उत्तराखंड के हल्द्वानी में गौला के किनारे खड़े होकर साफ दिखाई देता है कि यह नदी प्राकृतिक संकट से नहीं, इंसानी लालच और प्रशासनिक उदासीनता के संयुक्त हमले से जूझ रही है. नदी तल खनन के गहरे घावों से छलनी है; कम पानी वाले महीनों में धार बेहद उथली हो जाती है; बस्तियां और बुनियादी ढांचा बाढ़ क्षेत्र तक पहुंच चुके हैं, किनारों पर सीवेज और ठोस कचरा बढ़ रहा है. पर्यावरणकर्मी चंदन सिंह नयाल के मुताबिक गौला हल्द्वानी की जीवनरेखा है, लेकिन शहर इसे खदान, पाइपलाइन और नाले की तरह इस्तेमाल करने लगा है.
भीड़ापानी–महातोली नै सहित जलग्रहण क्षेत्र के जमीनी साक्ष्य नदी तल के 40 फीट तक नीचे जाने की बात दर्ज करते हैं. चालीस फीट केवल खनन की गहराई नहीं, उस सोच की गहराई है जिसने नदी को पारिस्थितिकी नहीं, निर्माण सामग्री का भंडार मान लिया.रेत, बजरी और बोल्डर कोई ठेकेदार का गोदाम नहीं; यही नदी की पारिस्थितिकी की बुनियाद हैं. इनके अंधाधुंध दोहन से भूजल,तट,पुल,बाढ़ क्षेत्र, कृषि और अंततः मानव बस्तियां जोखिम में हैं. गौला दबाव में नहीं, व्यवस्थित रूप से खपाई जा रही है.
विनाश और विकास के बीच बहती नदी
सवाल अब यह नहीं कि गौला कितनी बची है; सवाल यह है कि उसके बचे रहने की कीमत पर हल्द्वानी कितना और बनाया जाएगा. उसकी बर्बादी को सरकारी फाइलों, ठेकों और योजनाओं की भाषा में कब तक 'विकास' का प्रमाणपत्र मिलता रहेगा. गौला कुमाऊं की पहाड़ियों से निकलकर भाबर के मैदानों में उतरती, काठगोदाम और हल्द्वानी से गुजरती है. उसकी नियति एक नदी बनकर शहर को जीवन देना थी, लेकिन आज उसका लेखा-जोखा निकासी का है, पुनर्भरण का नहीं. जलग्रहण क्षेत्र का क्षरण, वनों की कटाई, पानी का मोड़ना, नदी तल में खनन, बाढ़ क्षेत्र पर अतिक्रमण और कचरे ने उसकी प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता को लगभग निचोड़ दिया है.
न्यूनतम प्रवाह वाले मौसम में कई हिस्सों में नदी जीवंत धारा नहीं, अलग-थलग कुंडों और उथले पानी में सिमट जाती है. नदी विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर की चेतावनी इसलिए बेहद प्रासंगिक है कि नदी कोई इंजीनियरिंग चैनल नहीं, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र है. गौला को बचाने के लिए अब भाषण नहीं, दोहन रोकने का राजनीतिक साहस चाहिए.

हलद्वानी की पानी की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा नौला नदी के पानी से ही पूरा होता है.
Photo Credit: Amarendra Kishore
भारतीय नदियों को लेकर एक वक्तव्य में ठक्कर और उनके साथी शोधकर्ताओं ने चेताया है कि 'गलत ढंग से तैयार की गई परियोजनाएं और हस्तक्षेप नदियों को सुखाने के साथ-साथ मीठे पानी की जैव विविधता को भी नष्ट कर सकते हैं.' गौला के लिए इस चेतावनी का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है, यदि अल्पकालिक दोहन और आर्थिक लाभ की होड़ में नदी के पारिस्थितिक कार्यों की बलि दी गई, तो इसकी अंतिम कीमत केवल नदी को नहीं चुकानी होगी. वह कीमत उस हल्द्वानी शहर को भी चुकानी पड़ेगी, जिसका जीवन और भविष्य गौला पर निर्भर है.
खनन से नदी को क्या नुकसान होता है
गौला पर सबसे सीधा हमला नदी तल के खनन से हो रहा है और खनन विभाग तथा उत्तराखंड सरकार को अब असहज सवालों से बचना बंद करना होगा. काठगोदाम और हल्द्वानी के आसपास बजरी, गिट्टी, रेत और बोल्डर निर्माण अर्थव्यवस्था को ईंधन देते हैं; ट्रांसपोर्टरों, वाहन चालकों, मजदूरों, खच्चर मालिकों और क्रशर उद्योग को रोजगार भी मिलता है. लेकिन रोजगार प्रशासनिक विफलता का कवच नहीं हो सकता. किस वैज्ञानिक अध्ययन ने तय किया कि गौला कितना खनिज सह सकती है? पुनर्भरण दर किसने मापी? खनन की गहराई कौन देख रहा था? नदी तल के कई मीटर नीचे जाने पर जवाबदेह कौन है? यदि सीमाएं तय थीं, तो उल्लंघन कैसे हुआ? यदि तय नहीं थीं, तो अनुमति किस आधार पर मिली? और यदि क्षरण पता था, तो खनन क्यों जारी रहा? जनता पूछ रही है कि इसका लाभ किसे हुआ, आंखें किसने मूंदी और हस्ताक्षर किसने किए?
नदी तल कई मीटर नीचे गया है तो सरकार को आंकड़े, पट्टे, अनुमति-पत्र, निगरानी रिपोर्ट और पुनर्भरण अध्ययन सार्वजनिक करने होंगे. गहरी खुदाई धारा, किनारों, तलछट प्रवाह और भूजल-नदी अंतःक्रिया को बिगाड़ती है. खनन गड्ढे पानी भरने के बाद भी जानलेवा रहते हैं. जमीनी सामग्री में मौत और डूबने के हादसों का उल्लेख है; बच्चे इन्हीं गड्ढों में नहाते देखे गए हैं.इसे 'विकास' कहने वालों को बताना होगा कि सस्ती निर्माण सामग्री का लाभ तो गिना जा रहा है, लेकिन नष्ट पारिस्थितिकी और गंवाई जिंदगियों की कीमत किस खाते में है? विडंबना यह कि इसी गौला से बढ़ते हल्द्वानी की प्यास बुझाने की उम्मीद है.
नदी से पानी निकालना आर्थिक रूप से कितना फायदेमंद
उपलब्ध जमीनी साक्ष्यों के अनुसार आकलन के समय शहर की जरूरत करीब 2.8 करोड़ लीटर प्रतिदिन थी, जबकि गौला से लगभग 15.83 मिलियन लीटर प्रतिदिन की आपूर्ति हो रही थी. फिर भी जलापूर्ति का बड़ा हिस्सा कथित नॉन-रेवेन्यू वाटर के रूप में दर्ज था अर्थात वह पानी जो व्यवस्था से निकल तो रहा था, लेकिन राजस्व अर्जित करने वाले उपभोग तक नहीं पहुंच रहा था. यहां अनेक कनेक्शन मीटर रहित थे. यानी संकट नदी में ही नहीं, व्यवस्था में है. हिमांशु ठक्कर का सवाल मौजूं है, नई पाइपलाइन बनाना आसान है, रिसाव और कुप्रबंधन ठीक करना कठिन. पाइपलाइन पानी पैदा नहीं करती; जलाशय क्षतिग्रस्त जलग्रहण क्षेत्र नहीं बचाता. बढ़ती मांग नदी को अनंत जलस्रोत मानने का लाइसेंस नहीं है.
गौला पर प्रस्तावित 14 मेगावाट क्षमता वाली जमरानी बहुउद्देश्यीय परियोजना पर भारतीय वन्यजीव संस्थान के आकलन में दर्ज है कि शुष्क मौसम में गौला का प्रवाह लगातार घटता है और भाबर की पेयजल जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं रहता. फिर सवाल है कि क्या नीति-निर्माता नदी की पारिस्थितिक सीमा स्वीकार करेंगे या हर संकट का जवाब नई इंजीनियरिंग परियोजना में खोजेंगे? जमरानी बांध पेयजल और सिंचाई के लिए भंडारण बढ़ाएगा; पहले से बना गोला बैराज और नहर प्रणाली भी सिंचाई करती है.
हल्द्वानी को भरोसेमंद पानी चाहिए, लेकिन जल सुरक्षा सिर्फ ढांचा खड़ा करना नहीं. बांध पानी जमा कर सकता है, बारिश नहीं करा सकता; जंगल, सूखते जलस्रोत और क्षतिग्रस्त जलग्रहण क्षेत्र पुनर्जीवित नहीं कर सकता. गौला पाइपलाइन नहीं, जीवित पारिस्थितिकी तंत्र है. असली काम है पूरे नदी तंत्र, जलागम, धारा, भूजल और बाढ़ क्षेत्र का पुनर्जीवन.

गौला पर सबसे सीधा हमला नदी तल के खनन से हो रहा है.
Photo Credit: Amarendra Kishore
कैसे जहरीला हो रहा है नदी का पानी
सवाल यह है कि जमरानी परियोजना के तहत गौला के प्रवाह को नियंत्रित करने और जलाशय बनाने से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर क्या असर पड़ेगा? भारतीय वन्यजीव संस्थान ने परियोजना के पारिस्थितिक प्रभावों, जंगलों और वन्यजीवों पर असर का अध्ययन किया है. जल संरक्षण कार्यकर्ता डॉ. शैलेश नंदिनी चेतावनी देते हुए कहती हैं कि यदि विकास नदी की पारिस्थितिक अखंडता, प्राकृतिक आवास और स्वाभाविक प्रवाह की कीमत पर होगा, तो जमरानी उसी खतरनाक सोच का स्मारक बन सकती है. पर्यावरणविद् और हेस्को के संस्थापक डॉ. अनिल जोशी स्थानीय संसाधनों, सामुदायिक भागीदारी और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक को विज्ञान से जोड़ने की वकालत करते हैं. गौला के लिए यही रास्ता है, नदी नष्ट कर अर्थव्यवस्था नहीं, नदी बचाकर टिकाऊ आजीविका. जोशी के अनुसार, नदी संसाधन नहीं, साझेदार होनी चाहिए.
एक शहर उस नदी से पानी नहीं पी सकता जिसे वह खुद जहरीला बना रहा है.गौला पर हमला केवल खनन तक सीमित नहीं है. तेजी से फैलते शहरी क्षेत्र का कचरा भी अब नदी को अपने भीतर समेटने के लिए मजबूर कर रहा है. उपलब्ध जमीनी आकलन के आंकड़ों के अनुसार,2021 में हल्द्वानी में प्रतिदिन लगभग 22.40 एमएलडी सीवेज उत्पन्न होता था, जबकि उस समय आबादी के केवल करीब 10 प्रतिशत हिस्से को ही सीवर नेटवर्क से जोड़ा गया था.
विरोधाभास साफ है, शहर गौला से पानी लेता है, उसे इस्तेमाल कर प्रदूषित करता है और फिर उसी नदी से और पानी मांगता है. यह जलचक्र नहीं, संकट का कन्वेयर बेल्ट है. नदी न सीवर है, न कूड़ाघर, न शहर की विफलताओं का बलि-क्षेत्र. दूसरी ओर, बाढ़ क्षेत्र पर मकान, संस्थान और परिवहन ढांचा फैल चुका है. नदी को फैलने की जगह चाहिए; कब्जा खतरा मिटाता नहीं, आगे टालता है. वहां बसे लोगों को खलनायक बनाना भी अन्याय है, लेकिन संपत्ति का अधिकार नदी के भूगोल को मिटाने का लाइसेंस नहीं हो सकता.
क्या कह रहा है गौला का संकट
अत्यधिक प्रवाह में नदी बिजली कनेक्शन, राजनीतिक सीमाएं या कागजी दस्तावेज नहीं पहचानती. बाढ़ क्षेत्र पर कब्जा खतरा खत्म नहीं करता, उसे टालता है. 2008 में गौला बाईपास पुल का ढहना इसी संकट की चेतावनी था. समाधान दिखावटी सफाई नहीं, समेकित पारिस्थितिक पुनरुद्धार है न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह, वैज्ञानिक खनन सीमा, भूजल पुनर्भरण की सुरक्षा, क्षतिग्रस्त जलग्रहण का पुनर्जीवन, बाढ़ क्षेत्रों का मानचित्रण और कठोर प्रवर्तन, सार्वभौमिक सीवर कनेक्शन, सीवेज उपचार-पुनःउपयोग और ठोस कचरे पर नियंत्रण.
जल नीति नई परियोजनाओं से पहले मांग प्रबंधन और पाइपलाइन लीकेज घटाए. शहरी नियोजन बाढ़ क्षेत्र को रियल एस्टेट न माने. खनन-निर्भर समुदायों को टिकाऊ आजीविका में शामिल करना होगा. डॉ. अनिल जोशी का स्थानीय संसाधन आधारित विकास मॉडल यही सिखाता है कि संरक्षण तभी टिकेगा, जब स्थानीय लोगों को उसमें आर्थिक भविष्य दिखे.
गौला का संकट सिर्फ हल्द्वानी की समस्या नहीं, पूरे देश के लिए चेतावनी है. भारत में नदियां निर्माण सामग्री के लिए खोदी, बिजली के लिए बांधी, शहरों के लिए मोड़ी, अतिक्रमण से दबाई और कचरे की नालियों में बदली जा रही हैं. फिर पानी घटने या बाढ़ आने पर उसी नुकसान की मरम्मत में सरकारी धन झोंका जाता है. असली घोटाला प्रकृति की अनिश्चितता नहीं, नीतियों का पारिस्थितिक सीमाओं को लगातार नकारना है. हिमांशु ठक्कर का आग्रह स्पष्ट है कि नदी बांध, पाइपलाइन या ठेकेदार की जरूरत से परिभाषित नहीं होती. गौला को जीवित तंत्र मानना होगा. विकास रोकना नहीं है; विनाश को विकास कहना रोकना है.
हर नई परियोजना पर पैसा, मशीनरी और राजनीतिक प्रतिष्ठा लगाने से पहले एक सवाल अनिवार्य होना चाहिए, परियोजना पूरी होने के बाद गौला का क्या होगा? क्या वह घोषणाओं, शिलान्यासों और सरकारी फाइलों के बीच बची रहेगी? इसका जवाब अब किसी मंत्रालय की फाइल में नहीं, हल्द्वानी और काठगोदाम के करीब दो लाख लोगों के भविष्य में लिखा जाएगा. क्योंकि नदी का भविष्य और शहर का भविष्य अब दो अलग-अलग सवाल नहीं हैं. गौला बचेगी, तभी हल्द्वानी बचेगा.