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भारत सरकार ने माओवादियों को कैसे किया परास्त, क्या चाहते थे आदिवासी माओवादी

Shubhranshu Choudhary
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 31, 2026 10:42 am IST
    • Published On मार्च 31, 2026 10:26 am IST
    • Last Updated On मार्च 31, 2026 10:42 am IST
भारत सरकार ने माओवादियों को कैसे किया परास्त, क्या चाहते थे आदिवासी माओवादी

मैं अभी-अभी कुतुल से लौटा हूं, जो दंडकारण्य के अबूझमाड़ क्षेत्र में माओवादियों की अघोषित राजधानी रहा है. अब सरकार ने देश को माओवादी मुक्त घोषित कर दिया है. माओवादियों ने 1980 से लेकर करीब 45 साल से अधिक समय तक करीब 20 हजार वर्ग किलोमीटर के ऐसे ही इलाके को 'मुक्त क्षेत्र' कहकर अपनी पकड़ बनाए रखी थी. 

मैं बदलाव देखना चाहता था.  15 साल पहले मैं माओवादियों के साथ पैदल कुतुल गया था, वह यात्रा एक महीने से अधिक चली थी. इस बार हमारी चार पहिया गाड़ी कुतुल तक पहुंच गई, हालांकि सड़क अभी भी निर्माणाधीन है. कुतुल में पिछले जनवरी से मोबाइल कनेक्टिविटी आ गई है. साप्ताहिक बाजार लोगों से भरा हुआ था. इमली और महुआ के साथ यीशु की तस्वीरें भी बिक रही थीं. 

छत्तीसगढ़ में कैसे सफल हुआ माओवादियों के खिलाफ अभियान

रास्ते में मेरी मुलाकात जिले के पुलिस प्रमुख से हुई. झारखंड के खूंटी जिले के एक युवा आदिवासी अधिकारी रॉबिन्सन गुरिया प्रभावशाली व्यक्तित्व के हैं. मैंने उनसे पूछा कि इस जीत का कारण क्या है. उन्होंने तुरंत जवाब दिया, ''80 फीसदी मानव खुफिया (Human Intelligence) और 20 फीसदी बाकी सब.'' बाकी में अमित शाह का नेतृत्व, डबल इंजन सरकार, ड्रोन, पैसा, सैटेलाइट, जिला रिजर्व गार्ड के स्थानीय आदिवासी लड़के-लड़कियां और केंद्रीय बल सब शामिल हैं, उन्होंने कहा.

रॉबिन्सन IIT कानपुर से स्नातक हैं. उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने पूर्व बॉस (जो IIT खड़गपुर से थे) के साथ मिलकर एक सॉफ्टवेयर बनाया था, जो आने वाली सारी खुफिया सूचनाओं को प्रोसेस करता है. लेकिन यह 'मानव खुफिया' क्या है? और इसने यहां सब कुछ कैसे बदल दिया?

रॉबिन्सन द्वारा मिलवाए गए आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों ने बताया,''यह बदलाव 2012-13 से शुरू हुआ, जब क्षेत्र की सामूहिक आदिवासी चेतना ने महसूस किया कि अब पार्टी छोड़ने का समय आ गया है.''उन्होंने बताया ''इस पर पार्टी मंचों में भी चर्चा हुई, लेकिन नेतृत्व बदलाव के लिए तैयार नहीं हुआ,''  उन्होंने कहा, ''तब से स्थानीय आदिवासी पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने लगे. पहले वे पुलिस के पास नहीं जाते थे, बल्कि समाज में ही वापस मिल जाते थे. यह बदलाव पार्टी ने स्वीकार नहीं किया जिससे आम लोग पुलिस को जानकारी देने से डरते थे. लेकिन यह स्थिति पुलिस कैंपों के प्रसार के बाद बदली.''

आदिवासी कैडरों का अपने नेताओं के नाम पत्र में क्या था

माओवादी इलाकों में पुलिस कैंपों का जाल बिछाने की नीति पुरानी है, लेकिन अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद इसमें तेजी आई, जिसने बड़ा फर्क डाला. एक और कहानी यह भी है कि एक पत्र में जिसमें इन पुलिस कैंपों को कारण बताते हुए पार्टी से रणनीति बदलने की अपील की गई थी, जिसका भी इस जीत में बड़ा असर पड़ा.

16 जनवरी 2024 को माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में एक नए कोबरा कैंप पर बड़ा हमला करने की योजना बनाई थी. कोबरा (CRPF की विशेष इकाई) इन दूरस्थ इलाकों में कैंप स्थापित कर रही थी. माओवादियों का उद्देश्य था—धर्मावरम कैंप पर बड़ा प्रतीकात्मक हमला कर कैम्प लगाने की नीति को रोकना. हमला असफल रहा. लेकिन इससे दक्षिण और पश्चिम बस्तर के सभी आदिवासी कमांडरों को लंबे समय बाद एक साथ बैठने का मौका मिला. उन्होंने एक-दूसरे को अपने बुजुर्गों की बातें बताईं कि अब संघर्ष समाप्त करने का समय आ गया है.

क्या चाहते थे आदिवासी माओवादी

दंडकारण्य के माओवादी आंदोलन के इतिहास में पहली बार आदिवासियों ने अपने कमांडर मड़वी हिड़मा के नेतृत्व में केंद्रीय समिति को एक संयुक्त पत्र लिखा. इस पत्र में कहा गया था, ''पुलिस कैंपों की बढ़ती संख्या के कारण लोगों तक पहुंचना कठिन हो रहा है. लोगों के लिए पार्टी की मदद करना भी मुश्किल हो गया है. ऐसी स्थिति में हम पार्टी से वैकल्पिक रणनीति पर विचार करने का आग्रह करते हैं. हम मानते हैं कि कुछ समय के लिए हथियार छोड़कर बाद में संघर्ष को फिर शुरू करना चाहिए.''
मार्च 24 को केंद्रीय समिति ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया. 

मड़वी हिड़मा को पार्टी के दक्षिण और पश्चिम के अलावा अन्य माओवादी संगठनों से भी राय लेने का जिम्मा दिया गया. गुरिल्ला परिस्थितियों में समय लगा, लेकिन साल के अंत तक अधिकांश संगठनों ने इस पत्र का समर्थन किया. केंद्रीय समिति के प्रवक्ता वेणुगोपाल पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पत्र के पक्ष में झुकाव दिखाया. उन्होंने बताया कि महासचिव बसवराजू भी इसके बाद सहमत हुए, हालांकि अन्य नेता इसे नकारते हैं. लेकिन मुझे मालूम है कि यहां वेणुगोपाल सही हैं, क्योंकि इसके बाद बसवराजू ने छत्तीसगढ़ में शांति के लिए काम कर रहे समूहों से भी संपर्क किया था. इन बैठकों में मड़वी हिड़मा भी शामिल थे.

एक पत्र से बढ़ा हिड़मा का कद

इस पत्र से हिड़मा का कद पार्टी में बढ़ गया. उन्हें केंद्रीय समिति में शामिल किया गया. इसी दौरान बसवराजू की हत्या हुई, जो इन प्रयासों के लिए बड़ा झटका थी. शांति समर्थक गुट पर आरोप लगा कि उन्होंने पुलिस को जानकारी दी, जबकि उनका कहना है कि आम लोगों ने ही इन चर्चाओं के संकेत पाकर पुलिस का सहयोग शुरू कर दिया था. 

इस बीच छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री के साथ बातचीत शुरू हुई. लेकिन हिड़मा वेणुगोपाल द्वारा केवल तीन बिंदुओं (जो मुख्यतः आत्मसमर्पण के बाद के जीवन से जुड़े थे) पर ही सहमति से नाराज हो गए, क्योंकि इसमें आदिवासी अधिकारों का मुद्दा शामिल नहीं था जिन्हें भी चर्चा के मुख्य बिंदु के रूप में भेजा गया था. लेकिन वेणुगोपाल ने आत्मसमर्पण कर दिया और बहुत अन्य भी उनके पीछे चले. लेकिन हिड़मा अधिकांश लड़ाकों के साथ अलग हो गए. इसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी इस आंतरिक संघर्षों से कमजोर हो गई और अंततः उसका पतन हो गया, जैसा रॉबिन्सन जी 'मानव खुफिया'' से संकेत दे रहे थे जिसके कारण कई पुलिसिया सफल हमले हुए.

अब भी कई रहस्य हैं, जैसे कि हिड़मा को तब क्यों मार दिया गया जब वह 'आत्मसमर्पण और आदिवासी अधिकारों पर बातचीत' की पेशकश कर रहे थे. उनका अंतिम पत्र उसी दिन पहुंचा था जिस दिन वे मारे गए. आंध्र पुलिस का कहना है कि वे मुठभेड़ में मारे गए, जबकि माओवादियों का दावा है कि उन्हें पकड़ने के बाद मारा गया.  हिड़मा भविष्य के नेता हो सकते थे जो पिछले दो साल से शांति की दिशा में प्रयास कर रहे थे. उनकी मृत्यु बस्तर के भविष्य के लिए बड़ा आघात थी. 

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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