नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग जूनियर को महात्मा गांधी जोड़ते हैं. दोनों कभी मिले नहीं, लेकिन दोनों ने अपने-अपने देशों में काले लोगों के अधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष किया. दोनों नेता उस समय दिल्ली आए जब वे अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थे. दोनों नेताओं की इन यात्राओं की मुख्य वजह राजघाट जाकर अपने प्रेरणास्रोत गांधी जी को श्रद्धांजलि देना था.
जेल से कब रिहा हुए थे नेल्सन मंडेला
नेल्सन मंडेला 27 साल तक जेल में बिताने और कठिन यातनाएं सहने के बाद उन्हें 11 फरवरी 1990 को जेल से रिहा किया गया था. पूरी दुनिया उन्हें सुनना चाहती थी. उसी साल 15 अक्टूबर 1990 को वो दिल्ली पहुंचे. पालम एयरपोर्ट पर उनका भव्य स्वागत हुआ. हजारों लोग 'मैडिबा' पुकार रहे थे.
मंडेला ने कहा था कि भारत की आजादी की लड़ाई और महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया. अपनी आत्मकथा 'Long Walk to Freedom' (1994) में उन्होंने लिखा है कि गांधी जी के सत्याग्रह ने उनके संघर्ष को नैतिक बल दिया. महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पहुंचकर मंडेला ने गांधी जी को अपना नायक बताया. मंडेला की यह यात्रा छोटी थी, लेकिन भावनात्मक रूप से अत्यंत गहरी. दिल्ली ने उन्हें वह सम्मान दिया जिसके वे हकदार थे. बाद में 1994 में वे दक्षिण अफ्रीका के पहले काले राष्ट्रपति बने.
नेल्सन मंडेला पहली बार भारत कब आए थे
मंडेला की पहली यात्रा के बाद भारत ने उनके सम्मान में दक्षिणी दिल्ली में वसंत कुंज-वसंत विहार रोड का नाम नेल्सन मंडेला मार्ग रखा. इसके अलावा, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 2004 में नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रेजोल्यूशन की स्थापना हुई. इसका श्रेय तत्कालीन उपकुलपति प्रो. मुशीर उल हसन को जाता है. आज भी 18 जुलाई (मंडेला दिवस) पर दिल्ली में गोष्ठियां आयोजित होती हैं.
तीर्थयात्री के रूप में भारत आए थे मार्टिन लूथर किंग जूनियर
मंडेला की भारत यात्रा से करीब 31 साल पहले, 1959 में अमेरिका में काले लोगों के अधिकारों के पैरोकार मार्टिन लूथर किंग जूनियर दिल्ली आए थे. किंग गांधी के गहरे प्रशंसक थे.वो पत्नी कोरेटा स्कॉट किंग और जीवनीकार लॉरेंस रेड्डिक के साथ करीब एक महीने तक भारत में रहे.

राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देते मार्टिन लूथर किंग जूनियर.
Photo Credit: mkgandhi.org
नौ फरवरी 1959 को वो बंबई पहुंचे थे. वहां से वे दिल्ली आए. दिल्ली एयरपोर्ट पर मार्टिन लूथर किंग जूनियर का गांधी स्मारक निधि के प्रतिनिधियों ने स्वागत किया. किंग ने कहा,''मैं दूसरे देशों में पर्यटक बनकर जा सकता हूं, लेकिन भारत मैं तीर्थयात्री बनकर आया हूं, क्योंकि यह गांधी का देश है.'' दिल्ली में उन्होंने भारतीय नेताओं से मुलाकात की, दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित किया और अहिंसा को सबसे शक्तिशाली हथियार बताया. गांधी परिवार के सदस्यों और सत्याग्रहियों से भेंट की. राजघाट पर गांधी जी को श्रद्धांजलि देते समय उनकी आंखें नम हो गईं. यह 1956 में राजघाट बनने के बाद किसी अंतरराष्ट्रीय नेता की पहली यात्रा थी.
वे जनपथ होटल (वर्तमान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र) में ठहरे थे. दिल्ली के बाद पटना, गया, कलकत्ता, मद्रास, गांधीग्राम और साबरमती आश्रम भी गए. किंग गांधी जी के सत्य, अहिंसा, प्रेम और नैतिक प्रतिरोध के विचारों से प्रभावित हुए. अमेरिका में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ उन्होंने गांधी के सत्याग्रह मॉडल को अपनाया. भारत यात्रा के बाद उन्होंने काले लोगों की मशहूर पत्रिका एबोनी ( Ebony) में लिखा, ''भारत से लौटने के बाद मेरा यकीन पक्का हो गया कि कालों को अधिकार दिलाने के लिए अहिंसा के अलावा कोई दूसरा हथियार नहीं हो सकता.'' उन्होंने आम भारतीयों की जागरूकता से भी प्रभावित होने की बात कही थी.
मंडेला और मार्टिन लूथर किंग जूनियर पर गांधी का प्रभाव
मार्टिन लूथर किंग जूनियर महात्मा गांधी के बड़े प्रशंसक थे.दरअसल किशोरावस्था में बेंजामिन एलाया मेज नाम के एक शिक्षक के मार्गदर्शन में उन्होंने गांधी का साहित्य का अध्ययन किया था. यह उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. किंग ने गांधी के अहिंसा और प्रेम के सिद्धांत को अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन में लागू किया. उन्होंने मोंटगोमरी बस बहिष्कार और मार्चों में अहिंसक रणनीति अपनाई. यह उन पर गांधी के प्रभाव का प्रत्यक्ष उदाहरण था.
दरअसल नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग जूनियर दोनों महात्मा गांधी के अहिंसा, सत्याग्रह और नैतिक प्रतिरोध के सिद्धांतों से गहराई तक प्रभावित थे. गांधी जी की विचारधारा ने उनके संघर्ष को दिशा और नैतिक बल प्रदान किया.
मंडेला रंगभेद के खिलाफ लंबे संघर्ष के दौरान गांधी से प्रेरित हुए. उन्होंने 1994 में आई अपनी आत्मकथा 'Long Walk to Freedom' में उन्होंने लिखा है कि भारत की आजादी की लड़ाई और गांधी के अहिंसक प्रतिरोध ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया. मंडेला ने गांधी के सत्याग्रह को अपनाते हुए शांतिपूर्ण आंदोलन को मजबूत किया. उन्होंने लिखा है कि हिंसा की राह अपनाने के बजाय गांधी की राह ने दक्षिण अफ्रीका के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में मदद की. गांधी को अपना नायक बताते हुए मंडेला ने उनकी विचारधारा को अपना मार्गदर्शक स्वीकार किया.
दोनों नेताओं ने गांधी से यह सीखा कि नैतिक शक्ति और जनसमर्थन से अन्याय के खिलाफ लड़ाई जीती जा सकती है. गांधी की विचारधारा ने उनके संघर्ष को वैश्विक मान्यता दिलाई. मंडेला ने इसे राजनीतिक आजादी के लिए इस्तेमाल किया,जबकि किंग ने नस्लीय समानता के लिए. इस प्रकार गांधी की विरासत दोनों महान नेताओं के माध्यम से दुनिया भर में जीवित रही.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)