21वीं सदी के पहले 25 साल का अनुभव आज हमें एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर ले आया है. आज भारत न केवल तकनीक का अनुसरण कर रहा, बल्कि वैश्विक पटल पर उसके भविष्य की दिशा भी तय कर रहा है. एक अप्रैल से शुरू होने वाले नए वित्त वर्ष के बजटीय प्रावधानों और नीतियों पर गौर करें, तो स्पष्ट होता है कि हम एक नए 'देशकाल' में प्रवेश कर चुके हैं. इस नए युग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता' (Artificial Intelligence) के मोर्चे पर केंद्र और राज्य सरकारें जिस तरह एक साझा विजन के साथ खड़ी हैं, वह भारत के मजबूत होते 'सहकारी संघवाद'की एक गौरवशाली कहानी बयान करता है.
हाल ही में दिल्ली में संपन्न हुए 'ग्लोबल एआई समिट' में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एआई को 'मानव-केंद्रित' दिशा देने का आह्वान किया, तो यह केवल एक सुझाव नहीं, बल्कि दुनिया के लिए भारत की एक स्पष्ट वैचारिक घोषणा थी. इस सम्मेलन में जिस तरह राज्यों और निजी क्षेत्र की उत्साही भागीदारी रही, उसने एक आत्मविश्वास से भरे 'नए भारत' का परिचय दिया. 'स्टैनफोर्ड ग्लोबल एआई वाइब्रेंसी रिपोर्ट 2025' में एआई प्रतिस्पर्धात्मकता के मामले में भारत का तीसरे स्थान पर होना और गिटहब (GitHub) पर एआई परियोजनाओं में हमारा दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता बनना, यह सिद्ध करता है कि भारत अब तकनीक का मात्र उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता बनने की मुस्तैदी दिखा रहा है.
'इंडिया एआई मिशन'का बजट कितना है
केंद्र सरकार ने इस साल के बजट में 'इंडिया एआई मिशन' के लिए 10 हजार 372 करोड़ रुपये का आबंटन कर अपनी मंशा साफ कर दी है. इस मिशन का केंद्र बिंदु देश के भीतर 10 हजार से अधिक ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) की कंप्यूटिंग क्षमता विकसित करना है, जो एआई मॉडल्स के प्रशिक्षण के लिए ऑक्सीजन का काम करती है. 'एआई फॉर ऑल' के विजन के साथ कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा में विशेष एआई केंद्रों की स्थापना की योजना, इस तकनीक को आम आदमी के जीवन से जोड़ने की एक गंभीर कोशिश है.
राहत की बात यह है कि केंद्र के इस 'मैक्रो विजन' को धरातल पर उतारने के लिए राज्यों ने भी अपने खजाने खोल दिए हैं. गुजरात इस मामले में फिर से अग्रणी बनकर उभरा है. मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की सरकार ने गिफ्ट सिटी के विस्तार और नई आईटीईएस नीति के माध्यम से एआई क्षेत्र में वैश्विक निवेश को आकर्षित करने पर जोर दिया है. गुजरात का लक्ष्य एआई को विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला के साथ एकीकृत कर औद्योगिक उत्पादकता में अपनी बादशाहत कायम रखना है.
वहीं, दक्षिण में आंध्र प्रदेश एक अलग ही महत्वाकांक्षा के साथ आगे बढ़ रहा है. मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने अमरावती को 'भविष्य की एआई राजधानी' बनाने का संकल्प लिया है. गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ समझौते और कौशल विकास केंद्रों को 'एआई स्किलिंग लैब' में बदलना यह सुनिश्चित करता है कि राज्य का कार्यबल आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहे. आंध्र प्रदेश की रणनीति हर नागरिक को 'एआई-साक्षर' बनाने की है, जो समावेशी विकास का एक बेहतरीन उदाहरण है.
कहां बनेगी देश की पहली एआई सिटी
उत्तर प्रदेश की बात करें तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में देश की पहली 'एआई सिटी' के निर्माण को अपने बजट की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया है. यूपी सरकार को भरोसा है कि राज्य को 'एक ट्रिलियन डॉलर' की अर्थव्यवस्था बनाने में यह एआई सिटी एक इंजन का काम करेगी. साथ ही, नोएडा को ग्लोबल डेटा सेंटर हब के रूप में विकसित करना एआई एल्गोरिद्म की प्रोसेसिंग क्षमता को नई शक्ति देगा.
तकनीकी नवाचार की यह बयार बिहार जैसे राज्यों तक भी पहुंची है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार अब पारंपरिक कृषि और श्रम-आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर अपनी नई आईटी पॉलिसी के जरिए प्रशासनिक सुधार की ओर बढ़ रहा है. एआई के माध्यम से राजस्व संग्रह में पारदर्शिता और बाढ़ प्रबंधन जैसे जटिल संकटों का समाधान खोजने के लिए बजट में विशेष प्रावधान किए गए हैं.
नेlतृत्व करने को तैयार है भारत
कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे स्थापित आईटी हब अब 'जेनरेटिव एआई' पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. कर्नाटक का 'एआई-एज फंड' सामाजिक समस्याओं के समाधान तलाश रहे उद्यमियों की मदद कर रहा है. वहीं महाराष्ट्र सरकार मुंबई और पुणे में एआई डेटा केंद्रों के लिए बिजली सब्सिडी और स्टांप ड्यूटी में छूट दे रही है. तमिलनाडु की 'एआई फॉर तमिल' जैसी पहल इस तकनीक को भाषाई बाधाओं से मुक्त कर आम जन तक पहुंचाने का काम कर रही है.
यह देखना सुखद है कि भारत के संघीय ढांचे में राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, विकास के इस नए आयाम पर सभी राज्य एकजुट हैं. विचार, भूगोल और परंपरा की विविधताओं के बीच कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे आधुनिक क्षेत्र में भारत की यह साझा यात्रा केवल आर्थिक प्रगति का मार्ग नहीं है, बल्कि यह उस 'नए भारत' का आत्मपरिचय है जो विश्व पटल पर नेतृत्व करने को आतुर है.
(डिस्क्लेमर: लेखक देश की राजनीति पर पैनी नजर रखते हैं. वो राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)