- अमेरिका की परमाणु पनडुब्बी ने श्रीलंका के पास ईरानी युद्धपोत IRIS डेना को टॉरपीडो से मार गिराया
- ये घटना दिखाती है कि भारत के पास किस चीज की कमी है और उसे सबसे ज्यादा जरूरत किसकी है
- भारत 1988 से रूस से हमलावर परमाणु पनडुब्बियां (SSN) पट्टे पर लेकर अपना काम चला रहा है
अमेरिका की एक परमाणु पनडुब्बी ने बुधवार को श्रीलंका के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में टॉरपीडो से हमला करके ईरानी युद्धपोत IRIS डेना को मार गिराया. दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह पहला मौका था, जब किसी अमेरिकी पनडुब्बी ने दुश्मन के जहाज को डुबोया. भारतीय नौसेना पर नजर रखने वालों का मानना है कि भारत के लिहाज से ये बहुत ही असाधारण और असुविधाजनक स्थिति है. ये घटना दिखाती है कि भारत के पास किस चीज की कमी है और उसे सबसे ज्यादा जरूरत किसकी है.
भारत से लौट रही पनडुब्बी पर हमला
विडंबना यह है कि IRIS डेना ने डूबने से कुछ ही दिन पहले विशाखापत्तनम में भारत के 'मिलन 2026' युद्धाभ्यास में हिस्सा लिया था और ईरान वापस लौट रहा था, लेकिन उससे पहले ही हिंद महासागर में शिकारी सबमरीन ने उसे अपना शिकार बना लिया और समंदर की गहराइयों में गायब हो गई. परमाणु पनडुब्बी की यही ताकत है, जो दुश्मन के दिलों में खौफ पैदा कर देती है. चीन और अमेरिका इस ताकत को अच्छे से समझते हैं. वहीं हिंद महासागर का प्रमुख देश भारत फिलहाल किनारे पर बैठा यह सब होते हुए देख रहा है.

पनडुब्बी बेड़े की चिंताजनक स्थिति
- 2026 तक भारतीय नेवी के पास केवल 16 पारंपरिक (डीजल-इलेक्ट्रिक) पनडुब्बियां हैं.
- इनमें से छह फ्रांस की कलवरी क्लास स्कॉर्पीन हैं, जिन्हें 2017 से 2025 के बीच शामिल किया गया.
- 4 जर्मनी में बनी शिशुमार क्लास सबमरीन हैं, जिनकी लाइफ बढ़ाने का काम चल रहा है.
- बाकी 6 रूसी मूल की सिंघुघोष क्लास किलो सबमरीन हैं.
- रूसी मूल की सिंधुघोष को दिसंबर 2025 में 40 साल की सेवा के बाद रिटायर कर दिया गया था.
- इस क्लास तीन अन्य पनडुब्बियां पहले ही या तो खो चुकी हैं या रिटायर हो चुकी हैं.
- ऐसे में 2030 तक 24 पनडुब्बियों का भारत का लक्ष्य हकीकत से दूर ही दिखता है
प्रोजेक्ट 75-इंडिया दशकों से देरी का शिकार
प्रोजेक्ट 75-इंडिया जिसके तहत जमीन पर मिसाइल अटैक की क्षमता वाली, नई तकनीक से लैस 6 पनडुब्बियां बनाई जानी हैं, दशकों से देरी का शिकार है. 1990 के दशक में इनकी परिकल्पना की गई थी, जिनकी डिलीवरी कई बार देरी के बाद जनवरी 2026 तक होनी थी, लेकिन वो इतनी लेट हो चुकी हैं कि डिफेंस सर्कल में एक तरह की पंचलाइन बन चुकी हैं.
2030 से पहले अगली पनडुब्बी नहीं
जनवरी 2026 तक मझगांव डॉक और जर्मनी के थाईसेनक्रूप मरीन सिस्टम्स के बीच बातचीत ही चल रही थी. मौजूदा वित्त वर्ष के आखिर में समझौते की उम्मीद है. अगर अब समझौता होता भी है तो पहली पनडुब्बी 2030 के दशक के मध्य से पहले नहीं आ पाएगी. स्कॉर्पीन क्लास की तीन अतिरिक्त पनडुब्बियां बनाने की डील पिछले साल मार्च में होनी थी, लेकिन अभी तक अधर में है. भारत की स्वदेशी एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक भी समय पर तैयार नहीं हो सकी, जिससे आईएनएस कलवरी को सुधारा जाना है.

पट्टे पर परमाणु पनडुब्बियों से चल रहा काम
परमाणु पनडुब्बियों के मामले में तो भारत की स्थिति और भी अजीब है. 1988 से भारत रूस से हमलावर परमाणु पनडुब्बियां (SSN) पट्टे पर ले रहा है. चार्ली क्लास की आईएनएस चक्र-I बोट 1991 में वापस जा चुकी है. 2012 में आई अकुला क्लास की चक्र-2 सबमरीन 2021 में चली गई. अकुला क्लास की चक्र-III पनडुब्बी के लिए 2019 में 3 अरब डॉलर की डील हुई थी, लेकिन रूस यूक्रेन युद्ध की वजह से अब इसके 2028 से पहले आने की उम्मीद नहीं है. भारत पिछले चार दशक से परमाणु क्षमता वाली हंटर सबमरीन किराए पर लेकर काम चलाता आ रहा है. इनका ज्यादातर इस्तेमाल क्रू को ट्रेनिंग देने में हो रहा है. इन पर हथियार लगाने और इस्तेमाल करने पर रोक है. अब सात साल का एक लंबा अंतराल है, जब भारत के पास एक भी लड़ाकू परमाणु पनडुब्बी नहीं होगी.
शिकारी पनडुब्बी है ही नहीं
भारत हालांकि अपनी तीसरी परमाणु संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) को जल्द ही शामिल करने वाला है. यह राजनीतिक और तकनीकी रूप से कहीं अधिक जटिल है क्योंकि यह परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का हिस्सा है. भारत परमाणु मिसाइल ले जाने वाली पनडुब्बी (SSBN) तो बना रहा है, लेकिन शिकार करने वाली हमलावर पनडुब्बी (SSN) उसके पास नहीं है. एसएसएन का काम IRIS डेना की तरह शिकार करना होता है. ये हमला संभवतः लॉस एंजिलिस क्लास की पुरानी पनडुब्बी या फिर वर्जीनिया क्लास नई सबमरीन से किया गया होगा.

हिंद महासागर में चीन की धौंस
हिंद महासागर में चीन की परमाणु पनडुब्बियां लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रही हैं. ये खुले तौर पर मैपिंग, जांच, निगरानी करने आती हैं और भारत को याद दिलाती हैं कि उसके पास मुकाबले के लिए अपनी कोई सबमरीन नहीं है. भारत की 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा और हिंद महासागर में उसकी भूमिका एक ऐसी पनडुब्बी बेड़े पर टिकी है, जो कमजोर हो रही है.
एक तरफ हम बैलिस्टिक मिसाइल से लैस परमाणु पनडुब्बी नौसेना में शामिल करने जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ हम खुद की परमाणु हमलावर पनडुब्बियां (SSN) बनाने के बजाय उन्हें दूसरों से लीज पर ले रहे हैं. IRIS डेना पर टॉरपीडो का हमला भारत के लिए एक कड़ा सबक है कि हिंद महासागर पर हक उसका होता है जो इसकी गहराइयों में ताकत रखता है.
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