दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, राम मनोहर लोहिया अस्पताल, सफदरजंग अस्पताल और राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट का नाम देश के नामी और बड़े अस्पतालों की सूची में शामिल है. इसके अलावा भी सरकारी और निजी क्षेत्र के कई ऐसे अस्पताल दिल्ली में मौजूद हैं, जहां इलाज कराने के लिए देश और दुनिया के लोग आते हैं. लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब दिल्ली में एलोपैथी यानी आधुनिक चिकित्सा का नामोनिशान तक नहीं था. उस वक्त मरीजों का इलाज हकीम और वैद्य ही किया करते थे. उसी दौरान 1879 में एक बंगाली डॉक्टर बैलगाड़ी पर सवार होकर आगरा से दिल्ली आया. उनके आने के बाद सब कुछ बदल गया. उस डॉक्टर का नाम था डॉक्टर हेमचंद्र सेन.वो दिल्ली के पहले एलोपैथिक डॉक्टर थे.
कितने रुपये लेते थे फीस
कल्पना कीजिए, 1879 की दिल्ली. कोई बिजली नहीं, न पानी का नल, न गाड़ियां. अमीर लोग पालकी या घोड़ागाड़ी में घूमते थे. गरीब बैलगाड़ी या एक्का से चलते थे. औरतें घूंघट या बुरका पहनकर चलती थीं. ठीक उसी समय डॉ. सेन दिल्ली आए. वे बंगाल के रहने वाले थे, लेकिन आगरा में ईस्ट इंडियन रेलवे की आगरा-दिल्ली लाइन बनाने वाले मजदूरों को दवाइयां देते थे. जब वे दिल्ली आए तो यहां भी रेलवे जंक्शन (जिसे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन भी कहते हैं) बन चुका था. उन्होंने चांदनी चौक के पास एक बड़ा मकान किराए पर लिया.वहां उन्होंने अपना दवाखाना शुरू किया.
डॉ. सेन की खासियत यह थी कि वे अमीर-गरीब सबका इलाज करते थे. क्लिनिक में आने वालों से कुछ नहीं लेते थे, लेकिन घर जाकर इलाज करने पर सिर्फ एक रुपये चार्ज करते थे. उनका दिन सुबह चार बजे शुरू होता और रात देर तक चलता था. इतिहासकार आरवी स्मिथ कहते थे कि उनके पास दो घोड़ा गाड़ियां थीं. एक सुबह की, एक शाम की. मरीज अगर नहीं आ पाता तो वे खुद चले जाते. जल्दी ही उनकी 'चमत्कारी' दवाइयों की चर्चा होने लगी. वे जॉन्डिस, मलेरिया, लीवर के रोगियों का सफल इलाज करने लगे. यहां तक कि बल्लीमरान के हकीम भी जब अपने इलाज से हार जाते, तो मरीजों को डॉ. सेन के पास भेज देते थे. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय अग्रवाल कहते हैं कि डॉ सेन दिल्ली और देशभर के डॉक्टरों के लिए प्रेरणा स्रोत रहेंगे. उन्होंने दिल्ली को दोनों हाथों से दिया.
डॉ सेन ने इंपीरियल मेडिकल हॉल नाम से अपनी दवा की दुकान शुरू की, जो बाद में एचसी सेन एंड कंपनी बन गई. दवाइयां कलकत्ता से मंगवाने में समय लगता था, इसलिए उन्होंने अपनी फार्मेसी खोल ली. 1883 में उन्होंने इंपीरियल मेडिकल प्रेस भी शुरू किया, जो उनके भतीजे एटी रॉय और उनके परिवार ने संभाला. यह दिल्ली की बड़ी प्रेसों में से एक थी.
दिल्ली में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला
डॉ. सेन सिर्फ डॉक्टर ही नहीं थे, बल्कि समाजसेवी और शिक्षा प्रेमी भी थे. दिल्ली के हिंदू कॉलेज की स्थापना में उनकी अहम भूमिका थी. लाला श्रीकृष्ण दास गुड़वाले और लाला सुल्तान सिंह जैसे प्रमुख व्यापारियों के साथ मिलकर उन्होंने किनारी बाजार में 1899 में हिन्दू कॉलेज की नींव रखी थी. बाद में यह कश्मीरी गेट और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस में शिफ्ट हुआ. डॉ. सेन कॉलेज की पहली मैनेजमेंट कमिटी के सदस्य थे. उन्होंने इंद्रप्रस्थ हिंदू गर्ल्स स्कूल की स्थापना में भी मदद की. यही स्कूल आगे चलकर इंद्रप्रस्थ कॉलेज फॉर वुमेन के नाम से मशहूर हुआ. आपकों बता दें कि जामा मस्जिद के पश्चिमी दरवाजे के ठीक सामने है यह स्कूल. यह कोई सामान्य स्कूल नहीं है. ये राजधानी में लड़कियों का पहला स्कूल है. दिल्ली-6 की लड़कियों को ज्ञान की रोशनी दिखाने में इसका योगदान अतुलनीय है. यह स्कूल 1904 में स्थापित हुआ था. हालांकि इसके नाम में हिन्दू शब्द आता है. लेकिन वहां जाति,वर्ग और धर्म के बंधन टूट जाते हैं. ये कमला नेहरू, प्रख्यात सरोद वादिका शरण रानी बाकलीवाल, पाकिस्तान की पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की मां जरीन मुशर्रफ, कलाधर्मी कपिला वात्सायन वगैरह का स्कूल है. इन्द्रप्रस्थ हिन्दू गर्ल्स स्कूल में विज्ञान की कक्षाएं 1924 में शुरू हो गई थीं.
डॉ. सेन का नाम सबसे पहले दिल्ली आने वाले बंगालियों में गिना जाता है. उनके घर रवींद्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद जैसे गणमान्य लोग आकर ठहरते थे. विवेकानंद जब उनके यहां रुके तो वे रोज यमुना किनारे टहलने जाते थे. दिल्ली में दुर्गा पूजा की परंपरा को विस्तार देने में भी डॉ. सेन ने योगदान दिया. शुरू में घर पर पूजा होती थी, बाद में किराए के स्थान पर. आज भी दरियागंज की दुर्गा पूजा उनके परिवार से जुड़ी है.
जब मौत हुई तो बंद रहे दिल्ली के बाजार
दिल्ली में रहने वाले अंग्रेज भी उनके पास इलाज के लिए आते थे.अंग्रेज उनके पास केवल इलाज के लिए ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत सलाह लेने भी आते थे. उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि जब वे बीमार पड़े तो ब्रिटिश चीफ कमिश्नर ने चांदनी चौक के फाउंटेन एरिया में पूरी तरह सन्नाटा करवा दिया ताकि उन्हें कोई परेशानी न हो.
डॉ. सेन की मृत्यु 1906 में हुई. उनके गम में दिल्ली के बाजार एक हफ्ते के लिए बंद रहे थे . उनके बेटे डॉ. बीसी सेन और डॉ. आरबी सेन (आदु बाबू) ने उनकी विरासत संभाली. डॉ. सेन के योगदान को सम्मान देने के लिए सरकार ने पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास एक सड़क का नाम डॉ. एचसी सेन मार्ग रखा है. उनका परिवार दरियागंज में रहता है.
डॉ.सेन की कहानी सिर्फ एक डॉक्टर की नहीं, बल्कि एक युग के बदलाव की है. ब्रिटिश काल में जब दिल्ली अभी राजधानी नहीं बनी थी, तब उन्होंने आधुनिक चिकित्सा, शिक्षा और सांस्कृतिक पुल का काम किया.वे बंगाली थे, लेकिन दिल्ली को अपना घर बना लिया. उनके प्रयासों से दिल्ली में बंगाली समुदाय की जड़ें मजबूत हुईं.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)