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तारिक रहमान की सरकार में कौन सा मोड़ ले सकते हैं भारत-बांग्लादेश संबंध

राजन झा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    फ़रवरी 17, 2026 14:27 pm IST
    • Published On फ़रवरी 17, 2026 14:27 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 17, 2026 14:27 pm IST
तारिक रहमान की सरकार में कौन सा मोड़ ले सकते हैं भारत-बांग्लादेश संबंध

बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को हुए आम चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने शानदार जीत दर्ज की. बांग्लादेश संसद की 300 में से 299 सीटों पर चुनाव कराए गए. इसमें बीएनपी और उसके सहयोगियों ने करीब 212 सीटों पर जीत दर्ज की है. बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान आज प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे. दो दशक से अधिक समय तक विपक्ष में रहने के बाद बीएनपी की शानदार वापसी इस बात का संकेत है कि बांग्लादेश अब नई दिशा की तलाश में है. बीएनपी की इस जीत पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को फोन कर बधाई दी. उन्होंने दोनों देशों के बीच मजबूत और व्यापक सहयोग की इच्छा जताई. भारत ने यह भी कहा है कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सहयोग जारी रखना चाहता है. बीएनपी ने भी इस बात के संकेत दिए हैं कि वह बांग्लादेश की विदेश नीति को बैलेंस्ड (संतुलित) तरीके से स्थापित करना चाहता है. वह अपने पड़ोसी देशों के साथ मित्रवत और सम्मानजनक संबंध बनाए रखने को प्राथमिकता देगा.

बांग्लादेश में पिछले कुछ सालों में राजनीतिक अस्थिरता, विरोध-प्रदर्शन और नेतृत्व परिवर्तन से जनता में स्थिरता की चाह पैदा हुई. बीएनपी ने इसे अपने पक्ष में मोड़ा और 'देश पहले' जैसे नारों के साथ जनता की उम्मीदों को बयां किया. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद जनता के मन में परिवर्तन की ललक थी. बीएनपी ने बदलाव कि इस तीव्र इच्छा को अवसर के रूप में इस्तेमाल कर बांग्लादेश के आम जनता को अपने साथ जोड़ा. हालांकि बीएनपी ने स्पष्ट जीत हासिल की, लेकिन जमात-ए-इस्लामी जैसे दल की भी सफलता कम नहीं है. यह दर्शाता है कि बांग्लादेश की राजनीति अब पहले से अधिक बहुदलीय और जटिल हो गई है.

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भारत–बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंध

भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते कई दशकों से गहरे, भावनात्मक और जटिल रहे हैं. यह साझेदारी इतिहास, संस्कृति, भू-राजनीति और आर्थिक हितों से गठित हुई है. इसकी शुरुआत 1971 में भारत की ओर से बांग्लादेश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने से होती है. उस समय तत्कालीन पाकिस्तानी शासन के खिलाफ बांग्लादेश की मुक्ति के लिए भारत ने सैन्य सहायता और कूटनीतिक समर्थन दिया था. यह समर्थन आज भी दोनों देशों के बीच भावनात्मक बंधन का आधार है.
भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, ऊर्जा और परिवहन के क्षेत्र में सहयोग सालों से बढ़ा है. विशेष रूप से सामान की आवाजाही, रेल-मार्ग का सम्मिलित उपयोग और क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाया गया है. इसके अलावा दोनों देशों ने बांग्लादेश–भारत सीमा पर सुरक्षा सहयोग को मजबूत करते हुए अवैध आवाजाही और आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त कदम उठाए हैं. सीमा विवाद को भी दोनों देश शांतिपूर्ण बातचीत के माध्यम से हल करने का प्रयास करते रहे हैं.

इसके बावजूद दोनों देशों के संबंध तनाव और टकराव से अछूते नहीं रहे हैं. इसमें सीमा विवाद, घुसपैठ, सांस्कृतिक और धार्मिक प्रवास जैसे मामलों पर मतभेद होते रहे हैं. राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव भी इन रिश्तों को प्रभावित करते रहे हैं. बीएनपी की सरकार बनने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर आया है. यह अवसर कई सकारात्मक संकेतों के साथ-साथ है चुनौतियां भी लेकर आया है.

बांग्लादेश में सरकार बनाने जा रही बीएनपी ने भारत के साथ साथ पाकिस्तान से भी संबंध सुधारने की तरफ इशारा किया है.

बांग्लादेश में सरकार बनाने जा रही बीएनपी ने भारत के साथ साथ पाकिस्तान से भी संबंध सुधारने की तरफ इशारा किया है.

भारत के साथ कैसे रिश्ते चाहती है बीएनपी

बीएनपी ने स्पष्ट किया है कि वह भारत के साथ रिश्तों को फिर से परिभाषित करना चाहता है. बीएनपी के नेताओं ने कहा है कि दोनों देशों को आपसी हित और सम्मान के आधार पर नया संबंध स्थापित करना चाहिए. भारत ने भी आपसी रिश्ते को गंभीरता से लिया है. भारत ने द्विपक्षीय संबंध को प्राथमिकता देते हुए अपने प्रतिनिधि के तौर पर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को तारिक रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में भेजा है. 

भारतीय नेताओं ने बीएनपी की जीत को लोकतांत्रिक भावना की जीत बताते हुए उम्मीद जताई है कि बांग्लादेश में संवैधानिक लोकतंत्र और स्थिरता फिर स्थापित होगी. इसका सकारात्मक प्रभाव क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास पर भी पड़ेगा. ये सारी घटनाएं दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की संभावना को प्रबल करती है. लेकिन बीएनपी के कुछ सहयोगियों की भारत के प्रति आलोचनात्मक टिप्पणियां तनाव पैदा कर सकती हैं. कुछ बयानों में भारत को लेकर नकारात्मक रुख दिखाने की कोशिश भी की गई है. यह कूटनीतिक स्तर पर बातचीत की जरूरत की ओर इशारा करती है.

बांग्लादेश में भारत के लिए चुनौतियां क्या हैं

बीएनपी खुले तौर पर पाकिस्तान और अन्य देशों के साथ रिश्तों को भी आगे बढ़ाने की इच्छा जता रहा है. यह दक्षिण एशिया में भारत के रणनीतिक हितों पर नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है. ऐसे में भारत और बांग्लादेश के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण होगा.बीएनपी के शासनकाल में भारत के लिए कुछ विशेष अवसर और चुनौतियां सामने आ सकती हैं. बीएनपी के साथ संयुक्त सुरक्षा सहयोग से सीमा पर अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण बेहतर ढंग से किया जा सकेगा. इसके साथ ही सीमा सुरक्षा, आतंकवाद और तस्करी जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ सकता है. आर्थिक और व्यापारिक साझेदारी में बीएनपी सरकार आर्थिक विकास और निवेश को प्राथमिकता दे सकती है. इससे भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, ऊर्जा साझेदारी और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में सहयोग बढ़ता दिखाई देगा. दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और शैक्षिक सहयोग को भी आगे बढ़ाया जा सकता है. इससे लोगों के बीच समझ और संपर्क में वृद्धि होगी. बीएनपी के आलोचक भारत-बांग्लादेश रिश्तों में 'रीसेट' की जरूरत का जिक्र करते हैं. इसका अर्थ रणनीतिक ढांचे में बदलाव हो सकता है. भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह नए नेतृत्व के साथ विश्वसनीयता और सम्मानजनक संवाद बनाए रखे ताकि द्विपक्षीय हितों को संरक्षित रखा जा सके.

बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए भारत ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भेजा है.

बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए भारत ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भेजा है.

बांग्लादेश में बीएनपी की वापसी न केवल वहां की राजनीति में बदलाव लाती है, बल्कि भारत-बांग्लादेश के रिश्तों को नई दिशा देने का अवसर भी देती है. पिछले दशकों में दोनों देशों के बीच मित्रता, साझेदारी और सहयोग की एक मजबूत नींव तैयार हुई है. अब यह मौका है कि नए राजनीतिक नेतृत्व के साथ सोच-विचार, संवाद और रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत किया जाए. भारत के लिए यह जरूरी है कि वह बांग्लादेश के साथ आत्मसम्मान, राजनीतिक स्वतंत्रता और साझा विकास के लक्ष्यों को ध्यान में रखकर सहयोग करे. बीएनपी सरकार के साथ संबंधों को फिर से जीवित और सकारात्मक बनाने के लिए कूटनीतिक बातचीत, सामरिक समझ और आपसी सम्मान की भावना को सर्वोपरि रखना होगा. इस नए अध्याय में, दोनों देशों के नेताओं और जनता को साझे हितों को आगे बढ़ाने, मतभेदों का समाधान करने और क्षेत्रीय शांति के लिए मिलकर काम करने की जिम्मेदारी है. यही वह मार्ग है जो भारत और बांग्लादेश के बीच स्थायी दोस्ती और साझेदारी को मजबूती देगा. 

(डिस्क्लेमर: लेखक ने नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज से पीएचडी की है. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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