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दुबई के लिए इतने अहम कैसे बने भारतीय? तेल से भी पुराना है रिश्ता

नगमा सहर
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 03, 2026 18:22 pm IST
    • Published On मार्च 03, 2026 18:21 pm IST
    • Last Updated On मार्च 03, 2026 18:22 pm IST
दुबई के लिए इतने अहम कैसे बने भारतीय? तेल से भी पुराना है रिश्ता

अमेरिका-इजरायल और ईरान में छिड़ी जंग के बीच दुबई से लौटे भारतीय जब दिल्ली एयरपोर्ट पर अपने रिश्तेदारों से मिले तो चेहरे पर डर के बीच आंखें नम थीं. कांपती उम्मीदों के साथ हाथ जोड़कर अपने परिजनों का इंतजार करते लोगों के बीच मुझे ऐसे दृश्य देखने को मिले, जिसकी कल्पना तक मैंने कुछ हफ्ते पहले नहीं की थी. मैं खुद हाल ही में काम के सिलसिले में दुबई गई थी. वहां मैंने खुद अपनी आंखों से समृद्धि और उम्मीद की चमक देखी थी. विदेश मंत्रालय द्वारा जारी प्रवासी भारतीयों के आंकड़े बताते हैं कि खाड़ी देशों में अकेले यूएई (UAE) में ही 35.54 लाख एनआरआई (NRI) रहते हैं.

दुबई और भारतीयों का रिश्ता

भारतीयों ने जिस सहजता से यूएई खासकर दुबई को अपना घर बनाया है, वह दोनों देशों के बीच उस आत्मीयता का सबूत है जो 1970 के दशक के 'ऑयल बूम' या बाद के 'रियल एस्टेट बूम' से भी पुरानी है. संयुक्त अरब अमीरात के अस्तित्व में आने से बहुत पहले से, जुमेराह की रेत से कांच की गगनचुंबी इमारतें खड़ी होने से पहले और तेल के खेल से रेगिस्तानी बस्तियों के वैश्विक शहरों में बदलने से पहले से ही दुबई और भारत के आपस में संबंध रहे हैं. ये कोई संधियों से बने संबंध नहीं थे, बल्कि 5 हजार साल पुराने रिश्तों से निकली कहानी है. भारत और दुबई के संबंध कांस्य युग (Bronze Age) जितने पुराने हैं, जब सिंधु घाटी सभ्यता दुनिया की सबसे परिष्कृत शहरी संस्कृतियों में से एक हुआ करती थी. उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट के बंदरगाहों से हड़प्पा के व्यापारी लकड़ी, मसाले, अनाज और निर्मित सामान जहाजों में लादकर सुमेर और मेसोपोटामिया की ओर निकलते थे और अरब तट पर रुकते थे. जब तेल की कमाई बढ़ने लगी और शेख राशिद के पास दुबई का कायाकल्प करने के संसाधन हो गए, तब भी मजदूरों, डॉक्टरों और इंजीनियरों के रूप में भारतीय विशेषज्ञता की जरूरत पड़ी थी.

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दुबई का मजबूत भरोसा

दशकों से दुबई एक शांत, लेकिन शक्तिशाली विश्वास के साथ आगे बढ़ता रहा है, वो ये कि दुनिया में आपसी निर्भरता (interdependence) पर आधारित समृद्धि, अस्थिरता के खिलाफ एक ढाल का काम कर सकती है. इस अमीराती शहर ने खुद को वित्त, व्यापार और लॉजिस्टिक्स के हब के रूप में विकसित किया है, एक ऐसा शहर जिससे वैश्विक पूंजी की नसें मजबूती से जुड़ी हुई हैं. इसकी रणनीति बेहद सटीक थी: अगर दुनिया की प्रमुख ताकतों का हित इस जगह से होने वाले निर्बाध व्यापार में है, तो वो इसे बनाए रखने और रक्षा करने के लिए भी उतने ही सक्रिय रहेंगे. खुद को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अपरिहार्य बनाकर दुबई ने सिर्फ विकास ही नहीं बल्कि अपनी सुरक्षा का भी इंतजाम किया है. लेकिन अब जब ईरान ने अमेरिका-इजरायल के अटैक के बाद दुबई को निशाना बनाया तो इन हमलों ने अस्थिर पड़ोस में तैयार स्थिरता की नाजुकता की कलई खोलकर रख दी.

'सपनों को साकार करने वाला शहर'

दुबई की अपनी हालिया यात्रा के दौरान मैं कुछ ऐसे भारतीय प्रवासियों से मिली, जो शहर की चकाचौंध भरी गगनचुंबी इमारतों के शीर्ष तक पहुंच चुके हैं. उनकी कहानियां केवल संघर्ष की नहीं बल्कि अवसर की हैं, एक ऐसे शहर की कहानियां, जिसने महत्वाकांक्षाओं को उपलब्धियों में बदल दिया. मैंने उनके मुंह से बार-बार एक ही बात सुनी: दुबई ने हमारे सपनों को मुमकिन बना दिया. उनके लिए दुबई कोई दूरदराज का देश नहीं, अपना घर था: भारत से केवल कुछ घंटों की दूरी पर एक ऐसा शहर, जो उनकी सबसे बड़ी आकांक्षाओं को समेटने के लिए पर्याप्त है.

मैंने उन सभी से एक सरल सवाल पूछा: "दुबई ही क्यों?" जबाव में एक कारण सबसे ऊपर आया: सुरक्षा. दुबई दुनिया के सबसे सुरक्षित शहरों में गिना जाता है, जहां सुरक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं बल्कि एक गारंटी है. खलीज टाइम्स के मेरे पत्रकार साथी मजहर फारूकी कहते हैं कि सड़कों पर अपराध के प्रति जीरो टॉलरेंस ही इस शहर को महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित बनाता है और यही कारण है कि कई प्रवासी परिवारों के साथ यहां बस जाते हैं. फोर्ब्स की एक रिपोर्ट कहती है कि दुबई इस मामले में नंबर 1 है क्योंकि रात में अकेले घूमने-फिरने की आजादी और सुरक्षा इसे टॉप पर रखती है.

'मुंबई जैसा, पर ट्रैफिक और गंदगी के बिना'

किसी के वैश्विक शहर बनने में महज सुरक्षा का वादा ही पर्याप्त नहीं होता. दुबई व्यापार को न सिर्फ संभव, बल्कि सहज भी बनाता है. लालफीताशाही कम से कम और साफ-सुथरे शासन की प्रतिष्ठा के साथ इसने ऐसा इकोसिस्टम बनाया है, जहां महत्वाकांक्षाएं बिना किसी टकराव के पनपती हैं, न कोई भ्रष्टाचार, न बेवजह की बाधाएं. यही वजह है कि कल्पेश किनारीवाला ने 2016 में यहां Pantheon Development की स्थापना की और आज वह रियल एस्टेट सेक्टर में एक भरोसेमंद नाम हैं. जब मैं लैम्बोर्गिनी बिल्डिंग में उनके आलीशान दफ्तर में मिली तो उन्होंने कहा, "यह बिना ट्रैफिक वाले मुंबई के किसी साफ-सुथरे इलाके में रहने जैसा ही है. मैं  जितनी देर मुंबई के ट्रैफिक जाम में फंसा रहता, उससे कम समय में यहां गुजरात जितनी दूर अपने घर पहुंच सकता हूं."  2016 में पेंथियन की नींव रखने के बाद से, कल्पेश उम्मीदों और सामर्थ्य के बीच की खाई को पाटकर दुबई के रियल एस्टेट परिदृश्य को बदलने के लिए समर्पित रहे हैं. उनका विजन साफ साफ है: विलासिता एक अधिकार है, विशेषाधिकार नहीं.

दुबई ऐसा देश है, जो स्वीकार्यता और सहिष्णुता की नींव पर खड़ा हुआ है, जहां विविधता रोजमर्रा की जिंदगी में रची-बसी है. अल डोबोवी ग्रुप (Al Dobowi Group) के चेयरमैन और संस्थापक सुरेंद्र सिंह कंधारी इस सद्भाव की मिसाल हैं. कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में दुबई का प्रतिनिधित्व कर चुके कंधारी को दुबई में पहले गुरुद्वारे की स्थापना का श्रेय जाता है, जहां रोजाना 4 हजार से अधिक लोग लंगर में भोजन करते है. उनका सफर 1975 में एक खोजी सफर के रूप में शुरू हुआ था, जो आज एक मल्टीनेशनल कंपनी में बदल चुका है. वह कहते हैं, "मैंने दुबई को ऊंट से कैडिलैक और रोल्स रॉयस तक पहुंचते देखा है."

'रीगल मैन' से 'राजू ऑमलेट' तक, सबका घर

अगर आप दुबई में रहने वाले भारतीय हैं तो आप वासु दादा श्रॉफ से जरूर परिचित होंगे. वासु दादा एक कपड़ा कारोबारी और परोपकारी हैं. बर दुबई स्थित उनके ऑफिस में मसाला चाय की चुस्कियां लेते वक्त उन्होंने मुझे बताया कि किस तरह उन्होंने दुबई को एक राष्ट्र के रूप में बनते देखा है. जब वो यहां आए थे, तब यहां रेत ही रेत थी. आज दुबई उन्हें "रीगल मैन" के रूप में जानती है. वह रीगल ग्रुप के मालिक और एक जाने-माने परोपकारी हैं, जिन्होंने शहर में हिंदू मंदिर की स्थापना में अहम भूमिका निभाई है. वह ऐसे पहले भारतीय बिजनेस लीडर हैं, जिन्हें 2019 में गोल्डन वीजा मिला था. इस वक्त उनका नाम फोर्ब्स की लिस्ट में मिडिल ईस्ट के टॉप 100 भारतीय लीडर्स में शुमार है. बिजनेस के साथ उन्होंने अनगिनत लोगों को उनके निजी संघर्षों से उबरने में भी मदद की है. उनकी निस्वार्थ समाज सेवा के लिए उन्हें भारत के सर्वोच्च विदेशी नागरिक सम्मान (प्रवासी भारतीय सम्मान) से भी नवाजा जा चुका है.

यूएई में भारतीयों की बड़ी संख्या का ही नतीजा है कि वहां भारतीय खान-पान के अनगिनत केंद्र बन चुके हैं. इनमें राजू ऑमलेट जैसे नाम अलग पहचान रखते हैं, जिसकी शुरुआत 2013 में राजीव मेहरिश और उनके बेटे नकुल ने अल करामा में की थी. वडोदरा की गलियों से प्रेरित यह रेस्टोरेंट ब्रांड आज दुबई का एक लोकप्रिय नाम बन चुका है.

सेफ्टी, सिक्योरिटी और बिजनेस में आसानी.. ये वो वजह है, जिन्होंने कुछ ही वर्षों में दुबई को सबसे पसंदीदा स्थलों में से एक बना दिया है. रियल एस्टेट की तो यहां इतनी धूम है कि एक चुटकुला अक्सर बोला जाता है- "दुबई जाने वाले ज्यादातर लोग घर के मालिक बनकर ही वहां से लौटते हैं." ऊंची-ऊंची गगनचुंबी इमारतों में भारतीयता की स्पष्ट छाप दिखती है, चाहे स्टील के रूप में हो, कांच हो या फिर विजन के रूप में. 
दुबई के इस वजूद को आज धुएं में घिरी इमारतों और डर तक सीमित नहीं किया जा सकता.

(डिस्क्लेमरः नगमा सहर NDTV इंडिया में सीनियर एडिटोरियल एडवाइजर और एंकर हैं. लेख में व्यक्त उनके निजी विचार हैं.)

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