Gen-Z यानी 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई वह पीढ़ी, जिसने इंटरनेट को किताबों से पहले और स्मार्टफोन को खिलौनों से पहले देखा. यह पीढ़ी तकनीक में सबसे अधिक दक्ष, सूचनाओं तक सबसे तेज़ पहुंच रखने वाली और अपने विचारों को खुलकर व्यक्त करने वाली पीढ़ी है. लेकिन यही Gen-Z आज एक ऐसे डिजिटल वातावरण में भी बड़ी हो रही है, जहां एल्गोरिद्म ज्ञान से अधिक उत्तेजना, संवाद से अधिक टकराव और तर्क से अधिक ट्रोलिंग को बढ़ावा देते हैं. यही कारण है कि आज सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं है कि युवा क्या सोच रहे हैं, बल्कि यह भी है कि वे किस भाषा में सोच और बोल रहे हैं.
Gen-Z की भाषा कैसी है
हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए छात्रों-युवाओं के प्रदर्शन के दौरान सामने आए कुछ वीडियो और सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री ने इस चिंता को और गहरा किया है. लोकतंत्र में विरोध करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है. सरकार की नीतियों की आलोचना करना भी लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है. लेकिन जब विरोध की भाषा गाली-गलौज, व्यक्तिगत अपमान और अशोभनीय नारों में बदलने लगे, तब यह केवल राजनीतिक असहमति नहीं रह जाती, बल्कि Gen-Z की बदलती भाषाई संस्कृति पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है.दरअसल, Gen-Z का सबसे बड़ा शिक्षक आज परिवार या विद्यालय नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन बनती जा रही है. सुबह उठने से लेकर रात तक रील, मीम, पॉडकास्ट, यूट्यूब शॉर्ट्स और वायरल वीडियो उनकी सोच को प्रभावित करते हैं. सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म उन्हें वही दिखाता है, जिस पर वे अधिक समय बिताते हैं. धीरे-धीरे उनका डिजिटल संसार ही उनकी वास्तविक दुनिया बन जाता है. इस प्रक्रिया में भाषा भी बदलती है. 'रोस्ट','सैवेज', 'ट्रोल','डार्क ह्यूमर' और 'वायरल' जैसी प्रवृत्तियां केवल मनोरंजन नहीं रह जातीं, बल्कि संवाद की शैली बन जाती हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि डिजिटल प्लेटफार्म पर जितनी तीखी, उत्तेजक और अपमानजनक भाषा होती है, उतनी ही तेजी से वह वायरल होती है. परिणामस्वरूप कुछ युवाओं के मन में यह धारणा बनने लगती है कि शालीनता से अधिक प्रभाव गाली का होता है और तर्क से अधिक शक्ति ट्रोलिंग में है. यही मानसिकता धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन में भी दिखाई देने लगती है.

पेपर लीक के मुद्दों पर छात्रों और युवाओं ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर करीब एक महीने तक धरना दिया. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद यह धरना खत्म हुआ.
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लोकतंत्र में मतभेद की जगह कितनी है
जंतर-मंतर की घटना को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है. यदि किसी भी प्रदर्शन में किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री या अन्य संवैधानिक पदाधिकारी के प्रति अमर्यादित भाषा का प्रयोग होता है, तो वह केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं होती, बल्कि यह संकेत भी देती है कि डिजिटल संस्कृति किस प्रकार सार्वजनिक संवाद को प्रभावित कर रही है. मतभेद लोकतंत्र की शक्ति हैं, लेकिन मर्यादा उसकी आत्मा है. यदि भाषा ही मर्यादाहीन हो जाए, तो लोकतांत्रिक विमर्श का स्तर भी गिरने लगता है. यह भी उतना ही सत्य है कि पूरी Gen Z को एक ही दृष्टि से नहीं देखा जा सकता. यही पीढ़ी स्टार्टअप खड़े कर रही है, शोध कर रही है, ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व कर रही है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) पर काम कर रही है और दुनिया में भारत का नाम रोशन कर रही है. इसलिए समस्या Gen Z नहीं है. समस्या वह डिजिटल इकोसिस्टम है, जो कई बार लोकप्रियता को जिम्मेदारी से अधिक महत्व देता है. वह वायरल होने की संस्कृति को विचारशील होने से ऊपर रखता है. ऐसे में सबसे पहली जिम्मेदारी परिवार की है. घर केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि संस्कारों की पहली पाठशाला है. माता-पिता को बच्चों के मोबाइल की निगरानी करने से अधिक उनके डिजिटल व्यवहार पर संवाद करना होगा. उन्हें यह समझाना होगा कि असहमति और अशिष्टता एक ही बात नहीं हैं. दूसरा दायित्व विद्यालयों और विश्वविद्यालयों का है. अब केवल डिजिटल साक्षरता पर्याप्त नहीं है; डिजिटल नागरिकता, मीडिया साक्षरता और मर्यादित सार्वजनिक संवाद भी शिक्षा का हिस्सा बनने चाहिए.

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को छात्रों ने अपनी जीत बताई है.
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लोकतंत्र में सार्वजनिक भाषा कैसी होनी चाहिए
Gen Z को चुप कराने की जरूरत नहीं है. उन्हें प्रश्न पूछने चाहिए, सत्ता से जवाब मांगने चाहिए और लोकतंत्र को मजबूत बनाना चाहिए. लेकिन यह भी समझना होगा कि किसी भी लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल उसके चुनावों से नहीं, बल्कि उसकी सार्वजनिक भाषा से भी तय होती है. यदि आलोचना तथ्यों पर आधारित होगी और भाषा संयमित होगी, तो लोकतंत्र भी मजबूत होगा और समाज भी. भारत विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है. ऐसे समय में Gen Z केवल देश की सबसे बड़ी जनसंख्या नहीं, बल्कि सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है. यदि यह पीढ़ी तकनीकी दक्षता के साथ भारतीय संस्कार, संवाद की मर्यादा और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को भी अपनाती है, तो वही भारत की सबसे बड़ी शक्ति बनेगी. लेकिन यदि डिजिटल संस्कृति उसकी भाषा, संवेदनशीलता और विवेक पर हावी हो गई, तो यह केवल एक पीढ़ी का संकट नहीं होगा, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति के भविष्य का भी प्रश्न होगा. आज जरूरत Gen Z को रोकने की नहीं, बल्कि सही दिशा देने की है, जिससे उसके हाथ में स्मार्टफोन हो, मन में विवेक हो और वाणी में भारतीय संस्कृति के संस्कार हों.
(डिस्क्लेमर: लेखक नई दिल्ली स्थित भारती विद्यापीठ में सहायक प्राध्यापक (मीडिया)हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी की सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)