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खामेनेई पर बम हमला, सख्त सुरक्षा और एक भारतीय महिला पत्रकार का 1981 में लिया गया चौंकाने वाला इंटरव्यू

Nasira Sharma
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 31, 2026 19:27 pm IST
    • Published On मार्च 31, 2026 17:15 pm IST
    • Last Updated On मार्च 31, 2026 19:27 pm IST
खामेनेई पर बम हमला, सख्त सुरक्षा और एक भारतीय महिला पत्रकार का 1981 में लिया गया चौंकाने वाला इंटरव्यू

​वह साल था 1981 यानी कि ईरानी क्रांति का तीसरा साल. ख़ौफ़नाक और सियासी रस्साकशी के साथ घटनाओं और दुर्घटनाओं से भरा हुआ. सुसाइड स्क्वायड , उबलते जेल ,पकड़-धकड़, हत्याएं, जनाजे और क़ब्रों से भरते क़ब्रिस्तान! हर तरफ़ दीवारों पर शहीदों के पोस्टर लगे हुए. सियासी माहौल अपने चरम पर था. सुरक्षाबल सावधान! ऐसे माहौल में मुझे इंतज़ार था इमाम अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी और राष्ट्रपति अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के इंटरव्यू का जिसके कारण मुझे कुछ दिन और रुकना पड़ा. काफी कोशिशों के बाद मुझे इमाम खुमैनी और राष्ट्रपति ख़ामेनेई से भी मिलने का वक़्त मिल गया. खामेनेई साहब काफी अरसे तक बीमार रहे थे. कुछ माह पहले नए-नए बने राष्ट्रपति ख़ामेनेई का इंटरव्यू लेने जून 1981 में एक पत्रकार अपने टेप-रिकॉर्डर में कुछ ऐसा इंतजाम करके ले गया. जैसे ही टेप का बटन दबा एक जोरदार धमाका हुआ. इसमें राष्ट्रपति ख़ामेनेई बच तो गए मगर बुरी तरह घायल हो चुके थे. उनका दाहिना हाथ हमेशा के लिए बेकार हो गया था. जिसे वह अपनी अबा (पारंपरिक ढीला-ढाला लंबा मुस्लिम परिधान) में छुपाकर रखते थे.

इस्लामी गणतंत्र ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद-अली रजाई (बाएं) 27 जून, 1981 को सुप्रीम डिफेंस काउंसिल की एक बैठक के दौरान अली खामेनेई (बाएं से दूसरे) से बात कर रहे हैं. खामेनेई इसी दिन दोपहर में तेहरान की अबुजर मस्जिद में एक जानलेवा हमले का शिकार हुए थे. इस बैठक में, ईरान-इराक युद्ध के दौरान युद्धक्षेत्र में शहीद हुए डॉ. चमरान की तस्वीर उनकी खाली कुर्सी पर रखी हुई है.

इस्लामी गणतंत्र ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद-अली रजाई (बाएं) 27 जून, 1981 को सुप्रीम डिफेंस काउंसिल की एक बैठक के दौरान अली ख़ामेनेई (बाएं से दूसरे) से बात कर रहे हैं. ख़ामेनेई इसी दिन दोपहर में तेहरान की अबुज़र मस्जिद में एक जानलेवा हमले का शिकार हुए थे. इस बैठक में, ईरान-इराक युद्ध के दौरान युद्धक्षेत्र में शहीद हुए डॉ. चमरान की तस्वीर उनकी खाली कुर्सी पर रखी हुई है.
Photo Credit: AFP

इंटरव्यू से पहले सैनिटरी पैड तक की जांच

मुझे सप्ताह भर बाद इंटरव्यू की इजाज़त मिल गई. इंटरव्यू से पहले मुझे कड़ी सुरक्षा से गुज़रना था. एक खाली बिल्डिंग के एक छोटे कमरे में मुझे बिठा दिया गया. इंतज़ार जब डेढ़ घंटे का हो गया तो मुझे पूछना पड़ा और जवाब मिला कि कोई महिला सुरक्षा जांच के लिए आने वाली है. उस समय ईरान के पास ऐसी कोई सुरक्षा तकनीक या उपकरण नहीं था, लिहाजा हाथ से टटोल कर सुरक्षा जांच की जाती थी. लम्बे इंतज़ार के बाद एक जवान युवती आई और उसने माफ़ी मांगते हुए जांच शुरू की. मुझे तब झटका लगा जब उन्होंने मेरे सैनिटरी पैड की जांच करने के लिए बाथरूम चलने को कहा. 

पहले तो समझ में नहीं आया फिर यकीन ही नहीं हो रहा था. जब मैंने इनकार किया तो जवाब मिला, "फिर आप इंटरव्यू नहीं ले सकती हैं. क्योंकि राष्ट्रपति पर पहले जानलेवा हमला हो चुका है. हम अब किसी तरह का ख़तरा लेना या लापरवाही नहीं बरत सकते हैं." 

मेरे लिए इंटरव्यू बहुत ज़रूरी था क्योंकि वह सारे सवाल-अहम थे और बिना जवाब के लिखना ईरान पर केवल मेरा अवलोकन समझा जाता. मजबूरन मुझे पैड देने पड़े और उस युवती ने उसे अपनी ऊंगलियों से टटोला और एक बार फिर से माफ़ी मांगते हुए उसे मुझे वापस कर दिया. यह प्रतिबद्धता देख मैं हिल कर रह गई.

जांच के बाद मुझे एक छोटे से कमरे की तरफ़ ले जाया गया जो दूसरी बिल्डिंग में था. जहां एक तख़्त बिछा था और उस पर सफ़ेद चादर बिछी थी जैसी हमारे मध्यवर्गीय घरों में होता था. सामने एक खाली कुर्सी थी. दीवारों पर कुछ नहीं था. शायद वह उनके घर का ही कोई हिस्सा हो. मैं तख़्त के एक कोने में बैठा दी गई. कुछ लम्हों के बाद धीरे-धीरे चलते हुए वह कुर्सी पर आकर बैठ गए. बीमारी के बाद उनका यह पहला इंटरव्यू था. मुझसे इंटरव्यू से पहले सवाल लिए गए थे. उन्होंने मेरे सवालों में से कुछ कटवा दिए और कुछ का जवाब देने को राजी हुए. इंटरव्यू का पहला सवाल मेरी बेचैनी और परेशानी का निचोड़ था. उनसे मैंने कई सवाल पूछे थे.

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सवाल: भारत के 120 मिलियन (12 करोड़) मुसलमानों के लिए ईरानी क्रांति बहुत रुचि का विषय है. वे इसके अंतिम परिणाम को जानने के लिए उत्सुक हैं. वर्तमान में वे अनगिनत हत्याओं और फांसी, विशेष रूप से युवाओं की फांसी के बारे में जानकर परेशान हैं. इन सबको चरित्र में इस्लाम-विरोधी माना जा रहा है और वो आज ईरान में जो कुछ हो रहा है उसके पीछे के तर्क और निष्पक्षता को समझने में विफल रहे हैं?

जवाब: हमारी वास्तविक समस्याओं को कोई नहीं समझता. यही हाल भारत के इन 120 मिलियन मुसलमानों का है जो केवल ईरान में होने वाली फांसी के बारे में सुनते या पढ़ते हैं. वे क्रांति की अल्प अवधि के दौरान हमारी उपलब्धियों से अनभिज्ञ हैं. प्रेस हर जगह विकृत समाचार देता है, चाहे वह भारत हो या दुनिया के अन्य स्थान. प्रेस फांसी के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है और सच्चाई को छुपाता है, और हमारी प्रेरणाओं की ग़लत व्याख्या की जाती है और उसी का संचार किया जाता है.

हाल ही में मैं भारत में था. मैंने कई जगहों पर बातचीत की और खुद देखा कि भारतीय हमारी क्रांति से खुश हैं, वास्तव में यह हमें प्रोत्साहित करती है. उन्हें केवल ईरान में जो हो रहा है उसके बारे में सही जानकारी की आवश्यकता है. यदि उनमें से कुछ इन फांसी की आलोचना करते हैं, तो मुझे लगता है कि उनके पास पूर्ण ज्ञान और स्पष्ट समझ नहीं है. जब दूसरों ने सशस्त्र संघर्ष का सहारा लिया हो, तो कौन विचलित हुए बिना और शांत रहेगा? बाहरी शक्तियों ने आंतरिक तत्वों को चुनकर हमारी क्रांति के ख़िलाफ़ एक बड़ी साजिश रची है और उन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता में मौजूद समूह को धमकी दी है.

वो ईरान में इस्लाम-विरोधी मिज़ाज लाए. हालांकि, इस्लामी गणराज्य ने कई लोगों को माफ़ कर दिया है और उन्हें इस्लामी नैतिकता सिखाई और इस्लामी आध्यात्मिकता से प्रभावित किया है. टेलीविजन कार्यक्रम ऐसे उदाहरणों से भरे हुए हैं और आपने शायद उनमें से कुछ को देखा भी होगा जहां एक बड़ा समूह टेलीविजन पर दिखाई दिया और अपना अपराध स्वीकार किया. लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो लोगों को मारते हैं, सार्वजनिक बसों को जलाते हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं और सशस्त्र प्रदर्शन आयोजित करते हैं. वे अपराधी हैं और उन्हें इस्लामी क़ानून के तहत फांसी दी जानी चाहिए. हाल ही में ऐसे तत्वों की संख्या बढ़ी है. ऐसी स्थिति में विघटन की प्रक्रिया मज़बूत होती है और राष्ट्र कमज़ोर होता है. मुझे यक़ीन है कि भारत और अन्य जगहों पर हमारे दोस्त हमारी निंदा नहीं करेंगे, यदि उनके सामने पूर्ण तथ्य हों. यदि आप एक पत्रकार के रूप में, एक विद्वान के रूप में और ईरान के मित्र के रूप में हमारी स्थिति स्पष्ट करें तो अच्छा होगा.

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सवाल: ईरान की विदेश नीति, जैसा कि मैं महसूस करती या समझती हूं, अनुभवों और घटनाओं की एक श्रृंखला का परिणाम है. उदाहरण के लिए, बनी-सद्र के पेरिस आने से पहले फ़्रांस, यदि मित्र नहीं तो शत्रु देश भी नहीं था. ईरान की विदेश नीति को आम तौर पर कमज़ोर और बार-बार बदलने वाली माना जाता है. क्या आप इसकी प्रकृति और उन प्रमुख विचारों की व्याख्या करेंगे जिन पर इसे तैयार किया जा रहा है?

जवाब: हमारी विदेश नीति निश्चित रूप से कमज़ोर नहीं है, हालांकि हमारी राजनयिक गतिविधियां उतनी पर्याप्त नहीं हैं जितनी होनी चाहिए. हमारी निश्चित प्राथमिकताएं और स्पष्ट दृष्टिकोण है और हमने दुनिया को समूहों में विभाजित किया है: भाईचारे वाले देश, मित्र देश, तटस्थ देश और शत्रु देश. शत्रु देशों का समूह वह है जो हम पर अतिक्रमण करता है और हमारे ख़िलाफ़ आक्रमण करता है और जिनका रुख़ इस्लाम-विरोधी है. बाकी या तो भाई हैं या मित्र या तटस्थ. 

आपने फ़्रांस का उल्लेख किया. बनी-सद्र द्वारा वहां राजनीतिक शरण लेने से पहले ही उसने हम पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया था. वह न तो हमारा मित्र था और न ही तटस्थ, बल्कि उन प्रमुख यूरोपीय देशों में से पहला था, जिन्होंने हम पर प्रतिबंध लगाया. फ़्रांस के साथ मित्र नहीं होने का हमारा कोई इरादा नहीं है, विशेष रूप से हमारे आदरणीय इमाम के वहां रहने की मधुर यादों को देखते हुए. समय-समय पर, फ़्रांस ने वस्तुओं और सैन्य हार्डवेयर की आपूर्ति न करके और इजरायल (जिसके साथ हमारे बुनियादी मतभेद हैं) को सहयोग देकर बार-बार अपने क्रांतिकारी-विरोधी और ईरान-विरोधी इरादों को प्रदर्शित किया है. इसलिए, यह निश्चित है कि यह देश हमारे लिए मित्रवत नहीं हो सकता. यह इजरायल के के राजनीतिक और गैर-राजनीतिक सामान्य अपराधियों को भी शरण देता है. इसने हमारे दुश्मन इराक को हथियार भी सप्लाई किए हैं. इन दिनों ईरानी वायु सेना फ़्रांसीसी मिराज विमानों को मार गिरा रही है. 

क्या आपको लगता है कि दुश्मन केवल वही देश है जो हम पर हमला करता है? नहीं, हमले का मतलब केवल 'सशस्त्र हमला' नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक हमला या आर्थिक आक्रमण या ऐसा कुछ भी हो सकता है जो वास्तव में ईरानी हितों को नुकसान पहुंचाता हो. फ़्रांस हमारा दुश्मन है.

1987 की इस तस्वीर में, ईरान के सुप्रीम कमांडर अयातुल्लाह अली खामेनेई, डिफेंस फोर्स के पूर्व कमांडर सय्यद शिराजी के साथ तेहरान में सैनिकों का रिव्यू करते हुए

1987 की इस तस्वीर में, ईरान के सुप्रीम कमांडर अयातुल्लाह अली खामेनेई, डिफेंस फोर्स के पूर्व कमांडर सय्यद शिराजी के साथ तेहरान में सैनिकों का रिव्यू करते हुए
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सवाल: फ़्रांस ने ईरानी विपक्ष का एक ईरान-विरोधी केंद्र और यहां तक कि रॉयलिस्टों (राजतंत्रवादियों) का एक संघ भी बनाया है, लेकिन फ़्रांसीसी समाचार एजेंसी ईरान में सभी सुविधाओं के साथ काम कर रही है, विशेष रूप से तब जब अन्य समाचार एजेंसियों के पास वे सुविधाएं नहीं हैं. ऐसी विरोधाभासी स्थिति क्यों मौजूद है?

जवाब: खैर, हमें लगता है कि समाचार एजेंसियां वास्तव में पूरी दुनिया में स्वतंत्र हैं. हमारे पास एएफपी (AFP) सहित दुनिया भर की समाचार एजेंसियां हैं. उनमें से कुछ समाचारों को तोड़-मरोड़ कर पेश करती हैं, उदाहरण के लिए बोस्तान में हमारी जीत बहुत स्पष्ट थी लेकिन उन्होंने इसे संदिग्ध तरीके से प्रसारित किया. वे अपने हितों और उद्देश्यों के अनुसार समाचारों को अनुकूलित करते हैं. हम इन सभी एजेंसियों के काम करने की अनुमति देते हैं. हम उनका स्वागत करते हैं. यह हमारे देश में स्वतंत्रता को दर्शाता है. उन्हें आने दें, देखने दें और स्थिति को प्रतिबिंबित करने दें, कोई समस्या नहीं है. 

कभी-कभी, हमें कुछ एजेंसियों की गतिविधियों पर कड़ा रुख अपनाना पड़ता है, उदाहरण के लिए हमने इस तथ्य की पुष्टि करने के लिए एक प्रतीकात्मक कार्रवाई के रूप में अमेरिकी पत्रकार को निष्कासित कर दिया कि हम राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं कर सकते.

मेरी ​विशेष टिप्पणी: मुझे याद है उस समय ईरान में दुनिया भर से पत्रकार रिपोर्टिंग के लिए आते थे. प्रेस कांफ्रेंस होती थी. मैंने भी कई बार शामिल हुई हूं. जो बात कन्फ्यूजन पैदा करती थी, वह थी भाषा! फ़ारसी न जानने वाले पत्रकारों के लिए अनुवादक मौजूद थे मगर उनकी अंग्रेज़ी ऐसी नहीं थी कि वह अच्छी तरह बात समझा सकें और बाहर से आने वाले चीनी और जापानी इत्यादि देशों के पत्रकार भी अंग्रेज़ी ठीक से नहीं बोल पाते थे.

दूसरी अहम बात थी कि जो अनुवादक उन्हें मदद कर रहा है वह किस विचारधारा का है. दो भाषाओं वाले अंग्रेज़ी में क्या कहते थे और क्या समझा जाता था. यह भी ईरान को लेकर छपी रिपोर्टों में ग़लतफ़हमियों की वजह थी. इस तरह के अनुभव से ईरान पहले गुज़रा नहीं था और सत्ता में आए मौलवियों को भी सरकार चलाने का कोई अनुभव न था, जो आज 2026 में आपको साफ़ नज़र आ रहा है. 47 वर्ष में ईरान ने यकीनन अपना आश्चर्यजनक विकास हर क्षेत्र में किया है जिसने आज विश्व को हैरत में डाल दिया है और इजरायल और अमेरिका की इमेज को तोड़ कर चकनाचूर कर दिया है! तब मैं फ़्रांसीसी एजेंसी गई थी. उनसे पूछा था कि आप फ़ारसी जानते नहीं और इस विचारों व टकराहटों की बाढ़ में न्यूज़ कैसे निकालते हैं. तो जवाब मिला 'बिटविन द लाइन्स'.

सवाल: आपके पूर्ववर्ती, श्री बनी सद्र पेरिस में हैं. वे प्रेस से मिलते हैं. ईरान के सामने जो कई मुद्दे हैं उन पर अपनी राय देते हैं. वे खुले तौर पर दावा करते हैं कि वे ईरान वापस आएंगे और ईरानियों की नियति को बदलने के लिए सत्ता संभालेंगे. आपका आकलन क्या है और जनता और सशस्त्र बलों के बीच उनका आधार कितना बड़ा है कि वे वापसी का सपना देखते हैं?

जवाब: बनी सद्र के अलावा, अन्य लोग भी इसी तरह के दावे करते हैं, उदाहरण के लिए आरियाना, बख्तियार, ओवेसी, रजवी और कई अन्य राजतंत्रवादी और क्रांतिकारी-विरोधी हैं. ये विदेशों में रह रहे हैं. इनमें से ज्यादातर फ़्रांस में हैं. उनमें से हर कोई दावा करता है कि वह अगले दो से तीन महीनों में ईरान पहुंच जाएगा और उनमें से कुछ ने पिछले दो वर्षों से लगातार इसे दोहराया है. इन राजनीतिक नेताओं की ओर से यह स्वाभाविक है, अन्यथा वे जीवित कैसे रह सकते हैं. उन्हें अपने संरक्षकों को आश्वस्त करने के लिए ईरानियों के बीच झूठा समर्थन गढ़ना पड़ता है.

हम जानते हैं कि न तो बनी सद्र और न ही दूसरों का सेना में या लोगों के बीच कोई आधार है. यदि वे इस बारे में सुनिश्चित होते तो उन्होंने ईरान क्यों छोड़ा? उन्हें यहीं रुकना चाहिए था. उन्हें अन्य देशों का समर्थन प्राप्त है, जो रूढ़िवादी और ईरान-विरोधी हैं. बनी सद्र से लेकर बख्तियार और रजवी तक, सभी को इन देशों से वित्तीय सहायता मिल रही है और इस्लामी क्रांति से लड़ने के लिए भुगतान किया जा रहा है.

मेरी विशेष टिप्पणीः 1983 में पेरिस में मैंने बनिस्बत मसूद रजवी और अमानी के साथ शाहपुर बख्तियार का इंटरव्यू लेते हुए राष्ट्रपति खामेनेई के जवाबों को उनसे प्रश्न के रूप में पूछा था. आज उनमें से न कोई जिंदा बचा न ईरान लौटा. 1981 और उसके बाद सारे देशों के साथ खुद ईरानियों का पक्का विश्वास था कि मुल्लाओं से हुकूमत चल नहीं पाएगी. आज इजरायल व अमेरिका की भी यह गलतफहमी दूर हो गई कि इमरान उन से डर कर पीछे हट जाएगा.

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ईरान-इराक युद्ध (खाड़ी युद्ध) के दौरान नवंबर 1980 में ईरानी सेना
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सवाल: इराक-ईरान युद्ध स्वभाव से व्यर्थ है और इसे अनावश्यक रूप से लंबा खींचा गया है. शांति की संभावनाएं क्या हैं?

जवाब: शांति, देखिए हमें शांतिपूर्ण समाधान खोजने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन शांति का यह विचार इराकी नेताओं के बीमार दिमाग में नहीं आता, जो शांति लाने और युद्ध को हमेशा के लिए समाप्त करने में असमर्थ हैं. शांति के लिए युद्ध से अधिक साहस की आवश्यकता होती है और इराकी नेताओं में इसकी कमी है. युद्ध केवल उनके पूर्ण विनाश के साथ समाप्त होगा. एक बार जब वे शांति के लिए प्रयास करेंगे और इसे प्राप्त करेंगे तो आंतरिक रूप से टूट जाएंगे और इराक में सत्ता से बाहर फेंक दिए जाएंगे, क्योंकि उन्होंने ईरान से भारी धन और बहुमूल्य लूट का वादा किया है. उन्होंने कुछ भी हासिल नहीं किया है. उन्होंने काफी कुछ खोया है और अपने सैनिकों को हमारी मिट्टी में दफन किया है. हम शांति के लिए तैयार हैं लेकिन गरिमा और सम्मान के साथ-साथ निश्चित वादों वाली शांति के लिए. अब तक इराक ने शांति के लिए झूठी पुकार दी है और उसके दावे पूरी तरह से फर्जी हैं.

मेरी विशेष टिप्पणीः जो बात उस समय ईरान इराक के युद्ध बंदी और शांति के बाबत राष्ट्रपति खामेनेई ने कही थी वह 2026 में इमाम  बनने के बाद खामेनेई कह रहे थे कि युद्ध शुरू अमेरिका ने किया था खत्म हम करेंगे. साथ ही फिर कभी हमला न करने के अनुबंध के साथ अपनी छह शर्तें और रखीं कि इस के साथ ही युद्ध बंद होगी. 1983 में युद्धविराम के लिए जो बैठक बुलाई गई थी उस में मैं मौजूद थी. उसमें आए मौलियों ने इमाम खुमैनी से अपने हस्ताक्षर के साथ युद्ध विराम का निवेदन किया था. जवाब आया था. यह शैतानों की बैठक है. और जबरदस्त शेलिंग और बमबारी शुरू कर दी थी कि यह हमारा जवाब है. और आज भी ईरान वही युक्ति अपनाए हुए है.

सवाल: कुर्दिस्तान और अन्य अल्पसंख्यक क्षेत्रों की समस्या के बारे में आप क्या महसूस करते हैं? उन्हें स्वायत्तता देने के बारे में क्या विचार है?

जवाब: यह कुर्द नहीं बल्कि अमेरिका है जो स्वायत्तता मांग रहा है. कुर्द केवल काम, रोटी और अच्छा समृद्ध जीवन चाहते हैं. हमारे लिए कुर्द, तुर्क, बलूच और फारस आदि सभी समान हैं. हमारी सरकार उनकी जाति, पंथ और जातीय विशेषताओं के बावजूद सभी के लिए समृद्धि और खुशी लाने के लिए प्रतिबद्ध और इच्छुक है. हम सभी के लिए रोटी, कल्याण, पूर्ण रोजगार, घर और उनके नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. वे भी हमसे यही चाहते हैं. जो लोग खुद को कुर्दों के नेता बताते थे और स्वायत्तता चाहते थे, उन्हें उनके द्वारा बाहर निकाला जा रहा है.

आज सभी कुर्द शहर 'जमहूरी इस्लामी' के नियंत्रण में हैं और कुर्द खुद गुफाओं और सड़क किनारे चोरों की तरह रहने वाले ऐसे राष्ट्र-विरोधी तत्वों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, जो किसी राहगीर को बंधक बना सकते हैं. आप शायद जानते होंगे कि हमारी उपयोगी जनशक्ति में से एक 'पेशमर्गा-ए-मुसलमान-ए-कुर्द' है! वे उन लोगों से लड़ते हैं जो अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के एजेंट हैं और सच्चे कुर्द नहीं हैं.

अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के साथ अयातुल्लाह अली खामेनेई

अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के साथ अयातुल्लाह अली खामेनेई
Photo Credit: AFP

सवाल: ईरान अलगाववादी आंदोलनों से ग्रस्त है और खतरा यह है कि देश एकजुट नहीं रह पाएगा. अफवाहें हैं कि इसमें सोवियत संघ का हाथ है? (बड़ी खामोशी के बाद मुझे इस प्रश्न को दोहराना पड़ा!)

जवाब: हम असली दुश्मन को जानते हैं. हमने जो देखा है वह यह है कि पश्चिमी और अमेरिकी हाथ अधिक स्पष्ट हैं, जैसे कासेमलौ, एज़ुद्दीन आदि. वे कुछ हद तक इराक के साथ और कुछ हद तक अन्य लोगों के साथ सहयोग कर रहे हैं, जिनके ईरान पर समान इरादे हैं. हम सतर्क हैं और उनके ख़िलाफ़ अपने राष्ट्र की पूरी तत्परता से रक्षा करते हैं.

सवाल: कहा जाता है कि क्रांतिकारी-विरोधी तत्व ईरान के बाहर बहुत सक्रिय हैं और साम्राज्यवादियों की वापसी की तैयारी कर रहे हैं. दूसरी ओर, क्रांतिकारी प्रगतिशील तत्वों आदि मुजाहिदीन और फिदायीन को ईरान में रोजाना फांसी दी जा रही है और इस तरह देश उस शक्ति को खो रहा है जो केवल साम्राज्यवाद और साम्राज्यवादियों के बढ़ते खतरे का सामना कर सकती थी. आपका आकलन क्या है?

जवाब: मैं आपसे सहमत नहीं हूं, खानम. आप क्रांतिकारी होने का दावा करने वाले क्रांतिकारी-विरोधियों को क्रांतिकारी के रूप में वर्गीकृत कर रही हैं. एक पुराने सावाकी (SAVAK एजेंट्स- ईरान की शाह पहलवी युग की खूंखार गुप्त पुलिस) और जिसने उनके ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी और अब वे 'जम्हूरी इस्लामी' के साथ वही कर रहे हैं, उनमें क्या अंतर है? दोनों क्रांतिकारी-विरोधी हैं. हम ऐसे तत्वों को क्रांतिकारी या प्रगतिशील कहते हैं जो पहले क्रांतिकारी हों और फिर क्रांतिकारी-विरोधियों के साथ उनका कोई संबंध न हो. यह अजीब है कि आप उन्हें क्रांतिकारी मानती हैं, जिनका कुर्दिस्तान में सामंतों के साथ निश्चित संबंध है और वे फ़्रांस जैसे देशों में भाग जाते हैं जो अपने रुख में ईरान-विरोधी हैं.

2 अक्तूबर 1981 को ईरान में राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान वोट देते अयातुल्लाह अली खामेनेई. इस चुनाव में खुद खामेनेई एक प्रत्याशी थे. जब नतीजा आया तो 97% से अधिक मतों के साथ वे देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता के रूप में पहले राष्ट्रपति चुने गए.

2 अक्तूबर 1981 को ईरान में राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान वोट देते अयातुल्लाह अली खामेनेई. इस चुनाव में खुद खामेनेई एक प्रत्याशी थे. जब नतीजा आया तो 97% से अधिक मतों के साथ वे देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता के रूप में पहले राष्ट्रपति चुने गए.
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सवाल: एक शोधकर्ता के रूप में मुझे अनुभव है कि ये राजतंत्रवादी विभिन्न वेशों में, कभी इस्लाम के और कभी मार्क्सवाद के, तबाही मचाते हैं और मुजाहिदीन और कम्युनिस्टों (गुरिल्लाओं) जैसे लोगों को बदनाम करते हैं. आपकी क्या राय है? मेरे लिए चाहे एक पासदार मारा जाए या एक मुजाहिदीन, मैं इसे ईरान के लिए नुकसान मानती हूं?

जवाब: आप एक शोधकर्ता हैं, मुझे बताइए कि मसूद रजवी राजतंत्रवादी है या नहीं? खैर, यदि वह राजतंत्रवादी है, तो आपका प्रश्न सही है और यदि वह उन क्रांतिकारी लोगों में से एक हैं जो कई वर्षों तक जेल में थे और आज कुर्दिस्तान में कोमालेह सामंतों के साथ सहयोग कर रहे हैं और सऊदी अरब से पैसा लेते हैं और फ़्रांस जैसे देश में शरण लेते हैं. तो यकीन कीजिए कि केवल राजतंत्रवादी ही क्रांतिकारी-विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे सभी जो इस्लामी क्रांति के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, वे क्रांतिकारी-विरोधी हैं, चाहे वह आज का मसूद रजवी हो या कल के अली अमीरी, बख्तियार और ओवेसी. उनकी उपाधियों और शब्दावली पर मत जाइए. वे क्रांति के दुश्मन हैं. 

मेरी विशेष टिप्पणीः जिस इमाम खामेनेई को हम सब ने  2026 में बुढ़ापे में हंसते, बातें करते , और शेरों शायरी को सुनते देखा है. उस खामेनेई को जिनसे मैं मिली थी बिल्कुल अलग थे. कुंबले, दबता रंग, बेहद गम्भीर, थोड़े स्टिफ और रूखे. शायद वह समय ही ऐसा था. ढेरों जिम्मेदारियां. चुनौतियों और मौत के साये में जीने का समय. 2017 में जब मैं ईरान के एक एनजीओ  के बुलावे पर युद्ध बंदियों से मिलने गई, जिनसे रमादी कैंप इराक में मिल चुकी थी जब वह आठ से दस साल के थे. तब मैंने इच्छा जाहिर की थी कि मैं इमाम से मिलना चाहती हूं. मगर उन्होंने  जवाब दिया कि हम नहीं चाहते कि आप हमारे काम के बीच किसी से मिलें. उन्होंने कहा कि आपसे मिलना तो बहुत लोग चाह रहे हैं, मगर हमने इनकार कर दिया है.

मुझे अफसोस है कि अयातुल्लाह अली खामेनेई के साथ मेरी कोई तस्वीर नहीं है. लेकिन उसकी भी एक वजह है. वो ये कि तब कोई भी रूहानी (आध्यात्मिक) नेता औरतों के साथ तस्वीरें नहीं खिंचवाते थे.

(नासिरा शर्मा वरिष्ठ लेखिका हैं. उन्हें उनकी पुस्तक 'पारिजात' के लिए प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जा चुका है. )

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