खाड़ी क्षेत्र में ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच जंग लगातार भीषण रूप ले रही है. मिसाइल हमले, तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक सुरक्षा की चिंता मीडिया पर छाई हुई है. लेकिन इसी बीच एक अहम मसला पूरी तरह से नजरअंदाज हो रहा है. यह मसला है, रूस-यूक्रेन युद्ध में भारतीय युवाओं को रूसी सेनाओं की तरफ से लड़ने के लिए मजबूर होना. लेकिन इस मुद्दे पर संसद, मीडिया या सोशल प्लेटफॉर्म्स पर कहीं भी कोई गंभीर चर्चा नहीं हो रही है. जबकि आधिकारिक आंकड़े चीख-चीखकर कह रहे हैं कि हमारे युवा विदेशी युद्ध की आग में झोंके जा रहे हैं.
रूस की सेना में कितने भारतीय भर्ती हुए थे
भारत सरकार ने संसद में जो रिपोर्ट दी, वह चौंकाने वाली है. फिर भी, युवाओं को बचाने के लिए अभी भी काफी कुछ करना बाकी है. सरकार की ओर से दिसंबर 2025 में राज्यसभा को सौंपी गई आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूसी सशस्त्र बलों ने कुल 202 भारतीय नागरिकों की भर्ती की. यह संख्या विदेश मंत्रालय की जांच और सूत्रों पर आधारित है. हालांकि कई स्वतंत्र सूत्रों का कहना है कि असली आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है, क्योंकि कई युवा परिवारों तक अपनी भर्ती की खबर नहीं पहुंचा पाते. इन 202 युवाओं में से 119 रूसी सेना से डिस्चार्ज होकर वापस लौट चुके हैं. करीब 50 अभी भी रूसी सेना में फंसे हुए हैं. इस युद्ध में 26 भारतीय शहीद हो चुके हैं, जबकि सात लापता हैं. ये आंकड़े सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा को दर्शाते हैं जिनके बेटे कभी वापस नहीं लौटे.
याद रखिए कि यह भर्ती कोई स्वैच्छिक सैन्य सेवा नहीं थी. भारतीय एजेंसियों की जांच से साफ पता चला कि ज्यादातर युवाओं को धोखा दिया गया या मानव तस्करी का शिकार बनाया गया. एजेंट्स ने रूस में हेल्पर, सिक्योरिटी गार्ड, निर्माण मजदूर या होटल वर्कर जैसी नौकरियों का लालच दिया. वेतन का वादा था– दो से तीन लाख रुपये प्रति माह, फ्री वीजा और रहने की सुविधा. ग्रामीण इलाकों के युवा, बेरोजगारी और गरीबी से तंग आकर इस जाल में फंस गए. वहां पहुंचते ही उन्हें जबरन सैन्य अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाए गए और यूक्रेन की फ्रंटलाइन पर भेज दिया गया. साल 2024 में एक बड़े तस्करी नेटवर्क का भंडाफोड़ किया गया. इसमें कम से कम 35 भारतीयों को नकली जॉब ऑफर देकर रूस भेजा गया था.
भारतीय युवा कैसे पहुंचे रूस
मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस जांच के मुताबिक ज्यादातर पीड़ित पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना से थे. इधर के युवा बेहतर भविष्य की तलाश में विदेश जाना चाहते हैं. एजेंट्स ने यूट्यूब, टेलीग्राम चैनल्स, व्हाट्सएप ग्रुप्स और स्थानीय ट्रैवल एजेंसियों के जरिए भ्रामक विज्ञापन चलाए. पर्यटक वीजा, हवाई टिकट और मॉस्को में ठहरने की व्यवस्था सब कुछ पहले से तय थी. बेसिक ट्रेनिंग के बाद इन युवाओं को यूक्रेन की खतरनाक फ्रंटलाइन पर तैनात कर दिया जाता. इन्हें आदेश न मानने पर धमकियां और सजा दी जाती है. पता चला है कि कई युवाओं ने बाद में बताया कि वे तो सिर्फ सिक्योरिटी गार्ड बनने गए थे, लेकिन उन्हें तोप के मुंह में धकेल दिया गया.
सरकार को इस मामले में प्रो-एक्टिव रोल निभाना चाहिए था.अगर उसके विभिन्न विभाग चौकन्ने होते तो इन नौजवानों के साथ धोखा ही ना होता. बहरहाल, विदेश मंत्रालय ने रूस से भारतीयों की भर्ती तुरंत रोकने का आग्रह किया. जिन युवाओं को फ्रंटलाइन पर भेजा गया था, उनकी वापसी के लिए कूटनीतिक बातचीत की गई. नतीजा यह हुआ कि 119 भारतीयों को डिस्चार्ज कर वापस लाया गया. पर इतना करना ही काफी नहीं है. हां, मानव तस्करी का धंधा करने वालों पर एक्शन भी हुआ और कई एजेंटों को गिरफ्तार किया गया.
युवाओं को फंसने से कैसे बचाया जा सकता है
खैर, अभी भी युवाओं को मौत के मुंह से जाने से रोकने के लिए पुख्ता कदम नहीं उठाए जा रहे हैं. सिर्फ रूस से अनुरोध करना या बाद में बचाव अभियान चलाना काफी नहीं है.समस्या की जड़ भारत में ही है– बेरोजगारी, नकली भर्ती एजेंटों का फलना-फूलना और सोशल मीडिया पर बिना चेक के चलने वाले विज्ञापन.
सरकार को अब सक्रिय रूप से आगे आना चाहिए. पहला कदम– केंद्र और राज्य सरकारें बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाएं. प्रभावित राज्यों के ग्रामीण इलाकों में कैंप लगाएं. यूट्यूब और टेलीग्राम पर फेक जॉब विज्ञापनों की पहचान के लिए विदेश मंत्रालय और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय मिलकर साइबर सेल बनाएं. हर विज्ञापन पर 'Verify before you apply' का मैसेज अनिवार्य किया जा सकता है.
दूसरा कदम – मानव तस्करी कानून को और सख्त बनाएं. विदेश में नौकरी दिलाने वाली भर्ती एजेंसियों पर सख्त लाइसेंसिंग और मॉनिटरिंग लागू करें. हर एजेंट को विदेश मंत्रालय से रजिस्टर्ड होना जरूरी बनाया जाए. नकली ऑफर देने वालों पर 10 साल की सजा और भारी जुर्माना लगाया जाए.
कितने युवा अभी भी लापता हैं
तीसरा कदम- रूस के साथ द्विपक्षीय समझौते में स्पष्ट प्रावधान डालें कि कोई भी भारतीय नागरिक बिना भारतीय दूतावास की मंजूरी के रूसी सेना में नहीं भर्ती होगा. लापता सात युवाओं की खोज के लिए संयुक्त टास्क फोर्स बनाई जाए. अभी भी 50 युवा रूस में फंसे हुए हैं,सरकार उनकी सुरक्षित वापसी को सर्वोच्च प्राथमिकता दें.
चौथा कदम – घरेलू स्तर पर समाधान. बेरोजगारी कम करने के लिए स्किल इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को इन राज्यों पर फोकस करें. इसके साथ ही युवाओं को भी समझना होगा कि वे देश से बाहर नौकरी के लिए जाने से पहले दस बार सोच लें. मुझे कुछ साल पहले सिंगापुर में लिटिल इंडिया एरिया के कई रेस्तरांओ में बहुत से हिन्दुस्तानी नौजवान रेस्तरांओं में सर्विस करते हुए मिले. कुछ गॉर्ड भी थे. बातचीत में लगभग सबने कहा कि उन्होंने यहां आने के लिए अपने परिवारों की जमीनें तक बेंची. मतलब इतना कुछ खोने के बाद भारत से बाहर छोटी-मोटी नौकरी करने का क्या मतलब है. ऐसे अगर सरकार ऊपर दिए गए सुझावों पर अमल करती है तो भारत के युवा धोखे से बच सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)