उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव अगले साल होने हैं. इसे 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल मुकाबला बताया जा रहा है. इसे देखते हुए राहुल गांधी एक बार फिर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की राजनीति, जातीय जनगणना और आरक्षण को कांग्रेस के प्रचार अभियान के केंद्र में लाए हैं. इसके पीछे की रणनीति भी साफ है. उत्तर प्रदेश लोकसभा में सबसे ज्यादा सांसद भेजता है. उत्तर प्रदेश पर जिसका नियंत्रण होगा, वह 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश की राजनीतिक दिशा और माहौल को प्रभावित कर सकता है.
जनगणना में ओबीसी की गिनती क्यों नहीं हो रही है
राहुल गांधी के ताजा अभियान का सबसे अहम मुद्दा जातीय जनगणना है. कांग्रेस का कहना है कि देश में हो रही जनगणना के सवालों में ओबीसी के लिए अलग कॉलम नहीं रखा गया है. पार्टी इसे गंभीर मुद्दा बता रही है. उसका आरोप है कि सरकार जानबूझकर जातीय जनगणना को कमजोर करना चाहती है. यह मुद्दा ऐसे समय उठा है जब लंबे समय तक इस मांग का विरोध करने के बाद मोदी सरकार ने जातीय गणना कराने पर सहमति जताई है. यह गणना देरी से होने वाली सामान्य जनगणना के साथ की जाएगी. कांग्रेस इसे अपनी कोशिशों की जीत मानती है. लेकिन अब वह गणना के तरीके पर सवाल उठा रही है.
'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी', मंडल की राजनीति के दौर के इस नारे को राहुल गांधी फिर लगा रहे हैं. इसका मतलब है कि जिस समुदाय की आबादी जितनी ज्यादा हो, सरकारी व्यवस्था और आरक्षण में उसकी भागीदारी भी उसी अनुपात में होनी चाहिए. कांग्रेस अब सही जातीय आंकड़े जुटाने की मांग के साथ आरक्षण पर लगी 50 फीसद की सीमा हटाने की मांग भी कर रही है. उसका कहना है कि वास्तविक आंकड़े सामने आने के बाद आरक्षण की सीमा बढ़ाई जानी चाहिए. राहुल गांधी जातीय जनगणना को 'भारत का एक्स-रे' बताते हैं. उनका कहना है कि यह केवल चुनावी मुद्दा नहीं है, बल्कि देश की नीतियां बनाने के लिए जरूरी आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया है. उनका तर्क है कि जिन समुदायों की सही संख्या ही नहीं पता, उनके लिए सही नीतियां कैसे बनाई जा सकती हैं?
बीजेपी ने कांग्रेस पर जोरदार हमला किया है. बीजेपी कांग्रेस को ओबीसी और आरक्षण विरोधी बता रही है. बीजेपी नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी ने राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर ओबीसी नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी हैं. वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओबीसी पृष्ठभूमि का भी हवाला देते हैं. बीजेपी ने राहुल गांधी पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया है. पार्टी यह भी याद दिलाती है कि 1980 के दशक के आखिर और 1990 के दशक की शुरुआत में राजीव गांधी ने ओबीसी आरक्षण का विरोध किया था.
बीजेपी की ताकत रहा है ओबीसी वोट
नरेंद्र मोदी के दौर में ओबीसी मतदाताओं के समर्थन ने बीजेपी को 2014 और 2019 में बड़े बहुमत के साथ सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. साल 2019 में बीजेपी को उच्च और निचली ओबीसी जातियों, दोनों से मिलने वाला समर्थन 2014 की तुलना में लगभग दोगुना हुआ. इसका नुकसान कांग्रेस और दूसरी क्षेत्रीय व छोटी पार्टियों को हुआ. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में स्थिति कुछ बदली. बीजेपी को उच्च ओबीसी वर्ग में करीब दो फीसदी समर्थन का नुकसान हुआ, जबकि निचली ओबीसी जातियों में उसे लगभग इतना ही फायदा मिला. दूसरी ओर कांग्रेस को उच्च ओबीसी जातियों में करीब पांच फीसद और निचली ओबीसी जातियों में आठ प्रतिशत ज्यादा समर्थन मिला. इसमें कांग्रेस के 'संविधान खतरे में है' अभियान और जातीय जनगणना के मुद्दे की भूमिका रही.

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ओबीसी राजनीति का मैदान क्यों बना उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश की आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी करीब 40 फीसद मानी जाती है. इसमें यादव करीब 11 फीसद, कुर्मी करीब पांच फीसद,कोइरी (कुशवाहा) करीब चार फीसद और दूसरी ओबीसी जातियां करीब 20 फीसद हैं. पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की ताकत का एक बड़ा आधार उसका गैर-यादव ओबीसी गठजोड़ रहा है. इन वर्गों के एक हिस्से को लगता रहा कि समाजवादी पार्टी मुख्य रूप से यादवों की पार्टी है. इसी गठजोड़ के कारण बीजेपी ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी में बड़ी जीत हासिल की. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने समाजवादी पार्टी से सत्ता छीनी और 2022 में भी सरकार बचाने में सफल रही. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने यह तस्वीर बदल दी. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के इंडिया गठबंधन ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 43 लोकसभा सीटें जीत लीं. इसके साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी की सीटों की संख्या पहली बार मोदी दौर में 272 के बहुमत के आंकड़े से नीचे चली गई.
गैर-यादव ओबीसी वोटों में बीजेपी को नुकसान
साल 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि बीजेपी का गैर-यादव ओबीसी समर्थन कमजोर हुआ. कुर्मी और कोइरी जाति में बीजेपी का समर्थन 2022 के करीब 66 फीसद से घटकर 2024 में 61 फीसद रह गया. यानी करीब पांच फीसद की गिरावट. अन्य ओबीसी समूहों में भी बीजेपी का समर्थन करीब 66 फीसद से घटकर 59 फीसद रह गया. यानी सात फीसद की गिरावट. वहीं, इन्हीं समुदायों में इंडिया गठबंधन का समर्थन क्रमशः नौ और 11 फीसद बढ़ा.

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समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का फॉर्मूला अपनाया. सपा ने यादव और मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या सीमित रखकर बीजेपी के उस आरोप का जवाब देने की कोशिश की कि सपा केवल मुस्लिम-यादव की पार्टी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने केवल पांच यादवों, चार मुसलमानों, 27 गैर-यादव ओबीसी , अनुसूचित जाति को 15 टिकट (दो सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवार खड़े किए), सवर्ण जातियों को 11 टिकट दिए. इस तरह सपा ने अपना सामाजिक आधार बढ़ाने की कोशिश की.
2024 में ओबीसी बहुल सीटों पर बीजेपी पिछड़ी
2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने ओबीसी प्रभाव वाली सीटों पर मजबूत वापसी की. यादव प्रभाव वाली 68 सीटों से जुड़े विधानसभा क्षेत्रों में इंडिया गठबंधन 44 पर आगे रहा. वहीं 2022 की तुलना में उसे आठ सीटों का फायदा हुआ, जबकि एनडीए 24 सीटों पर आगे रहा और उसे छह सीटों का नुकसान हुआ. कुर्मी प्रभाव वाली सीटों पर इंडिया गठबंधन का प्रदर्शन और बेहतर रहा. वह 23 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रहा, जो 2022 की तुलना में 14 ज्यादा हैं. वहीं एनडीए केवल 12 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रहा और उसे 14 सीटों का नुकसान हुआ. कुर्मी, कोइरी-कुशवाहा जाति के प्रभाव वाली 60 विधानसभा सीटों में इंडिया गठबंधन 41 सीटों पर आगे रहा. 2022 की तुलना में उसे 27 सीटों का फायदा हुआ, जबकि एनडीए को 29 सीटों का नुकसान हुआ.
यूपी में बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती क्या है
ओबीसी समर्थन में यह बदलाव, ऊंची जातियों और गैर-जाटव दलितों के बीच समर्थन में कमी ने एक साथ मिलकर बीजेपी को बड़ा नुकसान पहुंचाया. साल 2022 की तुलना में बीजेपी करीब 100 विधानसभा क्षेत्रों में पिछड़ गई. अनुमान के मुताबिक इंडिया गठबंधन करीब 224 विधानसभा क्षेत्रों में आगे था, जबकि बीजेपी करीब 175 में आगे रही. अगर वोट शेयर की बात करें तो दोनों गठबंधन करीब 44 फीसद पर बराबर रहे. साल 2022 में बीजेपी को वोट देने वाले हर 100 लोगों में करीब 47 ओबीसी थे. लेकिन 2024 में यह संख्या घटकर 43 रह गई. इंडिया गठबंधन को मिली 99 अतिरिक्त सीटों में एक-तिहाई से ज्यादा सीटें ओबीसी के प्रभाव वाले क्षेत्रों से आईं.

जातीय समीकरण के अलावा इस चुनाव में कुछ नए मुद्दे भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं. इनमें युवाओं में नाराजगी, बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दे शामिल हैं. इसके अलावा अयोध्या में राम मंदिर के चंदे को लेकर लगाए जा रहे 'चंदा चोरी' के आरोप भी राजनीतिक असर डाल सकते हैं. राहुल गांधी को उम्मीद है कि बीजेपी के मजबूत आधार माने जाने वाले गैर-यादव ओबीसी युवा, नौकरियों की कमी और पेपर लीक से नाराज होकर इंडिया गठबंधन की ओर जा सकते हैं. इसी तरह प्रौढ़ और बुजुर्ग ओबीसी मतदाताओं में मंदिर के चंदे को लेकर नाराजगी बीजेपी के खिलाफ जा सकती है. कांग्रेस को उम्मीद है कि यह नाराजगी 2024 के लोकसभा चुनाव से भी ज्यादा बड़ी हो सकती है. इससे योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार को हराने में मदद मिलेगी.
बीजेपी की रणनीति क्या है
2024 के लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद बीजेपी भी पीडीए फॉर्मूले और ओबीसी युवाओं में नाराजगी को लेकर सतर्क है. पार्टी चुनाव को ध्यान में रखकर संगठन में बदलाव कर रही है. कुर्मी समुदाय से आने वाले पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है. इसके अलावा विधानसभा चुनाव में कुर्मी और दूसरे गैर-यादव ओबीसी जातियों को बड़ी संख्या में टिकट देने की रणनीति अपनाई जा सकती है. उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव केवल बीजेपी बनाम सपा की लड़ाई नहीं होगा. ओबीसी वोट, खासकर गैर-यादव ओबीसी वोट, सत्ता की चाबी बन सकता है. यही वजह है कि आने वाले चुनाव में जातीय जनगणना, आरक्षण और पीडीए बनाम बीजेपी का ओबीसी गठजोड़ सबसे दिलचस्प राजनीतिक मुकाबलों में से एक बनने वाला है.
(डिस्क्लेमर: लेखक एक राजनीतिक टिप्पणीकार और चुनाव विश्लेषक हैं. वो इनवेस्टमेंट बैंकर के रूप में भी काम कर चुके हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)