यूपी के जिला अस्‍पताल और वहां की स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍था

चुनावों के कारण यूपी की सरकार हर दिन अख़बारों में विज्ञापन दे रही है जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बहुत ही सुंदर दावे किए जा रहे हैं. मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने से लेकर डॉक्टरों की नियुक्ति के दावों से यह धारणा मज़बूत होती है कि स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हुई हैं.

चुनावों के कारण यूपी की सरकार हर दिन अख़बारों में विज्ञापन दे रही है जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बहुत ही सुंदर दावे किए जा रहे हैं. मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने से लेकर डॉक्टरों की नियुक्ति के दावों से यह धारणा मज़बूत होती है कि स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हुई हैं. हम उन दावों की जांच अभी नहीं कर रहे हैं. इसकी जगह यूपी के अख़बारों में ज़िला अस्पतालों को लेकर जो खबरें हाल-फिलहाल या इस साल छपी हैं उनके सहारे देखने की कोशिश कर रहे हैं कि ज़िला अस्पतालों में कितने दिनों से कई गंभीर बीमारियों के विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं हैं. मंज़ूर पद कितने हैं और कितने डाक्टर काम कर रहे हैं. कुछ ज़िला अस्पतालों में हमारे सहयोगी भी गए हैं. यह देखने के लिए कि कई विभागों में बिना डॉक्टरों के लिए इलाज की यह शानदार व्यवस्था कैसे काम कर रही है. आपने सोमवार के प्राइम टाइम में एम्स की हालत पर हमारी रिपोर्ट देखी होगी कि वहां कितने पद प्रोफेसर और सहायक प्रोफेसर के ख़ाली हैं. आज हम यूपी के कुछ ज़िला अस्पतालों का हाल जानने का प्रयास करेंगे. सबसे पहले हमने स्मार्ट सिटी गाज़ियाबाद के ज़िला अस्पताल की खबरों के लिए गूगल में टाइप किया. मार्च से लेकर दिसंबर के बीच की जो खबरें मिलीं उनमें से कुछ ही खबरों का हाल आपको बता रहे हैं.

अमर उजाला की एक खबर 22 मार्च की है. 8 महीने पहले की यह खबर की हेडलाइन है 'तीन माह से नहीं हुआ एक भी आपरेशन.' इस खबर की पहली लाइन है कि स्वास्थ्य राज्यमंत्री के गृह जिले में भी स्वास्थ्य सेवाएं बीमार हैं. ज़िले के तीन बड़े अस्पतालों में एक भी ऐसा नहीं है जहां पूरी संख्या में डॉक्टर मौजूद हों. संयुक्त अस्पताल में 22 डॉक्टरों के पद हैं मगर हैं पांच. अस्पताल में सामान्य सर्जन, कार्डियोलॉजिस्ट और त्वचा रोग विशेषज्ञ न होने से फिजीशियन ही ऐसे मरीजों का इलाज करते हैं. शासन को कई बार पत्र लिखा गया है कि डॉक्टर नहीं हैं.

मार्च के बाद एक खबर 28 अगस्त की है. लिखा है कि गाज़ियाबाद के संयुक्त अस्पताल में सात साल में 13 डॉक्टर चले गए लेकिन उनकी जगह पर नियुक्ति नहीं हुई. यहां 38 की जगह 16 डॉक्टर रह गए हैं. इस कारण गंभीर बीमारियों का इलाज नहीं हो रहा है. यही हाल एमएमजी एवं महिला अस्पताल का है. केंद्र एवं राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी भरकम बजट खर्च करती है, लेकिन पर्याप्त स्टाफ न होने से मरीज बेहाल हैं. ट्रॉमा सेंटर में विशेषज्ञ तो दूर एमबीबीएस की भी नियुक्ति नहीं हो पाई है. इस समय अस्पताल में नेफ्रोलॉजिस्ट की भी जरूरत है, क्योंकि एक महीने में 200 से 250 मरीजों की डायलिसिस हो रही है.

एक खबर 4 अक्‍टूबर की है नवभारत टाइम्स की. 46 लाख की आबादी वाले गाज़ियाबाद के सभी सरकारी अस्पातलों का मिलाकर एक लाख की आबादी पर 9.3 बेड हैं जबकि नीति आयोग के अनुसार एक लाख की आबादी पर 24 बेड होने चाहिए. लिखा है कि ज़िले में अस्पताल के नाम पर बहुत सारी इमारतें हैं लेकिन उनमें बेड नहीं हैं और न डॉक्टर हैं.

एक खबर तीन दिसंबर की है अमर उजाला की. लिखा है कि कोविड लेवल-2 संयुक्त अस्पताल में 23 डॉक्टर नहीं हैं. पिछले एक साल में आठ डॉक्टर जा चुके हैं. 38 डॉक्टरों की जगह 15 डॉक्टर हैं. यानी मार्च से लेकर दिसंबर आ गया डॉक्टरों की कमी वैसी ही बनी रही. इस खबर में एक और खतरनाक बात लिखी है. अस्पताल में फिजिशियन की जगह मरीजों का इलाज एनेस्थेटिस्ट (बेहोशी का डॉक्टर) करते हैं. उनके इमरजेंसी में रहने पर सीएमएस ओपीडी में मरीजों का इलाज करते हैं. संयुक्त अस्पताल में एक भी फिजिशियन, सर्जन और त्वचा रोग विशेषज्ञ नहीं है.

अगस्त महीने की खबर है कि गाजियाबाद के MMG अस्पताल में एक भी ह्रदय रोग विशेषज्ञ नहीं है क्योंकि एकमात्र विशेषज्ञ रिटायर हो रहे हैं. फिर 6 सितंबर के टाइम्स ऑफ इडिया की ख़बर है कि MMG अस्पताल में ह्रदय रोग विशेषज्ञ, छाती रोग विशेषज्ञ, आर्थोपेडिक सर्जन वगैरह नहीं हैं. फिर 4 अक्‍टूबर को टाइम्स ऑफ इंडिया के ही आदित्य देव की खबर छपी है कि गाज़ियाबाद के ज़िला अस्पताल में आधे से अधिक पद खाली हैं.

कई महीने गुज़र गए हैं, इन खबरों के अनुसार गाज़ियाबाद के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भयंकर कमी है. कई गंभीर बीमारियों के विशेषज्ञ ही नहीं हैं. एक खबर में आपने सुना कि इस ज़िले में इमारतों की कमी नहीं हैं, डॉक्टर नहीं है. यही असल बात है. आज कल इमारत बनाकर अस्पताल के रूप में उदघाटन हो जाता है, वहां की नई मशीनों की तस्वीरें छप जाती हैं लेकिन बाद में पता चलता है कि न डॉक्टर है न टेक्निशियन. 

गाज़ियाबाद के बाद हमने गूगल में हापुड़ टाइप किया तो एक दिसंबर के अमर उजाला में खबर छपी मिली कि ज़िले के सरकारी अस्पतालों में चेस्ट रोग विशेषज्ञ, यूरोलाजिस्ट, न्यूरो सर्जन, हृदय रोग विशेषज्ञ तक की तैनाती नहीं है. उसके बाद बदायूं टाइप किया तो दैनिक भास्कर और लाइव हिन्दुस्तान की ख़बरें निकल आईं. एक खबर में प्रभारी सीएमएस का बयान छपा है कि शासन को कई बार पत्र लिखा गया है, डॉक्टर नहीं आए. गाज़ियाबाद की खबर में पढ़ने को मिला कि शासन को कई बार पत्र लिखा गया है, डॉक्टर नहीं है. ज़िला अस्पताल से संबंधित जितनी भी खबरें छपी हैं उनमें आपको ये बयान ज़रूर मिलेगा कि शासन यानी लखनऊ में स्वास्थ्य मंत्रालय को कई बार पत्र लिखा जा चुका है. इसके बाद भी डाक्टर नहीं हैं.

भास्कर की इस खबर के अनुसार बदायूं ज़िला अस्पताल में जनरल सर्जन, फिजीशियन, एनेस्थेटिक, हार्ट स्पेशलिस्ट, स्किन स्पेशलिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट व पैथोलॉजिस्ट डॉक्टर की कमी है. जबकि इमरजेंसी में चार ईएमओ की जगह दो ईएमओ तैनात हैं. यहां जो मरीज़ आते हैं उन्हें दूसरे ज़िले में भेज कर छुटकारा पा लिया जाता है.

16 नवंबर के लाइव हिन्दुस्तान की खबर है कि 36 लाख की आबादी वाले बदायूं के सभी सरकारी अस्पतालों में 204 डॉक्टर होने चाहिए मगर 92 हैं. पचास फीसदी से ज्यादा डॉक्टर नहीं हैं. एक भी एमडी फिजिशियन नहीं है. सर्जन नहीं है.

अब हम आते हैं फैज़ाबाद. अयोध्या राजनीति के केंद्र में हैं. हर समय इसके विकास के कुछ नए दावे कर दिए जाते हैं. अमर उजाला की यह खबर करोड़ों रुपये के दीपोत्सव के बाद की है. 16 नवंबर को छपी है हेडलाइन है कि अगर आप ह्रदय रोग से पीड़ित हैं तो न आएं ज़िला अस्पताल. लिखा है कि अगर आप एकाएक हृदयाघात की चपेट में आते हैं तो जिला अस्पताल आने की भूल न करें. यहां इलाज तो मिलेगा नहीं, बल्कि कागजी प्रक्रिया पूर्ण करने के चक्कर में गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं.

हम अखबारों की खबरों की बात इसलिए भी कर रहे हैं ताकि आपको समय और समस्याओं का बेहतर तरीके से अंदाज़ा हो सके. पता चले कि कई महीनों और हफ्तों के बाद भी डॉक्टरों की कमी का समाधान नहीं हुआ है. हमारे सहयोगी प्रमोद श्रीवास्तव भी फैज़ाबाद के ज़िला अस्पताल गए तो पता चला कि इस अस्पताल में पांच साल से एक भी कार्डियोलॉजिस्ट नहीं हैं.

अयोध्या के ज़िला अस्पताल में पुराना बोर्ड है, इस पर लिखा है कि डॉक्टरों के 46 पद मंज़ूर हैं लेकिन 14 ख़ाली हैं. ताज़ा स्थिति यह है कि 23 डॉक्टर नहीं हैं. 50 फीसदी डॉक्टर अयोध्या के ज़िला अस्पताल में नहीं हैं. प्रमोद श्रीवास्तव ने बताया कि इस अस्पताल में हर दिन 1500-2000 नए पुराने मरीज़ आते हैं. डॉक्टर न होने से उन्हें लखनऊ रेफर किया जाता है जिन्हें पहुंचने में दो से ढाई घंटे लग जाते हैं. इस अस्पताल में पांच साल से अगर कार्डियोलॉजिस्ट नहीं हैं. कार्डियो और न्यूरो में एक भी डॉक्टर नहीं है. एक भी फिज़िशियन नहीं है. यही नहीं अयोध्या में एक मेडिकल कालेज है. राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज. इसका भी हाल बहुत अच्छा नहीं है. यहां भी कार्डियो का कोई डॉक्टर नहीं है. सवाल है कि अगर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री इस अस्पताल में आकर स्वास्थ्य सेवाओं के बेहतर हो जाने का दावा करें तो क्या दावा करेंगे. डॉ त्रिपाठी बता रहे हैं कि किस तरह इमरजेंसी के मरीज़ों का इलाज किया जाता है, आप ध्यान से सुन लेंगे तो फिर सारे विज्ञापनों पर यकीन कर लेंगे.

जिस तरह से हर ख़बर में शासन को पत्र लिखे जाने की बात कॉमन है उसी तरह से हर खबर में रेफर किए जाने की बात भी कॉमन है. पहले मरीज़ भागा भागा ज़िला अस्पताल पहुंचता है और वहां पता चलता है कि डॉक्टर नहीं हैं, उन्हें दूसरे ज़िला अस्पताल में रेफर कर दिया गया है. उस हालत में मरीज़ दो से ढाई घंटे की यात्रा पर निकलता है. कहीं अस्सी किलोमीटर तो कहीं चालीस तो कहीं सौ किलोमीटर की यात्रा करता है. अभी तक आपने गाज़ियाबाद, हापुड़, बदायूं और फैज़ाबाद का हाल जाना. चार ज़िलों का हाल देखने के बाद अब पांचवें ज़िले के ज़िला अस्पताल की हालत जानते हैं. इटावा और सैफई की. इटावा के ज़िला अस्पातल में डॉक्टरों के 65 पद सृजित हैं, लेकिन 31 डॉक्टरों से ही काम चल रहा है. जिस अस्पताल में पचास फीसदी डॉक्टर न हों, उस अस्पताल का विज्ञापन अगर अखबार में छपना हो तो और क्या स्लोगन लिखेंगे. क्या यह लिखेंगे कि इलाज नहीं हो रहा है तो क्या हुआ, कम से कम अस्पताल तो दिख रहा है.

हमारे सहयोगी अरशद ने बताया है कि इटावा के ज़िला अस्पताल में हर दिन 1100 से 1200 मरीज़ इलाज के लिए आते हैं. इनमें से 20-25 ह्रदय रोग से संबंधित तो होते ही हैं. इस अस्पताल में कार्डियो के दो पद मंज़ूर हैं और दोनों कई साल से रिक्त हैं. अरशद का कहना है कि दस साल से रिक्त पड़े हैं. यहां कार्डियोलॉजी के आठ बेड हैं लेकिन यहां पर 10 वर्षों से कार्डियोलॉजिस्ट की तैनाती नहीं हुई है. इटावा में किसी को हार्ट अटैक आया तो पहले जिला अस्पताल आएगा, वहां से उसे भगाया जाएगा कि 22 किमी दूर सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी जाइये. जब वहां पहुंचेगा तो पता चलेगा कि वहां भी ह्रदय रोग विशेषज्ञ नहीं है तो अब कानपुर भागिए. वहां के लक्ष्मीपति सिंघानिया अस्पताल जाइये. 8 माह पहले ही सैफई विश्वविद्यालय में कार्डियोलोजी डॉक्टर समीर सर्राफ घोटाले के चलते निलंबित हो गए थे. इस वजह से जिला अस्पताल और सैफई आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय का कार्डियोलॉजी विभाग सिर्फ ओपीडी बनकर रह गया है. सैफई में भी ह्रदय रोगियों को जनरल मेडिसिन में देखा जाता है और जो गंभीर होते हैं उन्हें कानपुर भेज दिया जाता है, यहां से कानपुर 170 किमी दूर है और 3 घंटे लग जाते हैं.

यूपी के अखबारों के ज़िला संस्करणों में ज़िला अस्पतालों को लेकर नियमित रिपोर्टिंग होती है. पहले पन्ने पर नहीं, भीतर के पन्नों पर छपती है. इसके बाद भी ज़िला अस्पताल राजनीतिक बहस के केंद्र में नहीं हैं. मतलब जिस मरीज़ को डॉक्टर नहीं मिल रहा है उसके लिए डॉक्टर का न होना कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं हैं. अमर उजाला के मेरठ ब्यूरो की एक खबर छह अक्‍टूबर को छपी है. बिजनौर के ज़िला अस्पातल की इस खबर की हेडिंग भी है कि दिल के रोगी हैं तो ज़िला अस्पताल न आएं. 

हमारे सहयोगी ज़ुबेर भी ज़िला अस्पताल गए. यहां भी पचास फीसदी डॉक्टर नहीं हैं. पांच विभागों में एक भी डॉक्टर नहीं है. चेस्ट फिज़िशियन भी नहीं है. इस अस्पताल में हर दिन 500 मरीज़ आते हैं. इस अस्पताल में भी करीब 15 साल से कोई कार्डियोलाजिस्ट नहीं है. जिला महिला अस्पताल के पुराने भवन में कोविड एल-2 विंग बना है, वहां भी कॉर्डियोलॉजिस्ट नहीं है. बिजनौर से मरीज़ मेरठ भेज दिए जाते हैं. दोनों अस्पतालों के बीच की दूरी 80 किलोमीटर है. छाती में दर्द हो या हार्ट अटैक आया है, एक एक मिनट कीमती होता है, ऐसे में आप एक अस्पताल पहुंचते हैं, वहां डाक्टर नहीं है, वहां से दूसरे अस्पताल में भेजे जाते हैं. वहां है या नहीं कौन जाने. 15 साल से इस ज़िले में एक कार्डियो नहीं है और अखबार में स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के विज्ञापन पर करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार को ही एक विज्ञापन देना चाहिए कि कितने ज़िला अस्पतालों से डॉक्टरों की नियुक्ति के कितने पत्र कितने महीने से आ रहे हैं और हम डॉक्टर की तैनाती नहीं कर पा रहे है. अभी तक आप सात ज़िला अस्पतालों की हालत देख चुके हैं. आठवां और अगला ज़िला अस्पताल बस्ती की हालत देखिए.

बस्ती से हमारे सहयोगी मज़हर आज़ाद ने ज़िले के सरकारी अस्पताल की खबर भेजी है. इसे पूर्वांचल का मिनी पीजीआई कहा जाता ह. यहां भी कार्डियोलाजिस्ट का पद खाली है. दो दशक यानी बीस साल से हार्ट का डॉक्टर नहीं है. यहां जिसे हार्टअटैक आया उसे गोरखपुर या लखनऊ रेफर कर दिया जाता है. इस अस्पताल में मशीनों की कमी नहीं है मगर विशेषज्ञ डॉक्टर के बिना मशीनें किस काम की हैं.

इस तरह अभी तक आठ ज़िला अस्पतालों से संबंधित छपी खबरें और हमारे सहयोगियों के दौरे से पता चलता है कि हर अस्पताल में चालीस से पचास फीसदी डॉक्टर नहीं हैं. अपने ज़िले में ग़रीब मरीज़ों को कई गंभीर बीमारियों का इलाज हासिल नहीं हो पा रहा है. लोग रेफर होने के नाम पर मरीज़ को लेकर दो-दो घंटे की यात्रा कर रहे हैं. बस्ती के बाद कुशीनगर ज़िले का हाल जान लीजिए. ये दोनों गोरखपुर से सटे हुए हैं. इस तरह एक कार्यक्रम में यह नौवें ज़िले के अस्पताल की खबर आप देखने जा रहे हैं. यह खबर ज्यादा पुरानी नहीं है. अमर उजाला में इसी 15 नवंबर को छपी है, लिखा है कि यहां के ज़िला अस्पताल और एमसीएच विंग मिलाकर डॉक्टरों के 54 पद स्वीकृत हैं लेकिन तैनाती केवल 19 की है. इनमें भी विशेषज्ञ डाक्टर बहुत कम हैं. ज़िला अस्पताल में रेडियोलाजिस्ट नहीं है. अस्थि रोग विशेषज्ञ नहीं हैं. गाइनोक्लोजिस्ट के दो दो पद खाली हैं. एमसीएच विंग में भी गायनोक्लोजिस्ट के तीनों पद खाली हैं. बाल रोग विशेषज्ञ के तीनों पद खाली हैं. इस खबर में भी सीएमएस का बयान छपा है कि शासन को कई बात पत्र लिखा गया है.

हमने इन ज़िला अस्पतालों की बात की, आप भी यूपी के बाकी ज़िला अस्पतालों का हाल ले सकते हैं. गोरखपुर में मंगलवार को प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कार्यक्रम था. दोनों के कार्यक्रम से पहले अखबारों में जो विज्ञापन आया उसमें यही बताया गया है कि एम्स राष्ट्र को समर्पित करेंगे. लेकिन इस एम्स का उदघाटन फरवरी 2019 में भी हो चुका है. तब प्रधानमंत्री ने ही उदघाटन किया था. राष्ट्र को समर्पण करना क्या उदघाटन से अलग माना जाए? क्या जब उद्घाटन होता है तब राष्ट्र को समर्पित नहीं किया जाता है? Do you get my point. अब यह सवाल किससे पूछें कि 2019 में उद्घाटन होने के दो साल बाद भी गोरखपुर एम्स में फैकल्टी के 118 पद ख़ाली क्यों हैं. जबकि फैकल्टी की भर्ती का विज्ञापन तो अगस्त 2019 में ही निकला था. 124 पदों के लिए निकला था उसके बाद भी 65 फैकल्टी ही क्यों हैं. जबकि 183 पद स्वीकृत हैं. 64 प्रतिशत पद क्यों खाली हैं.

एम्स को ज़मीन देने न देने की बात प्रधानमंत्री की यही विवाद बिहार में भी चला और आज तक दरंभगा एम्स की बुनियाद नहीं रखी जा सकी जबकि बिहार में नए एम्स की घोषणा 2015 से चल रही थी. 2019 में फ़िर कहा गया कि दरभंगा मेडिकल कॉलेज को एम्स में अपग्रेड करेंगे लेकिन इसको मंत्रिमंडल की मंजूरी 2020 में मिली. बहरहाल गोरखपुर के आस-पास के ज़िला अस्पतालों की हालत देखने के बाद अब गोरखपुर के अस्पतालों से संबंधित कुछ खबरों का ज़िक्र करना चाहते हैं.

एक खबर 25 नवंबर की है. हेडलाइन है कि गोरखपुर में जरूरी दवाओं की क‍िल्‍लत, जिला अस्पताल में एक माह से नहीं हैं आवश्‍यक दवाएं. बीआरडी मेडिकल कालेज, जिला अस्पताल व जिला महिला अस्पताल से कुछ जरूरी और महंगी दवाएं गायब हो गई हैं. इनकी आपूर्ति के लिए मांग भेजी गई है. लेकिन अभी तक अस्पतालों को दवाएं मिल नहीं पाई हैं. मरीजों की दिक्कतें बढ़ गई हैं. खासकर गर्भवती व थैलीसीमिया के मरीजों की दवाएं बहुत महंगी है, इन्हें खरीदना आम आदमी के वश की बात नहीं है. 10 नवंबर की अमर उजाला की खबर है कि चिंताजनक: गोरखपुर जिला अस्पताल में क्लब फुट के मरीजों को नहीं मिला इलाज, पीड़ित मासूमों को गोद में लेकर परेशान रहे लोग. 13 नवंबर की खबर अमर उजाला की है कि गोरखपुर जिला अस्पताल: ट्रामा सेंटर का निर्माण शुरू, छह बेड के आईसीयू में मिलेंगी तमाम सुविधाएं.

गोरखपुर मुख्यमंत्री का क्षेत्र है इसलिए भी यहां स्वास्थ्य सुविधाएं अन्य ज़िलों से बेहतर हैं और काफी सुधार भी हुआ है. 2019 की सीएजी की एक रिपोर्ट से सवाल पैदा होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि अन्य ज़िलों से डॉक्टरों को हटा कर गोरखपुर में भर दिया गया है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि गोरखपुर के ज़िला अस्पताल में 29 फीसदी अधिक डाक्टर हैं और 154 प्रतिशत अधिक नर्स हैं. लखनऊ के संयुक्त अस्पताल में 54 फीसदी अधिक डाक्टर हैं और 210 प्रतिशत अधिक है. वहीं बलरामपुर के संयुक्त अस्पताल में 74 प्रतिशत कम डॉक्टर हैं और 67 प्रतिशत कम नर्स हैं. बांदा के ज़िला अस्पताल में 44 प्रतिशत डॉक्टर कम हैं और 36 प्रतिशत नर्सें कम हैं.

2019 की रिपोर्ट है. क्या 2021 में बहुत बदलाव आया है या स्थिति जस की तस है. लखनऊ और गोरखपुर के सरकारी अस्पताल सापेक्षिक रुप से बेहतर हैं तो उसका कारण यह है कि एक राजधानी है और दूसरा मुख्यमंत्री का क्षेत्र है। बाकी ज़िलों का हाल देखिए तो कई ज़िलों में स्थिति भयावह मिलेगी। कहीं पांच साल से तो कहीं दस साल कार्डियोलाजिस्ट नहीं हैं। बेशक मुख्यमंत्री नए मेडिकल कालेज की बात कर रहे हैं लेकिन पुराने अस्पतालों की हालत खस्ता रहेगी तो क्या नए कालेज या अस्पताल पर्याप्त साबित होंगे? 

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सूचक पटेल को सूचना के अधिकार के तहत एक सूचना मिली है. केंद्र सरकार की एक योजना है अमृत स्टोर की. Affordable Medicines and Reliable Implants for Treatment, इस स्टोर में कैंसर और दिल की बीमारियों की दवाएं सस्ती दी जाती हैं. जानकारी मिली है कि यूपी जैसे बड़े राज्य में मात्र 15 अमृत स्टोर हैं जबकि गुजरात में 62 हैं. ठीक उसी तरह से जैसे फैज़ाबाद के ज़िला अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं लेकिन गोरखपुर के ज़िला अस्पताल में डॉक्टर हैं. यह आपके लिए भी कितना अच्छा है कि स्वास्थ्य को लेकर आप राजनीति नहीं करते, वर्ना जानने के लिए कम से कम इतनी मेहनत तो करनी ही पड़ती. इसीलिए राजनीति धर्म के नाम पर होने लगी है. अस्पताल में डॉक्टर नहीं होने से आप दूसरे अस्पताल के लिए रेफर हो जाते हैं लेकिन धर्म की राजनीति करने पर रेफर करने की ज़रूरत नहीं होती है. जो मन में आए आप बोल सकते हैं, बोल ही रहे हैं. गोरखपुर में प्रधानमंत्री ने कहा कि लाल टोपी से सावधान रहना है, मेरठ में आज समाजवादी और राष्ट्रीय लोकदल की साझा रैली हुई। अखिलेश ने कहा कि लाल टोपी इंकलाब लाएगा. आप नज़र टोपी पर नहीं स्वास्थ्य नौकरी और शिक्षा पर रखिए. इंकलाब आएगा तो उसी से आएगा.