राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन में एक पांच मंजिला इमारत के जमींदोज होने से सात लोगों की जान चली गई. इस हादसे की जांच जारी है. इसमें इमारत की उम्र, मरम्मत और निर्माण कार्य, बेसमेंट में हो रहे काम और नियमों की अनदेखी जैसे सवालों पर ध्यान दिया जा रहा है. ये सवाल जरूरी हैं. लेकिन हमें यह मान लेने से बचना चाहिए कि पुरानी इमारतें अपने आप असुरक्षित होती हैं या नई इमारतें हमेशा मजबूत होती हैं.असल सवाल यह है कि जिस इमारत को जिन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, अगर बाद में उन परिस्थितियों में बदलाव कर दिया जाए तो इमारत पर क्या असर पड़ता है?
दिल्ली और नेपाल की त्रासदी
यही सवाल दिल्ली की इस त्रासदी को नेपाल में हाल में आई बाढ़ की एक तस्वीर से जोड़ता है. नेपाल के नुवाकोट में 40 साल से ज्यादा पुराना एक नीले-हरे रंग का मकान अपने आसपास हुई भारी तबाही के बावजूद खड़ा रहा. बताया गया कि मकान की निचली मंजिल की दीवारें बाढ़ के पानी में बह गईं, लेकिन उसका आरसीसी (RCC) ढांचा सुरक्षित रहा. इसी वजह से उसकी ऊपरी मंजिलों पर लोग शरण ले सके.
अभी तक किसी आधिकारिक इंजीनियरिंग जांच से यह तय नहीं हो पाया है कि वह मकान आखिर कैसे सुरक्षित रहा. इसलिए उसे पूरी तरह 'बाढ़ से सुरक्षित' कहना सही नहीं होगा. लेकिन इस मकान से एक महत्वपूर्ण बात जरूर समझ आती है कि किसी इमारत की मजबूती सिर्फ उसके निर्माण में इस्तेमाल किए गए सामान पर निर्भर नहीं करती. उसकी मजबूती पूरी व्यवस्था पर निर्भर करती है.
मिसाल के तौर पर आरसीसी की इमारत को देखें. कंक्रीट दबाव को सहने के मामले में मजबूत होता है, जबकि उसमें डाली गई स्टील की सरिया खिंचाव को सहने और झटकों के दौरान लचीलापन देने का काम करती है. लेकिन इमारत की सुरक्षा केवल कंक्रीट और सरिया से तय नहीं होती. इमारत का भार एक तय रास्ते से नीचे जाता है, स्लैब से बीम, बीम से कॉलम, कॉलम से नींव और नींव से जमीन तक. अगर इस पूरी व्यवस्था में कहीं कोई महत्वपूर्ण हिस्सा कमजोर या टूट जाए तो अलग-अलग हिस्सों की मजबूती भी काम नहीं आ सकती.
इसी वजह से भारत में इमारतों के डिजाइन में सुरक्षा का अतिरिक्त मार्जिन रखा जाता है. आरसीसी से बनी इमारतों के लिए इस्तेमाल होने वाला प्रमुख भारतीय मानक IS 456 अनुमानित भार और इमारत की अधिकतम क्षमता के बीच सुरक्षा का अंतर रखता है.
इसे अगर आसान भाषा में कहें तो इंजीनियर केवल यह सोचकर इमारत नहीं बनाते कि सामान्य स्थिति में क्या होगा. वे यह भी देखते हैं कि कुछ अनिश्चित या असामान्य परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं. यही सिद्धांत दूसरी तरह की इमारतों पर भी लागू होता है.
स्टील बहुत मजबूत और लचीला होता है, लेकिन उसके जोड़, जंग से सुरक्षा और आग के दौरान उसका व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण है.आरसीसी मजबूत और कठोर होता है, लेकिन उसकी मजबूती इस बात पर भी निर्भर करती है कि सरिया सही तरीके से डाली गई है या नहीं,कंक्रीट की गुणवत्ता कैसी है और नींव कितनी मजबूत है.
इसी तरह ईंटों से बनी भार सहने वाली दीवारें सामान्य वजन को अच्छी तरह संभाल सकती हैं, लेकिन बिना मजबूत ढांचे वाली ईंट की दीवारें बगल से लगने वाले दबाव या झटकों के प्रति अधिक कमजोर हो सकती है. इसलिए सिर्फ निर्माण सामग्री ही पूरी कहानी नहीं है. इमारत का आकार, नींव, निर्माण का तरीका, काम की गुणवत्ता और जमीन की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

नेपाल में जो मकान बाढ़ में बचा, उसके बचने का कारण सिर्फ आरसीसी को नहीं माना जा सकता. उसका आरसीसी ढांचा, नींव की व्यवस्था, इमारत का कॉम्पैक्ट यानी सघन आकार और बाढ़ के सबसे तेज बहाव वाले रास्ते से उसकी स्थिति, इन सभी का योगदान हो सकता है. इसलिए यह मकान किसी चमत्कार का उदाहरण नहीं, बल्कि आपदा के दौरान किसी इमारत के लचीलेपन यानी प्रतिरोधक क्षमता का एक उदाहरण है.
कितनी खतरनाक थी सत्य निकेतन में गिरी इमारत
सत्य निकेतन की इमारत करीब पांच दशक पुरानी थी. उसमें करीब 75 छात्र रहते थे. शुरुआती जानकारी के मुताबिक इमारत के बेसमेंट में मरम्मत या निर्माण का काम चल रहा था. इसी दौरान ढांचा कमजोर हुआ और इमारत गिर गई. इस पहलू की जांच अभी जारी है. इसलिए इन बातों को अंतिम इंजीनियरिंग निष्कर्ष नहीं माना जा सकता. लेकिन एक बात साफ है कि किसी पुरानी इमारत में बदलाव करने से पहले यह समझना जरूरी है कि उसका मूल ढांचा कैसे बना हुआ है.
मौजूदा नींव के पास खुदाई करना सामान्य मरम्मत जैसा काम नहीं है. किसी मजबूत कॉलम को हटाना और किसी साधारण पार्टिशन दीवार को हटाना, दो बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं. इमारत में एक और मंजिल जोड़ने से उसका वजन बढ़ जाता है. इसी तरह किसी सामान्य घर को बड़ी संख्या में लोगों के रहने वाले पीजी में बदलने से भी इमारत पर दबाव और जोखिम बढ़ जाता है.
स्लैब या बीम को काटना, बिजली-पानी की लाइनें दूसरी जगह करना या छत पर भारी मशीनें लगाना भी इमारत के मूल भार-वितरण को प्रभावित कर सकता है.फिर भी कई बार ऐसे बदलावों को अलग-अलग छोटे काम समझा जाता है, जबकि वास्तव में वे पूरी इमारत के ढांचे और उसके व्यवहार को बदल सकते हैं.
भारत में इन समस्याओं से निपटने के लिए तकनीकी नियमों की कमी नहीं है.नेशनल बिल्डिंग कोड 2016 में इमारत की संरचनात्मक सुरक्षा, भूकंप और हवा से पड़ने वाले दबाव, नींव और आपदा से सुरक्षित निर्माण से जुड़े प्रावधान हैं. चुनौती यह है कि इन नियमों और सुरक्षा सिद्धांतों को इमारत के पूरे जीवनकाल में लागू किया जाए.
दिल्ली में कितना बड़ा है भूकंप का खतरा
दिल्ली भूकंपीय क्षेत्र-4 (Seismic Zone IV) में आती है. यह भारत के अपेक्षाकृत अधिक भूकंप जोखिम वाले क्षेत्रों में से एक है. इसका मतलब यह नहीं है कि दिल्ली की हर इमारत असुरक्षित है. इसका मतलब केवल इतना है कि इमारत बनाते समय भूकंप के झटकों और जमीन की स्थानीय स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है.
इसी तरह बाढ़ के मामले में भी केवल इमारत की नींव को ऊंचा कर देने से वह बाढ़ से सुरक्षित नहीं हो जाती है. पानी कितनी तेजी से बह सकता है, उसके साथ मलबा आ सकता है या नहीं, नींव के आसपास की मिट्टी बह सकती है या नहीं, पानी का दबाव कितना होगा, जल निकासी कैसी होगी और बिजली व दूसरी मशीनरी कितनी सुरक्षित रहेगी, इन सभी बातों को ध्यान में रखना जरूरी है.

इमारतों को सुरक्षित बनाने के पांच उपाय
पहला: इमारत की सुरक्षा को पूरे जीवन की जिम्मेदारी माना जाए.
जहां बहुत ज्यादा लोग रहते हैं या जहां खतरा अधिक है, ऐसी इमारतों की समय-समय पर जांच होनी चाहिए. जांच में इमारत की उम्र, उसका इस्तेमाल, उसमें किए गए बदलाव और उस इलाके में मौजूद प्राकृतिक खतरों को ध्यान में रखा जाना चाहिए.सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली सरकार ने पीजी इमारतों का स्ट्रक्चरल ऑडिट कराने की घोषणा की है. यह तत्कउठाया गया महत्वपूर्ण कदम है.
दूसरा: हर इमारत का अपना 'स्ट्रक्चरल इतिहास' होना चाहिए.
बेसमेंट में खुदाई, नई मंजिल जोड़ना, इमारत के इस्तेमाल में बदलाव या किसी महत्वपूर्ण ढांचे में परिवर्तन जैसे बड़े कामों का रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए.
आसान भाषा में कहें तो हर इमारत का भी कुछ वैसा ही रिकॉर्ड होना चाहिए जैसा किसी व्यक्ति का मेडिकल रिकॉर्ड होता है, कब बनी, कब मरम्मत हुई, क्या-क्या बदलाव किए गए और कब उसकी जांच हुई.
तीसरा: सिर्फ नक्शे की जांच नहीं, निर्माण की भी जांच हो.
केवल कागज पर डिजाइन सही होना पर्याप्त नहीं है. यह भी देखना जरूरी है कि जमीन पर वास्तव में उतनी ही मजबूत सामग्री इस्तेमाल हुई है या नहीं. कंक्रीट कितना मजबूत है, सरिया सही जगह पर है या नहीं, नींव की स्थिति कैसी है और महत्वपूर्ण जोड़ कितने मजबूत हैं, इनकी जांच जरूरी है.इसलिए निर्माण के अलग-अलग चरणों में जांच और परीक्षण उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना सही डिजाइन.
चौथा: इमारत डिजाइन करते समय प्राकृतिक खतरों का नक्शा ध्यान में रखा जाए.
किस इलाके में भूकंप का खतरा कितना है, जमीन कैसी है, बाढ़ का पानी किस रास्ते से आ सकता है और हवा का दबाव कितना हो सकता है, इन सभी बातों को शुरुआत से ही डिजाइन में शामिल किया जाना चाहिए. आर्किटेक्ट और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग को एक-दूसरे से अलग काम करने वाले चरणों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.
पांचवां: इमारत ऐसी हो कि किसी एक हिस्से के खराब होने से पूरी इमारत न गिरे.
मजबूत और सहनशीलता, इमारत में ऐसी अतिरिक्त व्यवस्था होनी चाहिए कि अगर किसी एक हिस्से को नुकसान पहुंच भी जाए तो भार दूसरे हिस्सों में बांटा जा सके.इसका उद्देश्य यह नहीं है कि इमारत को पूरी तरह अजेय बना दिया जाए. उद्देश्य यह है कि किसी एक हिस्से की खराबी पूरी इमारत के अचानक गिरने में न बदले और लोगों को बाहर निकलने के लिए पर्याप्त समय मिल सके.
सत्य निकेतन हादसे का बड़ा सबक क्या है
सत्य निकेतन की घटना सिर्फ एक इमारत के गिरने तक सीमित नहीं है. दिल्ली जैसे तेजी से बढ़ते शहरों में भविष्य में रहने वाले बहुत से लोग उन्हीं इमारतों में रहेंगे जो आज पहले से बनी हुई हैं. इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हम नई इमारतें कैसे बनाएं. बड़ा सवाल यह है कि जो इमारतें पहले से बनी हुई हैं, उनकी सुरक्षा को हम कितनी समझदारी से संभालते हैं.
इसके लिए भवनों को मंजूरी देने के तरीके में भी बदलाव जरूरी है. इमारत बनने के बाद भी उसका स्ट्रक्चरल रिकॉर्ड महत्वपूर्ण बना रहना चाहिए. अगर इमारत के इस्तेमाल में बड़ा बदलाव हो, उसमें नई मंजिल जोड़ी जाए, ढांचे में बदलाव किया जाए या इमारत समय के साथ कमजोर हो रही हो, तो उसकी दोबारा जांच होनी चाहिए.
जहां बड़ी संख्या में लोग रहते हैं, वहां यह प्रक्रिया शहर के सामान्य प्रशासन का हिस्सा होनी चाहिए. इसके लिए नियमित जांच, इमारत का रिकॉर्ड और जिम्मेदार अधिकारियों और विशेषज्ञों की स्पष्ट जवाबदेही जरूरी है.
शहरों की इमारतें और बढ़ती आबादी
इमारत की सुरक्षा को जमीन के इस्तेमाल और शहर में बढ़ती आबादी से अलग करके नहीं देखा जा सकता. अगर एक सामान्य घर धीरे-धीरे बड़ी संख्या में लोगों के रहने वाले पीजी में बदल जाता है तो यह केवल इस्तेमाल का बदलाव नहीं है. इससे इमारत पर पड़ने वाला भार, लोगों को बाहर निकालने की जरूरत, बिजली-पानी जैसी सुविधाओं की मांग और दुर्घटना का जोखिम, सब बदल जाता है.इसलिए शहर की योजना बनाने वाली व्यवस्था को इन बदलावों को गंभीरता से समझना होगा. केवल कागज पर 'यूज चेंज' की अनुमति देना पर्याप्त नहीं है.
नेपाल का बाढ़ में बचा मकान और सत्य निकेतन में गिरी इमारत, दोनों घटनाएं बिल्कुल अलग हैं. एक मकान ने प्राकृतिक आपदा के बावजूद खुद को संभाले रखा, जबकि दूसरी इमारत में पहले से बने ढांचे में बदलाव के दौरान गंभीर हादसा हुआ.लेकिन दोनों घटनाओं से एक समान बात सामने आती है किसी इमारत का प्रदर्शन सिर्फ उसकी सामग्री पर नहीं, बल्कि उसके आसपास की परिस्थितियों और उसके पूरे ढांचे पर निर्भर करता है.
यहीं आर्किटेक्चर, स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग और शहरी प्रशासन एक-दूसरे से जुड़ते हैं.
एक सुरक्षित और सहनशील शहर वही है, जो अपनी इमारतों को ऐसी व्यवस्था के रूप में देखे जो समय के साथ बदलती रहती है. उसे पता हो कि उसकी इमारतें किस स्थिति में हैं, उनमें क्या बदलाव हो रहे हैं और जोखिम बढ़ने से पहले जरूरी कदम उठाए जाएं. इसलिए समाधान सिर्फ मजबूत इमारतें बनाना नहीं है. असली जरूरत ऐसे शहर बनाने की है जो उन इमारतों की स्थिति को समझते हों, जिन पर उनके लोगों की जिंदगी और सुरक्षा निर्भर करती है.
(डिस्क्लेमर: लेखक एक एक जाने-माने वास्तुकार और टाउन प्लानर हैं. वह 'सीपी कुकरेजा आर्किटेक्ट्स' के प्रबंध निदेशक हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)