दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की पहचान रखने वाली भारतीय जानता पार्टी (बीजेपी) ने आखिरकार 17 अगस्त को अपनी राष्ट्रीय टीम की घोषणा कर दी. वैसे तो लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल द्वारा अपने पदाधिकारियों की घोषणा करना एक सामान्य प्रक्रिया है. लेकिन बीजेपी की नई टीम को लेकर जितनी उत्सुकता पार्टी के कार्यकर्ताओं, समर्थकों और मीडिया को थी, लगभग उतना ही कौतूहल आम लोगों में भी था. बीते कुछ समय से बनारस के घाटों से लेकर दिल्ली के खान मार्किट तक और इलाहाबाद और जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों से लेकर मुंबई के दलाल स्ट्रीट तक यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ था.
बीजेपी की नई टीम में कितने प्रभारी हैं
सोशल मीडिया के इस दौर में हर कोई जानना चाहता था कि ऐतिहासिक तौर पर अपना तीसरा कार्यकाल संभाल रहे भारत के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सरदार पटेल के बाद सबसे प्रभावशाली गृह मंत्री माने जाने वाले अमित शाह और पार्टी के सबसे युवा अध्यक्ष नितिन नवीन आखिर किस-किस को बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम में जगह देंगे. सोमवार को घोषित नई टीम में कुल 65 राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं. इसमें 51 नए चेहरे हैं. प्रमुख पदों के हिसाब से नई इकाई में कुल 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, आठ राष्ट्रीय महासचिव और 16 राष्ट्रीय सचिवों को जगह मिली है.
राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में अपना कार्यकाल शुरू करने के करीब सात महीने बाद नितिन नवीन ने अपनी टीम में जिन चेहरों को जगह दी है, वैसे तो उनमें से हर पदाधिकारी को शामिल करने के कारणों पर काफी कुछ लिखा जा सकता है, लेकिन नई टीम में कुछ ऐसे लोग हैं, जिस पर टिप्पणीकारों की विशेष नज़र है, जो इस व्यवस्था में निरंतरता, नवाचार और नवीनता के प्रतीक हैं, फिर चाहें वो उपाध्यक्ष हों, महासचिव हों या फिर राष्ट्रीय सचिव.
राम माधव से बीजेपी ने क्या संदेश दिया है
राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) का दायित्व सामान्यतः संघ से आने वाले किसी वरिष्ठ प्रचारक को ही दिया जाता है. और वर्तमान संगठन महासचिव बीएल संतोष को पुनः उस दायित्व पर रखना पार्टी में उनकी कार्यशैली को लेकर उत्पन्न संतुष्टि को दर्शाता है. गौरतलब है कि उनके नेतृत्व में पार्टी का न केवल व्यापक स्तर पर विस्तार हुआ है, बल्कि हाल के समय में पार्टी बिहार और बंगाल में भी ऐतिहासिक जीत दर्ज कर पाने में सफल रही है. वहीं दूसरी ओर संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव राम माधव की पार्टी में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में वापसी से अब इन कयासों और अफवाहों पर तो विराम लग जाएगा कि बीजेपी और संघ में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. प्रख्यात लेखक, बहु भाषीय स्तंभकार, संघ की छवि को वैश्विक स्तर पर ले जाने वाले संघ के प्रमुख विचारकों में से एक माधव का पूर्व में जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर में संगठन को सशक्त करने और कमल खिलाने में बड़ा योगदान रहा है. उनकी वापसी को लेकर ऐसा माना जा रहा है कि पार्टी का अपनी विचारधारा को बौद्धिक स्तर पर समाज के सभी वर्गों में आगे ले जाने पर पूरा ज़ोर है!

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नवनियुक्त राष्ट्रीय महासचिवों में से सबसे अधिक चर्चा पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की है. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को अमेठी से हरा कर बड़ा तख्तापलट करने वाली ईरानी 2024 में उसी अमेठी में चुनाव हार गई थीं. इसके बाद वो मीडिया की चकाचौंध से बाहर हो चुकी थीं, लेकिन उस दौरान वो पार्टी के कार्यों में लगातार सक्रिय रहीं, इसमें सबसे महत्वपूर्ण उनका पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान रैलियों में बेहद सहज रूप से बंगाली भाषा में वक्तव्य देना और पार्टी की बात को वहां के साधारण लोगों तक पहुंचाना था. कई भारतीय भाषाओं पर अच्छी पकड़ रखने वाली कुशल वक्ता ईरानी को महासचिव बना कर पार्टी अपने लोकप्रिय महिला नेतृत्व को मजबूती से खड़ा करना चाहती है.
टीम नवीन में एके एंटनी को क्यों मिली जगह
राष्ट्रीय मंत्रियों की सूची में दो नाम विशेष रूप से गौर करने लायक हैं. पहला नाम है कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एके एंटनी के बेटे अनील एंटनी का. अनिल काफी समय से संगठन के कार्यों में सक्रिय थे. पार्टी ने उनको ये दायित्व देकर दक्षिण भारत, विशेष रूप से केरल और ईसाई समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश की है कि भले ही वो पार्टी का समर्थन न करें, लेकिन पार्टी उनके मन को जीतने के लिए प्रयासरत है. गोवा और पूर्वोत्तर के राज्यों में जहां काफ़ी संख्या में ईसाई रहते हैं, वहां इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ने के आसार हैं.
दूसरा नाम है हाल ही में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) छोड़ कर बीजेपी में आए पंजाब से राज्यसभा सांसद संदीप पाठक का. आईआईटी दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर और आप के रणनीतिकार के रूप में ख्याति प्राप्त करने वाले पाठक, जो आप की 2022 की पंजाब विजय के सूत्रधार माने जाते हैं, उन्हें पार्टी में राष्ट्रीय का दायित्व देकर यह संदेश दिया गया है कि वो राजनीतिक प्रतिभा और चुनावी प्रबंधन कौशल को अपने पार्टी में शामिल करने में कोई झिझक नहीं है, भले ही वो कहीं से भी आए हों.
अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से मुस्लिम समाज से अपने को जोड़ने के लिए पार्टी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रोफेसर तारिक मंसूर को फिर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है. एक शिक्षाविद और चिकित्सक के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करने वाले प्रोफेसर मंसूर को दायित्व देकर बीजेपी यह बताना चाहती है कि उसके दरवाज़े राष्ट्रवादी मुसलमानों के लिए हमेशा खुले हैं. इसके साथ-साथ वो मुसलमानों के पसमांदा यानि पिछड़े समाज से आते हैं, जिसको पार्टी से जोड़ने की बात मोदी लंबे समय से करते रहे हैं.
क्या सत्ता-विरोधी नैरेटिव को बदल पाएगी टीम नवीन
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस नई टीम की घोषणा ऐसे समय में हो रही है, जब पार्टी के पास चुनौतियों का अंबार लगा हुआ है. बीते कुछ दिनों में जिस तरह से पार्टी को यूजीसी रेगुलेशंस, नीट परीक्षा लीक और फिर कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध-प्रदर्शन का सामना करना पड़ा है, उससे पार्टी के सामने एक 'बैटल ऑफ़ परसेप्शन' यानी 'धारणा की लड़ाई' का एक जटिल संकट खड़ा हो गया है. इसको लेकर कोई संशय नहीं है कि केंद्र और अनेकों राज्यों में सरकार बनाने से पार्टी मजबूत हुई है, लेकिन अब पार्टी के समक्ष वास्तविक मुद्दों से अधिक विपक्ष के द्वारा बनाए जा रहे 'सत्ता-विरोधी नैरेटिव' को बदलने की चुनौती है.12 साल से सत्ता में रहने के बावजूद भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कोई खास कमी नहीं आई है, लेकिन जिस तरह से युवाओं के एक वर्ग में पार्टी को लेकर अविश्वास बढ़ा है, उससे निपटने के लिए नई टीम को नैरेटिव और कम्युनिकेशन (संवाद), दोनों स्तर पर नवाचार लाना ही पड़ेगा. इसके इतर पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव भी नई टीम के लिए एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि अकेले इनमें ही लोकसभा की 102 सीटें हैं.
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं बड़ी चुनौती
नई टीम को जहां एक ओर यूपी, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में फिर कमल खिलाने के लिए जी जान से लगना पड़ेगा, वही अल्पसंख्यक सिख वाले राज्य पंजाब में पार्टी को सत्ता में लाने के लिए एक नई रणनीति की दरकार होगी. 2027 के शुरुआती महीनों में होने वाले ये विधानसभा चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनके दम पर ही काफी हद तक अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के समीकरण भी प्रभावित होंगे. ऐसा माना जा रह है कि इस घोषणा के बाद अब जल्द ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी बदलाव देखने को मिल सकता है. कयास इस बात के भी लगाए जा रहे हैं कि आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए मंत्रिमंडल फेरबदल ऐसे होगा जिससे इन राज्यों से आने वाले सांसदों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जा सके. इसके अलावा कई युवा सांसदों को भी इस बार मंत्री बनाया जा सकता है. नई टीम के माध्यम से बीजेपी ने धर्म, जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र और पेशों की विविधताओं को सहज रूप से साधने की पूरी कोशिश की है. टीम में युवा जोश और गंभीर अनुभव का पर्याप्त संतुलन दिखाई देता है.
बीजेपी अपने नवाचारों के लिए जानी जाती है. यह टीम उसी का एक उदाहरण है. यह भी माना जा रहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव तक बीजेपी की यही टीम रहेगी और आगामी मंत्रिमंडल फेरबदल भी मोदी 3.0 का अंतिम मंत्रिमंडल फेरबदल होगा. ऐसे में क्या 'टीम मोदी' और 'टीम नवीन' मिल कर 2029 में बीजेपी को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में सफल हो पाएंगी, यह देखने लायक होगा.
(डिस्क्लेमर: डॉक्टर पवन चौरसिया दिल्ली विश्विद्यालय के शिवाजी कॉलेज में सहायक प्राचार्य हैं . चित्रा शेखावत इंडिया फाउंडेशन में रिसर्च फेलो के रूप में कार्यरत हैं. लेख में व्यक्त विचार लेखकों के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)