अखिलेश कई बार गुंडों को सांड कहते हैं. इस तरह से बेचारा उपयोगी सांड पर गुंडा का लेवल चिपक जाता है जो कि ठीक नहीं है. सांड गुंडा कैसे हो सकता है. बेशक यूपी में सांड एक मुद्दा है और इससे किसान परेशान हैं. लेकिन जिस तरह से बीजेपी माफिया का इस्तमाल करती है उसी तरह से अखिलेश सांड का इस्तेमाल टू इन वन के रूप में करते हैं. जब योगी आदित्यनाथ माफिया और तमंचावाद कहते हैं तब अल्पसंख्यक वर्ग के कई लोगों को लगता है कि उन्हें टार्गेट किया जा रहा है. अखिलेश यादव उस तरह से योगी आदित्यनाथ को टारगेट करते हुए धर्म विशेष को टारगेट नहीं करते लेकिन एक जाति को टारगेट करते हैं. 

राजनीति की भाषा कई तरह की धारणाओं को मुख्यधारा में लाती है, उसे स्थापित करती है. इसे समय समय पर पहचानते रहिए. और अखबारों में देखते रहिए कि किस दल को किस तरह से जगह मिल रही है.  हिन्दी अखबारों में अखिलेश को तो थोड़ी बहुत जगह मिल रही है लेकिन बीजेपी की तुलना में बहुत कम. उससे भी कम जगह मिल रही है मायावती. अखिलेश और मायावती दोनों को बीजेपी की तुलना में बहुत कम जगह मिल रही है. कुछ साल बाद जब आप हिन्दी के अखबारों में यूपी के चुनावों पर रिसर्च करेंगे तो यही मिलेगा कि 2022 में केवल बीजेपी की रैली होती थी, केवल बीजेपी के नेता बोलते थे और केवल बीजेपी की हेडलाइन छपती थी. मायावती भी अपनी सभा में  गुंडा और माफिया को जेल भेजने की बात करती है लेकिन इस पर ज़ोर देने के साथ कि वे माफिया और गुंडा जाति और धर्म के हिसाब से तय नहीं करती हैं.जो गुंडा है वो गुंडा है जो माफिया है वो माफिया है. हिन्दू या मुसलमान नहीं है. 

यह कार्यक्रम भाषा पर है. बहुत कुछ छूट भी सकता है लेकिन एक शब्द का ज़िक्र ज़रुरी है. भीड़ का. क्या आपको विपक्ष की सभाओं के कवरेज में भीड़, जनसैलाब वगैरह का ज़िक्र पढ़ने को मिलता है?जब बीजेपी की रैली होती है तब भीड़ हो या न हो, गोदी मीडिया अपार भीड़, भारी भीड़ औऱ जन सैलाब ज़रूर लिखता है. चैनलों पर भीड़ के एंगल से वीडियो दिखाए जाते हैं.जब विपक्ष की बारी आती है तो अखबार की खबरों में भीड़ शब्द का इस्तेमाल नहीं होता है. जनसैलाब भी नहीं लिखा जाता है. चैनलों पर वैसे वीडियो कम ही दिखते हैं जिसमें विपक्ष की रैली में काफी भीड़ होती है. अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर मामलों में विपक्ष की रैलियों के समाचार को प्रस्तुत करते समय भारी भीड़ या जनसैलाब का इस्तमाल अब करीब करीब बंद हो गया है. बीजेपी की रैली में भीड़ नहीं होगी तो मंच की बड़ी तस्वीर छपेगी और भीड़ दिखे इसके लिए मंच पर जाकर उसकी तस्वीर ली जाती है.

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चरणजीत सिंह चन्नी ने जब यूपी और बिहार के लोगों के लिए भैया का इस्तेमाल किया तब उसकी आलोचना हुई. उनका बयान भी गलत था और सफाई भी. यूपी और बिहार के लोगों को टारगेट करने वाले बयानों की आलोचना में कभी देरी नहीं होती है लेकिन जब इसी तरह से एक समुदाय को टारगेट किया जाता है तब सब चुप रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने चन्नी के बयान की आलोचना की. उन्हें तब भी आलोचना करनी चाहिए थी जब यूपी के मुख्यमंत्री ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को ट्विटर पर सुनो केजरीवाल लिख दिया. प्रधानमंत्री तब भी चुप रहे जब केजरीवाल ने ट्विटर पर योगी आदित्यनाथ को सुनो योगी लिख दिया. राजनीति को जब आप भाषा के हिसाब से सचेत होकर देखेंगे तब आपके लिए किसी का समर्थक होना मुश्किल हो जाएगा. जब भाषा की नैतिकता समाप्त हो जाती है तब नागरिक होने का नैतिक बल भी समाप्त हो जाता है.